AAP Attack on Justice Swarna Kanta: दिल्ली के कथित शराब घोटाले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उनसे (जज से) इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने (Recuse) की मांग की गई थी. इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.
आप और सौरभ भारद्वाज ने बोला तीखा हमला-
आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री सौरभ भारद्वाज ने जज के इस फैसले को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है. उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई अहम बिंदु उठाए:
10 जायज कारण दिए फिर भी फैसला निराशाजनक: भारद्वाज ने कहा कि अरविंद केजरीवाल की ओर से केस से हटने के 10 बेहद जायज कारण बताए गए थे, फिर भी जज स्वर्ण कांता शर्मा का केस से न हटने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है.
सत्येंद्र जैन मामले का दिया हवाला: उन्होंने याद दिलाया कि सत्येंद्र जैन के मामले में जब जज ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) से सख्त सवाल किए थे, तो केंद्र सरकार ने न्याय न मिलने की आशंका जताई थी और तुरंत जज बदल दिया गया था.
न्यायपालिका की छवि पर सवाल: सौरभ भारद्वाज ने तंज कसते हुए कहा कि अगर हाईकोर्ट को न्यायपालिका की छवि की इतनी ही चिंता होती, तो जज को ‘भ्रष्ट’ कहने पर सीएम रेखा गुप्ता पर कार्रवाई जरूर होती.
सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी पर चिंता: उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा लगाए गए आरोपों पर चुप रहता है, तो पूरी न्यायिक प्रणाली पर सवाल उठना लाजमी है.
अपने फैसले में क्या कहा?
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने फैसले में बेहद कड़े और स्पष्ट शब्दों में बताया कि उन्होंने केस से हटने से इनकार क्यों किया. उनके अंग्रेजी में दिए गए फैसले का आसान हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार है:
सबसे आसान रास्ता था भाग जाना
जस्टिस स्वर्णा कांत, ‘मेरे सामने यह सवाल बिल्कुल साफ था कि क्या मुझे इस केस से हट जाना चाहिए? मेरी ईमानदारी (निष्पक्षता) और मेरे सम्मान को चुनौती दी गई थी. मेरे लिए सबसे आसान रास्ता यही था कि मैं बिना कोई सुनवाई किए चुपचाप इस केस से हट जाती. लेकिन, मैंने इस अर्जी पर फैसला करने का निश्चय किया क्योंकि यह बात सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका (संस्था) की थी.’
संविधान की शपथ और कोर्ट का सन्नाटा
जस्टिस स्वर्णा कांत, ‘जब मैंने यह फैसला लिखना शुरू किया, तो पूरे कोर्ट रूम में एकदम सन्नाटा छा गया था. मेरे ऊपर उस जज होने का भारी वजन था, जिसने भारत के संविधान की शपथ ली है. मुझे एहसास हुआ कि आज एक जज के रूप में मेरी चुप्पी की परीक्षा ली जा रही है. अब सवाल सिर्फ एक जज या संस्था की निष्पक्षता का था.’
दोहरी बातें और न्यायपालिका कटघरे में
जस्टिस स्वर्णा कांत, ‘मैंने अपने 34 साल के न्यायिक करियर की तरह ही, बिना किसी आरोप से डरे या प्रभावित हुए यह फैसला लिया है. सबसे मुश्किल बात यह रही कि बहस के दौरान उल्टी (विरोधाभासी) बातें कही गईं. उन्होंने कहा कि उन्हें जज की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है, लेकिन वे केस इसलिए ट्रांसफर करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें ‘पक्षपात का डर’ है. याचिकाकर्ता ने पूरी न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है.’
अपने हक में फैसला तो ठीक, खिलाफ जाए तो शिकायत?
जस्टिस स्वर्णा कांत ‘मैंने इस विवाद को सुलझाने का रास्ता चुना है. न्यायपालिका की असली ताकत आरोपों का डटकर सामना करने में है. एक ऐसी न्यायिक प्रक्रिया, जिसे आप तब बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लेते हैं जब फैसला आपके हक में आता है; उसी प्रक्रिया पर आप तब सवाल नहीं उठा सकते जब फैसला दूसरे पक्ष के हक में चला जाए.’
सवाल-जवाब
आम आदमी पार्टी (AAP) ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के फैसले पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि 10 जायज कारण देने के बावजूद जज का न हटना निराशाजनक है. उन्होंने सत्येंद्र जैन मामले का उदाहरण देते हुए न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं.
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने केस से खुद को अलग करने (Recuse) से क्यों मना कर दिया?
जस्टिस शर्मा ने कहा कि उनके लिए केस से हट जाना सबसे आसान था, लेकिन चूंकि सवाल पूरी न्यायपालिका के सम्मान और निष्पक्षता का था, इसलिए उन्होंने संविधान की शपथ का मान रखते हुए बिना डरे मामले की सुनवाई करने का फैसला किया.
जज ने याचिकाकर्ता की दलीलों में क्या विरोधाभास बताया?
जज ने कहा कि याचिकाकर्ता ने बहस में दोहरी बातें कीं. एक तरफ उन्होंने कहा कि उन्हें जज की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है, और दूसरी तरफ उन्होंने ‘पक्षपात का डर’ बताकर केस ट्रांसफर करने की मांग की. इसे जज ने पूरी न्याय व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाला बताया.
