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दिल्ली में पिछले 11 वर्षों के दौरान बच्चों को गोद लेने के दिल छूने वाले आंकड़े सामने आए हैं. राजधानी में लड़कों की तुलना में कहीं अधिक लड़कियों को नए परिवार और आशियाना मिला है. महिला एवं बाल विकास विभाग के अनुसार इस अवधि में 1000 से अधिक बेटियों और करीब 760 लड़कों को नया परिवार मिला है.
राजधानी दिल्ली में पिछले 11 वर्षों के दौरान बच्चों को गोद लेने के मामलों में लड़कियों की संख्या लड़कों से काफी आगे रही है. (Image: AI)
दिल्ली न्यूज. कभी वंश चलाने के नाम पर लोगों के बीच केवल बेटों की ही चाहत होती थी. लेकिन, बदलते वक्त के साथ लोगों की सोच में अब तेजी से बदलाव होता नजर आ रहा है. इस बदलाव की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर दिल्ली से सामने आई है. बीते एक दशक की बात करें तो दिल्लीवालों ने बेटों का मोह छोड़ ऐसी बेटियों के लिए अपने घर के दरवाजे खोले हैं, जिनसे उनका खून का कोई रिश्ता नहीं था. वहीं, बेटों को दुलार दिखाने में उनकी कंजूसी साफ नजर आई है. जी हां, यहां पर हम बात दिल्ली में गोद लिए गए बच्चों की कर रहे हैं. महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि बीते 11 वर्षों में दिल्ली में गोद लिए गए बेटों से बेटियों की संख्या करीब 24 फीसदी अधिक रही है. 2015-16 से 2025-26 के बीच जहां दिल्ली में 1000 से अधिक लाड़लियों को नया घर और परिवार मिला, वहीं नया आशियाना पाने वाले बेटों की संख्या करीब 760 रही.
दिलचस्प कहानियां बयां कर रहे हैं आंकड़े
- गोद लेने के इन 11 वर्षों के सफर पर नजर डालें तो आंकड़े कई दिलचस्प कहानियां बयां कर रहे हैं. 2015-16 में गोद लेने का क्रेज अपने चरम पर था. इस साल रिकॉर्ड 178 बच्चों को नए परिवार मिले थे.
- इसके बाद के सालों में इस संख्या में कुछ उतार-चढ़ाव और गिरावट देखने को मिली. कोरोना और अन्य प्रशासनिक बदलावों के चलते 2021-22 में यह आंकड़ा लुढ़ककर मात्र 87 पर आ गया.
- हालांकि, इसके बाद धीरे-धीरे स्थिति सुधरने लगी और लोग बच्चों को गोद लेने के लिए फिर से आगे आए. अगर बात 2026 की करें तो जनवरी से सितंबर के बीच कुल 71 बच्चों को गोद लिया जा चुका है.
- महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में सबसे ज्यादा 14 बच्चों को अप्रैल में और सबसे कम 2 बच्चे अगस्त के महीने में गोद लिए गए.
खास बच्चों के लिए जगी उम्मीद की किरण
इस पूरी रिपोर्ट का सबसे दिल को छू लेने वाला पहलू 2025-26 में सामने आया. दरअसल, हम सब यही मानते हैं कि बच्चों को गोद लेते समय परिवार उनकी सुंदरता को भले ही न देखें, पर यह जरूर सुनिश्चित करते हैं कि उनकी परिवार का हिस्सा बनने वाला बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ्य हो. शारीरिक तौर पर वह किसी चुनौती का सामना ना कर रहा हो. लेकिन 2025-26 का साल इस मायने में बिल्कुल अलग रहा. इस साल कई परिवार ऐसे रहें, जिन्होंने कई ऐसे खास बच्चों को गोद लिया, जो शारीरिक या मानसिक तौर पर कमजोर थे. गोद लिए गए ऐसे बच्चों की संख्या करीब छह थी.
एक्सपर्ट्स की मानें तो ऐसे बच्चों को पालना और उनकी देखभाल करना एक बड़ी जिम्मेदारी होती है. नतीजतन, इन्हें गोद लेने की दर लगभग शून्य हुआ करती थी. लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग के खास प्रयासों, संभावित माता-पिता की काउंसलिंग और कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए अंसभव सी दिखने वाली बात को संभव बनाया गया है. खुशी की बात यह है कि इन छह खास बच्चों में से 2 बच्चों को देश के भीतर ही और 4 बच्चों को विदेश में रहने वाले परिवारों ने अपनाया है.
कैसे पूरी होती है गोद लेने की प्रक्रिया?
बच्चों को गोद लेने की यह प्रक्रिया किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम और गोद लेने से जुड़े नियमों के तहत पूरी की जाती है. नियमों के तहत बच्चों को चार आयु वर्गों में बांटा गया है, ताकि माता-पिता अपनी पसंद और सहूलियत के हिसाब से बच्चे चुन सकें. इन आयु वर्गों में पहला वर्ग 2 साल तक, दूसरा वर्ग 2 से 4 साल तक, तीसरा वर्ग 4 से 8 साल और चौथा वर्ग 8 से 18 साल के बीच है.
