Pratibha Vishwakarma Hanslal Katihar Case : सोशल मीडिया पर इन दिनों रिश्तों, बेवफाई और कामयाबी को लेकर कई तरह की बातें वायरल होती रहती हैं. कभी कहा जाता है कि पति की तरक्की के बाद पत्नी बदल जाती है, तो कभी पत्नी की सफलता के बाद पति के व्यवहार पर सवाल उठते हैं. लेकिन क्या सचमुच कामयाबी इंसान को बदल देती है? क्या पैसा और सामाजिक रुतबा मिलने के बाद पुराने रिश्ते पीछे छूटने लगते हैं? या फिर रिश्तों में आने वाली दूरी की वजहें कहीं ज्यादा गहरी होती हैं? बिहार के कटिहार से सामने आई प्रतिभा विश्वकर्मा और हंसलाल की कहानी ने एक बार फिर ऐसे सवालों को चर्चा में ला दिया है. पति का आरोप है कि प्रेम विवाह के बाद उन्होंने पत्नी की पढ़ाई और नौकरी की तैयारी में हर तरह का सहयोग किया और लाखों रुपये खर्च किए, लेकिन पुलिस में नौकरी मिलने के बाद उनके रिश्ते में दूरी आ गई और आज वह मिलने से भी मना कर रही है.
हालांकि, इस मामले में प्रतिभा का पक्ष सामने आना बाकी है. इसलिए आरोपों को अंतिम सच मानने के बजाय इस घटना को रिश्तों, महत्वाकांक्षाओं और आपसी भरोसे के नजरिये से समझना जरूरी है.
क्या ज्योति मौर्य मामले की तर्ज पर दोहराया जा रहा इतिहास?
यह कहानी लोगों को उत्तर प्रदेश के चर्चित ज्योति और आलोक मौर्य मामले की याद दिलाती है. उस प्रकरण में भी आलोक मौर्य ने अपनी पत्नी ज्योति को पढ़ा-लिखाकर पीसीएस (UPPSC) अधिकारी बनाया था, लेकिन अधिकारी बनने के बाद दोनों के रिश्तों में ऐसी खटास आई कि मामला अदालत और मीडिया की सुर्खियों तक पहुंच गया. इन घटनाओं के बार-बार सामने आने से समाज में एक लंबी बहस छिड़ गई है कि क्या उच्च महत्वाकांक्षाएं और पद-प्रतिष्ठा आते ही पुराने रिश्ते बोझ लगने लगते हैं?
जानें मनोवैज्ञानिक नजरिया-
मनोविज्ञान के नजरिये से देखें तो सफलता अपने आप में किसी को बेवफा नहीं बनाती. तरक्की के साथ व्यक्ति का आत्मविश्वास, सामाजिक दायरा, आर्थिक स्वतंत्रता और भविष्य को लेकर अपेक्षाएं बदल सकती हैं. इससे रिश्ते में संतुलन भी बदल सकता है, खासकर तब जब दोनों साथी एक-दूसरे की बदलती जरूरतों और भूमिकाओं के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते.
मसलन, अगर शादी के समय दोनों ने एक तरह की जिंदगी की कल्पना की थी, लेकिन नौकरी मिलने के बाद उनकी प्राथमिकताएं अलग हो गईं, तो तनाव पैदा हो सकता है. हालांकि, यह हर सफल व्यक्ति या हर रिश्ते के साथ हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है. रिश्ते में दूरी आने के पीछे संवाद की कमी, पुराने मतभेद, परिवार का दबाव, भावनात्मक असंतोष या भरोसे की समस्या जैसी कई वजहें हो सकती हैं.
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति अचानक संघर्ष के दौर से निकलकर उच्च सामाजिक या आर्थिक स्थिति (जैसे सरकारी नौकरी या प्रशासनिक पद) में पहुंचता है, तो उसके भीतर ‘आईडेंटिटी शिफ्ट’ (पहचान में बदलाव) और ‘कॉग्निटिव डिसोनेंस’ (मानसिक असंतुलन) की स्थिति पैदा हो सकती है.
यही नहीं, कई बार सफलता इंसान की प्राथमिकताओं को रातों-रात बदल देती है. उसे अपने पुराने दायरे और संघर्ष के दिनों के साथी अपनी नई जीवनशैली के अनुरूप नहीं लगते. जब व्यक्ति व्यक्तिगत ऊंचाइयों को छू लेता है, तो रिश्तों में जो भावनात्मक निवेश (Emotional Investment) होता है, वह भी कम होने लगता है. ‘अपग्रेडेशन’ की यह दौड़ इंसान को अपनों से दूर कर देती है, जिससे वह अकेलेपन या नए आकर्षण की चपेट में आ जाता है.
रिश्तों की कीमत पर सफलता कितनी जायज?
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या तरक्की की कीमत अपने जीवनसाथी के आंसुओं और टूटे हुए भरोसे को चुकाकर वसूली जानी चाहिए? निसंदेह, हर महिला या पुरुष को अपने सपनों को पंख देने और आगे बढ़ने का पूरा अधिकार है. शिक्षा और करियर किसी भी व्यक्ति के विकास की रीढ़ हैं. लेकिन अगर सफलता का स्वाद चखते ही इंसान अपने उन लोगों को भूल जाए जिन्होंने सबसे बुरे वक्त में उसका हाथ थामा था, तो ऐसी कामयाबी खोखली हो जाती है.
यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस रिश्ते में दूरी क्यों आई या इसके लिए कौन जिम्मेदार है. लेकिन यह घटना हमें एक जरूरी मुद्दे पर सोचने का मौका जरूर देती है.
लेकिन यहां सवाल एक और मन में उठता है कि क्या हम अपने साथी के सपनों को इसलिए पूरा होते देखना चाहते हैं कि वह खुश और आत्मनिर्भर बने, या इसलिए कि उसकी सफलता के बाद भी वह हमारी अपेक्षाओं के मुताबिक ही जिए? कहीं ऐसा तो नहीं कि अनजाने में हम अपने साथी की सफलता और उसकी बदलती जिंदगी पर अधिकार समझने लगते हैं.
अंत में यह कहना जरूरी है कि कामयाबी किसी रिश्ते की परीक्षा ले सकती है, लेकिन उसका नतीजा पहले से तय नहीं होता. मजबूत रिश्ते में दोनों साथी एक-दूसरे की तरक्की से असुरक्षित होने के बजाय साथ आगे बढ़ना सीखते हैं. और जब रास्ते अलग होने लगें, तो आरोप लगाने से पहले गहरी बातचीत की कोशिश करते हैं.
