Government Job Rules: क्या नौकरी करते हुए पढ़ाई की जा सकती है? क्या सरकारी कर्मचारी नौकरी के साथ ग्रेजुएशन, पीजी या कोई प्रोफेशनल डिग्री कर सकता है? और क्या प्राइवेट नौकरी करने वाला कर्मचारी अपनी नौकरी के साथ कोई भी कोर्स कर सकता है? इन सवालों को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि गौतमबुद्ध नगर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और अधिवक्ता मनोज कुमार भाटी से जुड़े एक मामले में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासन समिति ने उनकी वायुसेना में सेवा के दौरान हासिल की गई तीन वर्षीय एलएलबी डिग्री को अमान्य माना और उनका वकालत लाइसेंस निरस्त कर दिया.जिसके बाद यह सवाल समझना सबके लिए जरूरी हो गया है…
इस मामले में सिर्फ यह बात मुद्दा नहीं बनी कि उन्होंने नौकरी करते हुए पढ़ाई की थी. समिति के सामने विभागीय अनुमति, पढ़ाई के दौरान नियमित उपस्थिति, उस समय उनकी नौकरी की स्थिति और बार काउंसिल के सामने दिए गए शपथ पत्र जैसे कई सवाल थे.बात यह है कि नौकरी के साथ पढ़ाई करते समय कर्मचारी ने अपने विभाग और उस कोर्स के नियमों का पालन किया या नहीं.
वायुसेना में नौकरी और LLB: क्या है मामला?
मामला वीरेंद्र सिंह की ओर से 22 फरवरी 2021 को दाखिल शिकायत से जुड़ा है. शिकायत के मुताबिक मनोज कुमार भाटी 22 फरवरी 1991 से 30 अप्रैल 2009 तक भारतीय वायुसेना में सेवा में थे. आरोप था कि सेवा के दौरान उन्होंने विभागीय अनुमति और एनओसी के बिना उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद से पत्राचार के जरिए स्नातक की डिग्री हासिल की.इसी डिग्री के आधार पर उन्होंने 2004 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से संबद्ध जनहित कॉलेज ऑफ लॉ, ग्रेटर नोएडा में तीन वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रम में दाखिला लिया. शिकायत में यह सवाल उठाया गया कि जब वह कॉलेज से करीब 2,000 किलोमीटर दूर वायुसेना में तैनात थे तब एलएलबी की नियमित कक्षाओं में उनकी 76 प्रतिशत उपस्थिति कैसे दर्ज हुई.
उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासन समिति ने इस मामले में नौ वाद बिंदु तय किए और दोनों पक्षों को सुना. समिति ने सभी बिंदुओं का निस्तारण शिकायतकर्ता के पक्ष में किया. समिति के अनुसार इन परिस्थितियों में हर सत्र में 76 प्रतिशत उपस्थिति संभव नहीं थी और कॉलेज की अटेंडेंस शीट से यह संकेत मिला कि उनकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को कक्षाओं में उपस्थित कराया गया था. समिति ने उनकी तीन वर्षीय एलएलबी डिग्री को अमान्य और अवैध माना.
शपथ पत्र ने भी बढ़ाई मुश्किल
मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया. मनोज भाटी ने 26 अप्रैल 2009 को उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में पंजीकरण कराया था. उनके शपथ पत्र पर 24 अप्रैल 2009 की तारीख थी. इसमें उन्होंने खुद को किसी नौकरी या व्यवसाय में न होने की घोषणा की थी जबकि उपलब्ध मामले के रिकॉर्ड के अनुसार वह 30 अप्रैल 2009 तक वायुसेना में सेवा में थे.अनुशासन समिति ने इन परिस्थितियों को भी अपने निष्कर्ष में शामिल किया और मामले को अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 35 के तहत पेशेवर कदाचार माना. इस धारा के तहत जब किसी अधिवक्ता के पेशेवर या अन्य कदाचार का मामला सामने आता है तो राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति उस पर कार्रवाई कर सकती है. समिति ने इसी आधार पर मनोज भाटी का वकालत लाइसेंस निरस्त करने का आदेश दिया. इस मामले में मनोज भाटी ने आरोपों को गलत बताया. उनका कहना था कि उन्होंने वायुसेना से विधिवत अनुमति लेकर पढ़ाई की थी और उनकी डिस्चार्ज बुक में सेवा के दौरान बीए और एलएलबी हासिल करने का उल्लेख है. उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से हासिल एक वर्षीय बैचलर डिग्री को यूजीसी नियमों के तहत वैध बताया और शिकायत को द्वेषपूर्ण बताया. उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में वह अपना पक्ष आगे रखेंगे.
