WhatsApp पर इतिहास कितना सच, कितना झूठ? प्रो. मनीषा मिश्रा ने बताई इतिहासकारों की जिम्मेदारी

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WhatsApp पर इतिहास कितना सच, कितना झूठ? प्रो.मनीषा ने बताई जिम्मेदारी

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New Delhi News: दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो. मनीषा मिश्रा अग्निहोत्री की नई पुस्तक का विमोचन हुआ. यह किताब मध्यकालीन भारत में फारसी लेखकों के जरिए हिंदू परंपराओं की समझ पर आधारित है. इसका विमोचन एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुआ, जिसमें भारतीय इतिहास पर चर्चा की गई.

नई दिल्ली: इतिहास के बारे में वर्तमान में जितनी चर्चा हो रही है, उतनी पहले कभी नहीं हुई. आज व्हाट्सएप के जरिए लोग खुद को इतिहासकार मानने लगे हैं. वहां आने वाली गलत जानकारी को ही सही मान लेते हैं. इतिहास का काम वास्तविक इतिहासकारों पर ही छोड़ देना चाहिए, क्योंकि एक पेशेवर इतिहासकार किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तमाम प्रामाणिक स्रोतों का इस्तेमाल करता है. लंबी रिसर्च के बाद तथ्य पेश करता है. यह विचार प्रो. मनीषा मिश्रा अग्निहोत्री के हैं. जिनकी पुस्तक ‘हिंदूज़ एंड देयर रिलिजन इन मीडीवल इंडिया: अ स्टडी बेस्ड ऑन द वर्क्स ऑफ अबुल फ़ज़ल, ‘मोबेद’, एंड दारा शिकोह’ का विमोचन गुरुवार को इंडिया हैबिटेट सेंटर में किया गया.

मौका था जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन रीविजिटिंग द कॉन्टूर्स ऑफ इंडियन सिविलाइज़ेशन : कल्चर, हेरिटेज, गांधी एंड इंडिजेनस एपिस्टेमोलॉजीज का. यह कार्यक्रम हेरिटेज द हिस्ट्री एसोसिएशन, गांधी स्टडी सर्कल और हेरिटेज क्लब द्वारा आयोजित किया गया. इसमें भारतीय सभ्यता के विविध पहलुओं पर विद्वानों के बीच चर्चा हुई.

15वीं सदी में पहली बार हुआ हिंदू शब्द का इस्तेमाल
आपको बता दें कि प्रोफेसर मनीष मिश्रा की यह किताब विमोचन से पहले ही दिल्ली में चर्चित हो रही है. खास तौर पर इतिहासकार इसकी काफी तारीफ कर रहे हैं, क्योंकि इन्होंने किताब में मध्यकालीन भारत में हिंदू धर्म और परंपराओं को समझने की कोशिश की गई है. इसके लिए अबुल फजल, ‘मोबेद’ और दारा शिकोह के कामों का अध्ययन किया गया है. किताब में खास तौर पर यह समझने की कोशिश की गई है कि मध्यकालीन भारत में फारसी लेखकों और विद्वानों ने हिंदू परंपराओं को किस तरह देखा और समझा.

किताब के बारे में प्रो. मनीषा मिश्रा अग्निहोत्री ने कहा कि यह उनके लिए मध्यकालीन भारत में फारसी लोगों और विद्वानों के हिंदू परंपराओं से जुड़ाव के सवाल पर लंबे समय से चल रहा बौद्धिक अध्ययन है. उन्होंने यह भी बताया कि 16वीं और 17वीं सदी में हिंदू धर्म को किस तरह से देखा जाता था, समझा जाता था और इन बड़े तीनों लेखकों ने हिंदू धर्म को किस तरह से समझा. इसी को उनकी किताब में बताया गया है. साथ ही मनीष मिश्रा ने यह भी कहा कि 15वीं सदी में पहली बार हिंदू शब्द इस्तेमाल हुआ था. 15वीं सदी से पहले कभी भी किसी ने खुद को हिंदू नहीं कहा था.

उद्घाटन सत्र में कई विद्वानों ने रखे विचार
इस सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो. स्वाति पाल, अनुराधा कृष्णा और प्रो. प्रभु मोहापात्रा ने अपने विचार रखे. वहीं प्रो. अमर फारूकी ने मुख्य वक्ता के तौर पर संबोधित किया. उद्घाटन सत्र में मध्यकालीन भारत, भारतीय संस्कृति और इतिहास को अलग-अलग नजरिए से समझने पर भी चर्चा हुई. प्रो. स्वाति पाल ने कहा कि मध्यकालीन दौर में भी भारत को देखने के लिए सिर्फ एक नजरिया नहीं था. उस समय भी भारत और उसकी परंपराओं को अलग-अलग नजरिए से समझा जाता था.

उद्घाटन सत्र के बाद सवाल-जवाब का दौर भी हुआ. इसमें प्रतिभागियों ने भारतीय इतिहास, संस्कृति और मध्यकालीन भारत से जुड़े विषयों पर सवाल पूछे और विद्वानों ने उनके जवाब दिए. सम्मेलन का आयोजन भारतीय सभ्यता को संस्कृति, इतिहास और विरासत के साथ-साथ गांधी और पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों के संदर्भ में समझने के उद्देश्य से किया गया है. सम्मेलन का दूसरा और अंतिम दिन 9 अक्टूबर को होगा, जिसमें इन विषयों पर आगे भी विद्वानों के बीच चर्चा होगी. सम्मेलन 9 अक्टूबर को संस्कृति, विरासत, गांधी और देशज ज्ञान प्रणालियों पर और भी विद्वतापूर्ण चर्चाओं के साथ जारी रहेगा.

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Amit Ranjan

अमित रंजन वर्तमान में News18 में बिहार, झारखंड और दिल्ली से जुड़ी खबरों के समन्वय और संपादन का कार्य देख रहे हैं. खोजी पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है. राजनीति, शिक्षा, खेल, क्राईम और मौसम जैसे विषयों …

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