Jantar Mantar History: जंतर मंतर… दिल्ली का वह छोटा-सा कोना जहां नारे गूंजते हैं, इतिहास की परतें जीवित रहती हैं और लोकतंत्र अपनी सांस लेता है. संसद से कुछ ही दूर स्थित यह इलाका आज देश की नजरों का केंद्र बना हुआ है. सुबह आठ बजे तक यहां बैनर थामे लोग जमा होने लगते हैं. कुछ देर बाद हवा में गूंज उठते हैं नारे-‘आवाज़ दो, हम एक हैं’ और ‘जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा’. शाम ढलने तक भाषण, प्रदर्शन और मांगों का सिलसिला थमता नहीं. किसान, छात्र, मजदूर, महिलाएं और राजनीतिक दल-सभी यहां अपनी बात रखते हैं. संसद के इतने करीब होने के कारण जंतर मंतर लोकतंत्र की धड़कन बन गया है, जहां सत्ता के गलियारों तक आवाज़ें आसानी से पहुंच जाती हैं.
पहले धरने-प्रदर्शन बोट क्लब पर होते थे. 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लगभग पांच लाख किसानों ने राजपथ के लॉन पर बैलगाड़ियों और पशुओं के साथ डेरा डाल दिया था. सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई. इसके बाद सरकार ने बोट क्लब पर बड़े जमावड़ों पर रोक लगा दी और 1993 के आसपास जंतर मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल के रूप में स्वीकार कर लिया गया. तब से अब तक यहां हजारों धरने दिए जा चुके हैं. आजकल काकरोच जनता पार्टी का आंदोलन देश-विदेश में सुर्खियां बटोर रहा है.
गांव से राजधानी तक की यात्रा
जहां आज जंतर मंतर है, वहां 1911 से पहले माधोगंज नामक गांव बसा था. कनॉट प्लेस के निर्माण के साथ वह गांव इतिहास के गर्भ में समा गया. नई दिल्ली के नियोजन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने इस क्षेत्र को राजधानी का हिस्सा बनाया, निवासियों को विस्थापित किया और आधुनिक इमारतें व सड़कें खड़ी कीं. आज इस जमीन पर पुराने गांव से आधुनिक राजधानी तक की यात्रा की परतें छिपी पड़ी हैं.
नई दिल्ली बनाने वाले कुछ ठेकेदारों ने यहीं अपने भव्य आशियाने बनवाए थे-धरम सिंह सेठी, सोभा सिंह, बैसाखा सिंह और नारायण सिंह. ये मुख्य रूप से पंजाब से आए सिख परिवार थे, जिन्हें ‘पंज प्यारे’ कहा जाता था. धरम सिंह को राष्ट्रपति भवन, साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक के लिए धौलपुर व आगरा से पत्थरों की आपूर्ति का ठेका मिला था. सोभा सिंह ने उनके बगल वाले प्लॉट पर अपना बंगला बनवाया, यहीं बाद में केरल हाउस बना. इसका डिजाइन वाल्टर जॉर्ज ने किया था. वही जॉर्ज जिन्होंने मिरांडा हाउस, सेंट स्टीफंस कॉलेज, ग्वायर हॉल और सुजान सिंह पार्क भी डिजाइन किए. सोभा सिंह ने कनॉट प्लेस के कई ब्लॉक, साउथ ब्लॉक के हिस्से, इंडिया गेट और अन्य प्रमुख भवन भी बनवाए. उनकी संपत्ति इतनी विशाल थी कि उन्हें ‘आधी दिल्ली का मालिक’ कहा जाता था.
बैसाखा सिंह अमृतसर से आए और नॉर्थ ब्लॉक के मुख्य ठेकेदार बने. नारायण सिंह ने नई दिल्ली की लगभग सभी चौड़ी सड़कें बनवाईं. उनका बंगला सोभा सिंह और बैसाखा सिंह के बंगलों के ठीक सामने था. इन परिवारों की दीवारें कभी-कभी खोली जाती थीं ताकि मिल-जुल सकें. नारायण सिंह ने इंपीरियल होटल जैसे प्रतिष्ठित भवन भी खड़े किए.
राजनीतिक इतिहास की छाया
जंतर मंतर का संबंध देश के बंटवारे से भी है. यहां स्थित 7 जंतर मंतर वाले बंगले में 1947 से 1971 तक कांग्रेस का मुख्यालय रहा. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल यहां आते-जाते थे. राज खन्ना ने अपनी पुस्तक ‘आजादी के पहले, आजादी के बाद’ में 15 जून 1947 को हुई उस बैठक का वर्णन किया है, जिसमें कांग्रेस ने ब्रिटिश विभाजन-योजना पर मुहर लगाई थी. इस भवन को ‘व्हाइट हाउस’ भी कहा जाता था. 1959 में नेहरू ने यहीं इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया था. विभाजन के बाद यह शरणार्थी संपत्ति बनी और बाद में कांग्रेस को आवंटित हुई.