सरकारी नौकरी में रहते हुए पढ़ाई का क्या नियम है?
केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए स्थिति इससे काफी स्पष्ट होती है. केंद्रीय सिविल सेवा यानी सीसीएस कंडक्ट रूल्स से जुड़े सरकारी निर्देशों में कहा गया है कि सरकारी कर्मचारी अपने खाली समय में ज्ञान हासिल कर सकते हैं, लेकिन पढ़ाई से उनकी सरकारी ड्यूटी की दक्षता प्रभावित नहीं होनी चाहिए. इन निर्देशों के मुताबिक जरूरत पड़ने पर प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी से विश्वविद्यालय की डिग्री या किसी स्टडी कोर्स में दाखिला लेने से पहले पूर्व अनुमति लेने को कह सकते हैं. इसकी वजह यह है कि नियमित कोर्स में तय समय पर कक्षाएं और परीक्षा के दौरान ड्यूटी से अनुपस्थिति की जरूरत पड़ सकती है. सामान्य तौर पर अनुमति दी जा सकती है, लेकिन अगर कर्मचारी की पढ़ाई की वजह से उसकी सरकारी ड्यूटी प्रभावित होती है तो अनुमति वापस भी ली जा सकती है और दूसरी विभागीय कार्रवाई भी संभव है. इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि सरकारी कर्मचारी केवल ऑनलाइन या डिस्टेंस कोर्स ही कर सकता है बल्कि कोर्स का तरीका, कक्षाओं का समय, ड्यूटी पर उसका असर और संबंधित विभाग के सर्विस रूल महत्वपूर्ण होते हैं.
सरकारी कर्मचारी कौन से कोर्स कर सकता है?
अगर किसी सरकारी कर्मचारी को अपनी नौकरी के साथ कोई अतिरिक्त योग्यता हासिल करनी है तो सबसे सुरक्षित रास्ता यह है कि वह पहले अपने विभाग के नियम देखे और जहां आवश्यक हो वहां लिखित अनुमति ले. ऐसा कोर्स जो ड्यूटी के समय से टकराता नहीं है और विभाग की अनुमति से किया गया है उसके लिए स्थिति अलग हो सकती है.इसके अलावा मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या उच्च शिक्षा संस्थान से ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग यानी ओडीएल और मान्य ऑनलाइन प्रोग्राम भी किए जा सकते हैं, लेकिन उस विशेष संस्थान और कार्यक्रम की यूजीसी मान्यता देखना जरूरी है. यूजीसी के डिस्टेंस एजुकेशन ब्यूरो के मुताबिक मान्यता प्राप्त संस्थान से नियमों के अनुरूप ओडीएल या ऑनलाइन मोड में हासिल की गई यूजी और पीजी डिग्रियों को संबंधित पारंपरिक डिग्री के बराबर माना जाता है यानी केवल यह देखकर दाखिला नहीं लेना चाहिए कि विश्वविद्यालय ऑनलाइन डिग्री करा रहा है. यह भी देखना जरूरी है कि उस विश्वविद्यालय और उस खास कार्यक्रम को संबंधित अवधि में मान्यता मिली हुई है या नहीं.
हर प्रोफेशनल कोर्स नौकरी के साथ कर सकते हैं?
सबसे ज्यादा सावधानी उन कोर्स में जरूरी है जिनमें नियमित कक्षाएं, अनिवार्य उपस्थिति, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग या किसी पेशेवर नियामक संस्था के विशेष नियम लागू होते हैं.कानून की पढ़ाई इसका बड़ा उदाहरण है. बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने साफ कहा है कि एलएलबी और एलएलएम जैसे लॉ कोर्स को ऑनलाइन, कॉरेस्पॉन्डेंस, ओपन या डिस्टेंस लर्निंग मोड से उसकी मान्यता नहीं है.बीसीआई के अनुसार तीन वर्षीय और पांच वर्षीय एलएलबी रेगुलर कोर्स हैं और इनमें ईवनिंग क्लास का भी प्रावधान नहीं है. बीसीआई के नियमों के मुताबिक संस्थान में कक्षाओं के संचालन और उपस्थिति से जुड़े नियमों का पालन करना जरूरी है.यही वजह है कि किसी कर्मचारी के लिए सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि उसने नौकरी के बाद समय निकालकर एलएलबी कर ली. यह देखना होगा कि जिस कानून की डिग्री के आधार पर आगे वकालत करनी है वह बीसीआई के नियमों के मुताबिक मान्य तरीके से हासिल की गई है या नहीं.
नौकरी करते हुए LLB करना सही है?
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है. एक तरफ कर्मचारी के सर्विस रूल हैं और दूसरी तरफ डिग्री को मान्यता देने वाले शैक्षिक या पेशेवर नियम.मान लीजिए किसी कर्मचारी के विभाग ने उसे पढ़ाई की अनुमति दे दी. इसके बावजूद अगर उसने ऐसा कोर्स किया जो संबंधित नियामक संस्था के नियमों के मुताबिक मान्य नहीं है तो केवल विभागीय अनुमति से वह डिग्री वैध नहीं हो जाएगी.दूसरी तरफ कोई डिग्री विश्वविद्यालय के नियमों के मुताबिक मान्य हो सकती है लेकिन कर्मचारी ने उसे हासिल करने के लिए अपने विभाग से जरूरी अनुमति नहीं ली हो. ऐसी स्थिति में डिग्री की शैक्षणिक मान्यता और कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई दो अलग-अलग मुद्दे बन सकते हैं.यही फर्क मनोज भाटी के मामले को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है.
प्राइवेट नौकरी वालों के लिए क्या नियम हैं?
प्राइवेट नौकरी में सरकारी कर्मचारियों की तरह पूरे देश के सभी कर्मचारियों पर लागू होने वाला एक समान सीसीएस कंडक्ट रूल नहीं होता. यहां मुख्य रूप से कंपनी की सर्विस कंडीशन, नियुक्ति पत्र, कर्मचारी हैंडबुक, एचआर पॉलिसी और रोजगार अनुबंध देखना पड़ता है.इसका मतलब यह है कि किसी निजी कंपनी में काम करने वाला व्यक्ति अपनी नौकरी के साथ एमबीए, एमए, एमकॉम, सर्टिफिकेट कोर्स, ऑनलाइन प्रोग्राम या कोई दूसरी पढ़ाई करना चाहता है तो उसे पहले अपनी कंपनी की पॉलिसी देखनी चाहिए. अगर कंपनी की पॉलिसी में पूर्व अनुमति या जानकारी देना जरूरी है तो उसका पालन करना चाहिए लेकिन यहां भी एक बात समान है-नौकरी के साथ पढ़ाई करने की अनुमति मिल जाना किसी भी ऐसी डिग्री को मान्य नहीं बना देता जिसे संबंधित नियामक संस्था मान्यता नहीं देती.
UGC के नियमों में पढ़ाई के लिए क्या है व्यवस्था?
यूजीसी ने ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग और ऑनलाइन शिक्षा के लिए अलग नियम बनाए हैं. मान्यता प्राप्त उच्च शिक्षा संस्थानों के निर्धारित ओडीएल और ऑनलाइन प्रोग्राम के जरिए हासिल की गई यूजी और पीजी डिग्रियों को नियमों के अनुरूप होने पर पारंपरिक मोड की संबंधित डिग्री के बराबर माना जा सकता है. यूजीसी ने एक ही समय में दो अकादमिक प्रोग्राम करने को लेकर भी दिशानिर्देश जारी किए हैं और 2025 में इन दिशानिर्देशों में आंशिक बदलाव भी दर्ज है. इसलिए किसी व्यक्ति को एक साथ दो डिग्री करने से पहले संबंधित विश्वविद्यालय के मौजूदा नियम और यूजीसी की लागू गाइडलाइन देखनी चाहिए लेकिन दो डिग्री एक साथ करने का यूजीसी नियम यह नहीं कहता कि कर्मचारी अपने विभाग या कंपनी के सर्विस रूल की अनदेखी कर सकता है. रोजगार के नियम अलग से लागू रहेंगे.
वायुसेना के मामले में नियम और भी अहम क्यों हैं?