आगे चलकर यह भवन जनता दल और मोरारजी देसाई द्वारा स्थापित अखिल भारतीय सेवा दल का भी मुख्यालय बना. 1969 के कांग्रेस विभाजन के बाद मोरारजी देसाई गुट ने इस पर नियंत्रण रखा, जो बाद में जनता पार्टी में विलीन हो गया. आज भी यह स्थान राजनीतिक इतिहास की याद दिलाता है. जब बाहर नारे गूंज रहे होते हैं, तब इससे सटा फ्री चर्च चुपचाप सब देख रहा होता है. पिछले साल इसने अपना एक सदी का सफर पूरा किया. 1925 में स्कॉटलैंड की फ्री चर्च मिशनरियों ने इसे बनवाया था. अब यह चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया का हिस्सा है. औपनिवेशिक वास्तुकला वाला यह चर्च रोजाना अंग्रेजी और हिंदी में प्रार्थनाएं सुनता है- विज्ञान, आस्था और शांति का अनोखा संगम.
जंतर मंतर का स्थायी चेहरा: कुट्टी
वन कुट्टी को आप जंतर मंतर का स्थायी चेहरा मान सकते हैं. वे 1974 में केरल से दिल्ली आए थे. तब से दिल्ली का चेहरा बहुत बदला और कुट्टी भी. दिल्ली आने पर उन्होंने लक्ष्मीबाई नगर के तमिल स्कूल की कैंटीन में काम किया. फिर लोदी रोड के चिदंबरम रेस्तरां में साउथ इंडियन व्यंजन बनाने से लेकर सफाई तक के सारे काम किए. कम कमाई पर भी वे कुछ रुपये हमेशा बचा लेते. 1983 में तीस जनवरी मार्ग स्थित गांधी स्मृति (बिड़ला हाउस) में कैंटीन चलाने का मौका मिला. अपनी जमा पूंजी से उन्होंने कैंटीन शुरू की और काम चल निकला.
उनकी जिंदगी तब बदली जब 1987 में जंतर मंतर में नई दिल्ली नगर परिषद (एनडीएमसी) की एक छोटी दुकान मिल गई. इसके ठीक आगे केरल भवन और कांग्रेस का पुराना मुख्यालय है. अब जंतर मंतर का सबसे बड़ा लैंडमार्क कुट्टी की दुकान बन चुका है-‘कुट्टीज’. यहां समाजवादी व्यवस्था लागू रहती है. धरना-प्रदर्शन करने वाले आंदोलनकारियों से लेकर महंगी कारों में आने वाले लोग डोसा, इडली, वड़ा चट करते दिखते हैं. राजनीतिक रूप से बिल्कुल विपरीत विचारधारा वाले लोग भी यहां एक साथ खड़े मिलते हैं. अटल बिहारी वाजपेयी और राहुल गांधी के घरों में यहां से गर्मागर्म डोसे जाते रहे हैं. कनॉट प्लेस के कई दफ्तरों में भी समान मंगवाया जाता है.
सुबह से रात तक सैकड़ों चटोरे स्वादिष्ट
साउथ इंडियन व्यंजनों का आनंद लेते दिखते हैं. बैठने की व्यवस्था नहीं है. लोग खड़े-खड़े या किनारे बैठकर प्लेट साफ करते हैं. भीड़ के बावजूद अव्यवस्था नहीं. कनॉट प्लेस का पुराना मद्रास होटल याद आ जाए तो कुट्टी का यह स्थान उसका लघु संस्करण लगता है. ताजगी इसकी सबसे बड़ी ताकत है.माल इतना गर्म कि मुँह में डालने
से पहले हिम्मत जुटानी पड़ती है. मद्रास होटल 2005 में बंद हो गया. उसके बाद कुट्टी और आंध्र भवन कैंटीन के भाग्य खुल गए. कुट्टी केवल वेजिटेरियन व्यंजन परोसते हैं. मात्रा, स्वाद और कीमत तीनों में वे आगे हैं. क्या आपने कभी कुट्टी के पास जाकर भोग लगाया?
खगोलीय विरासत
एक समय था जब जंतर मंतर का नाम सुनते ही राजा जयसिंह द्वितीय द्वारा 1724 में बनवाई गई खगोलीय वेधशाला याद आती थी. मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के काल में खगोलीय गणनाओं की अशुद्धियाँ दूर करने के लिए बनाई गई इस वेधशाला में सम्राट यंत्र, राम यंत्र, जय प्रकाश यंत्र जैसे तेरह उपकरण हैं. आज यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक है. पर्यटक अंदर वैज्ञानिक विरासत देख रहे होते हैं और बाहर धरने जारी रहते हैं. इस तरह जंतर मंतर विज्ञान, इतिहास, राजनीति और लोकतंत्र का अनोखा संगम बन गया है. एक ऐसी जगह जहां पुरानी दिल्ली की यादें, नई दिल्ली का निर्माण, विभाजन की छाया और आज की आवाजें एक साथ गूंजती हैं.