सशस्त्र बलों की नौकरी सामान्य सरकारी नौकरी जैसी नहीं होती. उनके अपने सर्विस रूल और नीतियां होती हैं. इसका उदाहरण 2023 का दिल्ली हाईकोर्ट का एक मामला भी है जिसमें एक एयरमैन ने आईआईएम जम्मू में उच्च शिक्षा के लिए अनुमति और स्टडी लीव की मांग की थी. अदालत ने एयरफोर्स की लागू नीति का हवाला देते हुए स्टडी लीव देने से इनकार किया और कहा कि ऐसी नीति में बदलाव का अधिकार एयरफोर्स के पास है. उस मामले में उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार एयरफोर्स की नीति के तहत स्टडी लीव अधिकारियों के लिए 15 वर्ष की सेवा और सेवा के लिए उपयोगी अध्ययन जैसी शर्तों से जुड़ी थी.इससे यह समझ आता है कि सिर्फ सरकारी कर्मचारी होना और किसी खास सेवा में कर्मचारी होना एक जैसी स्थिति नहीं है. पुलिस, सेना, वायुसेना, रेलवे, बैंक, विश्वविद्यालय, राज्य सरकार और दूसरे विभागों में पढ़ाई से जुड़े अलग-अलग सर्विस रूल हो सकते हैं.
नौकरी में रहते हुए कौन-कौन से कोर्स कर सकते हैं?
नौकरी के साथ पढ़ाई के मामले में कोई ऐसी सूची नहीं है जिसमें लिखा हो कि ये 10 कोर्स हर कर्मचारी कर सकता है और ये 10 कोर्स कोई नहीं कर सकता. नियम कर्मचारी की सेवा और कोर्स दोनों पर निर्भर करते हैं. सामान्य तौर पर मान्यता प्राप्त संस्थान से किए जाने वाले ऑनलाइन, ओडीएल, सर्टिफिकेट, डिप्लोमा या ऐसी डिग्री जिनमें नौकरी के समय नियमित उपस्थिति की बाध्यता नहीं है, कई मामलों में संभव हो सकती हैं लेकिन सरकारी कर्मचारी को अपने विभाग के लागू नियम और जरूरी अनुमति जरूर देखनी चाहिए. प्राइवेट कर्मचारी को अपनी कंपनी की नीति देखनी चाहिए. वहीं नियमित कक्षाओं और अनिवार्य उपस्थिति वाले प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला लेने से पहले ज्यादा सावधानी जरूरी है. खासकर कानून जैसे क्षेत्र में संबंधित नियामक संस्था के नियमों का पालन करना अनिवार्य है. बीसीआई ने एलएलबी को रेगुलर कोर्स बताया है और ऑनलाइन या डिस्टेंस मोड से एलएलबी को मान्यता नहीं दी है.
कौन सी गलती परेशानी बन सकती है?
सबसे बड़ी गलती यह होगी कि कोई कर्मचारी बिना नियम देखे किसी नियमित कोर्स में दाखिला ले ले और बाद में यह दावा करे कि वह ड्यूटी के साथ पढ़ाई कर रहा था. अगर कोर्स में नियमित उपस्थिति जरूरी है लेकिन कर्मचारी उसी समय किसी दूसरे शहर में नौकरी कर रहा है तो उपस्थिति और पढ़ाई की वास्तविकता पर सवाल उठ सकते हैं. अगर विभाग से अनुमति जरूरी थी और वह नहीं ली गई तो विभागीय कार्रवाई का खतरा अलग हो सकता है और अगर डिग्री किसी नियामक संस्था के नियमों के खिलाफ हासिल की गई है तो उस डिग्री की मान्यता पर भी सवाल उठ सकता है.
आपके पास नौकरी के साथ डिग्री है?
अगर आप नौकरी करते हुए पहले से कोई डिग्री या प्रोफेशनल कोर्स कर चुके हैं तो घबराने के बजाय सबसे पहले अपने रिकॉर्ड की जांच करना ज्यादा जरूरी है. देखें कि दाखिले के समय आपका संस्थान और कोर्स मान्यता प्राप्त था या नहीं, कोर्स का मोड क्या था, क्या नियमित उपस्थिति जरूरी थी, आपने उस अवधि में विभाग या कंपनी से अनुमति ली थी या नहीं और आपके पास उस अनुमति का लिखित रिकॉर्ड मौजूद है या नहीं.सरकारी कर्मचारी हैं तो अपने सर्विस रूल और विभागीय अनुमति की जांच करें. प्राइवेट नौकरी में हैं तो अपॉइंटमेंट लेटर और कंपनी की एचआर पॉलिसी देखें और अगर डिग्री किसी प्रोफेशन में प्रवेश या लाइसेंस के लिए इस्तेमाल होनी है तो उस पेशे की नियामक संस्था के नियम भी जरूर देखें.
