दिल्ली के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है. वैश्विक स्तर पर ईंधन संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयला व गैस की कीमतों में आए भारी उछाल के कारण दिल्ली में बिजली खरीद लागत (PPAC) में करीब 31 फीसदी तक बढ़ोतरी का भारी दबाव बन गया था. अगर यह बढ़ोतरी सीधे लागू हो जाती तो आम जनता के मंथली बजट पर बड़ा झटका लगना तय था. हालांकि, दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता और दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) के समय पर किए गए हस्तक्षेप से इस बड़ी मार को टाल दिया गया है. सरकार ने इस संभावित 31% की बढ़ोतरी को रोककर प्रभावी PPAC को करीब 17.5% से 17.9% के बीच यानी लगभग 17 फीसदी पर सेट कर दिया है. इस फैसले के बाद अब गैर-सब्सिडी वाले आम उपभोक्ताओं पर केवल 2.4% का ही अतिरिक्त असर पड़ेगा जबकि सब्सिडी का लाभ ले रहे उपभोक्ताओं की जेब पर कोई नया बोझ नहीं आएगा.
दिल्ली बिजली बिल पर बड़े फैसले की 5 अहम बाते
• 31% का बड़ा खतरा टला: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, एलएनजी और कोयले की आसमान छूती कीमतों के चलते डिस्कॉम्स (DISCOMs) पर बिजली खरीद लागत 31% तक बढ़ाने का दबाव था, जिसे सरकार ने रोक दिया.
• 17% के दायरे में सीमित हुआ बिल: मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और ऊर्जा मंत्री आशीष सूद के सीधे हस्तक्षेप के बाद DERC ने प्रभावी PPAC (पावर परचेज एडजस्टमेंट कॉस्ट) को करीब 17.5% से 17.9% के बीच ही सीमित रखने का फैसला किया.
• आम जनता पर महज 2.4% का असर: इस पूरे एडजस्टमेंट के बाद दिल्ली के गैर-सब्सिडी वाले उपभोक्ताओं पर तत्काल रूप से केवल 2.4% अतिरिक्त लागत का ही आंशिक प्रभाव पड़ेगा.
• 32 लाख से अधिक परिवारों को सुरक्षा: सरकार के इस कंज्यूमर प्रोटेक्शन आर्किटेक्चर कदम की बदौलत दिल्ली के 32.34 लाख से ज्यादा बिजली उपभोक्ताओं को सीधे तौर पर बिल में बड़ी राहत दी गई है.
• सब्सिडी वाले उपभोक्ताओं को झटका नहीं: दिल्ली सरकार ने साफ किया है कि जो उपभोक्ता पहले से बिजली सब्सिडी का लाभ उठा रहे हैं, उनके मौजूदा बिल पर इस नई व्यवस्था का कोई असर नहीं पड़ेगा.
वैश्विक संकट के बीच कैसे हुआ यह लागत का खेल?
इस पूरे मामले को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि PPAC यानी पावर परचेज एडजस्टमेंट कॉस्ट क्या है. यह कोई नया टैक्स नहीं है बल्कि बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) द्वारा उत्पादक कंपनियों से बिजली खरीदने की लागत में होने वाले उतार-चढ़ाव का एक वैधानिक समायोजन है. हाल के दिनों में पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते संघर्ष और सप्लाई चेन बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और थर्मल कोयले के दाम तेजी से बढ़े. दिल्ली की डिस्कॉम कंपनियों के लिए गैस आधारित और ओपन मार्केट से पीक डिमांड के दौरान बिजली खरीदना बेहद महंगा साबित हो रहा था जिससे औसत खरीद लागत 31% तक ऊपर चली गई.
2.4% की वृद्धि का मतलब क्या?
तकनीकी रूप से अगर सरकार और नियामक संस्था (DERC) इस पर चुप्पी साधे रहती तो डिस्कॉम्स पूरा 31% का बोझ उपभोक्ताओं के मासिक बिलों में जोड़ देतीं. लेकिन दिल्ली सरकार ने जनहित को ध्यान में रखते हुए इस लागत को चरणबद्ध तरीके से रिकवर करने और कुछ हिस्सा डिस्कॉम्स को खुद वहन करने का निर्देश दिया. DERC ने पहले PPAC को 14.5% पर फ्रीज किया और फिर गहन समीक्षा के बाद उसमें केवल 2.4% की मामूली वृद्धि की इजाजत दी. इसी वजह से यह पूरा मामला कुल 17.9% के करीब जाकर थम गया, जो दिल्लीवासियों के लिए एक बड़ी राहत है.
सवाल-जवाब
PPAC क्या होता है और दिल्ली में इसके बढ़ने की मुख्य वजह क्या थी?
PPAC का मतलब पावर परचेज एडजस्टमेंट कॉस्ट होता है. यह डिस्कॉम कंपनियों द्वारा बिजली खरीदने की लागत में बदलाव का समायोजन है. पश्चिम एशिया में तनाव के चलते एलएनजी, कच्चे तेल और अंतरराष्ट्रीय कोयले की कीमतें बढ़ने तथा पीक डिमांड में महंगी बिजली मिलने के कारण दिल्ली में यह लागत 31% तक बढ़ गई थी.
दिल्ली सरकार और DERC ने मिलकर बिजली बिलों की इस भारी बढ़ोतरी को कैसे काबू किया?
सीएम रेखा गुप्ता और DERC ने मिलकर उपभोक्ताओं पर एकमुश्त बोझ डालने के बजाय डिस्कॉम कंपनियों को निर्देश दिए कि वे इस लागत को चरणबद्ध तरीके से रिकवर करें. DERC ने PPAC को नियंत्रित करते हुए केवल 2.4% अतिरिक्त बढ़ोतरी की अनुमति दी, जिससे प्रभावी PPAC करीब 17% (17.5% से 17.9%) के बीच ही सीमित हो गया.
इस नए बिजली बिल मॉडल का दिल्ली के किस श्रेणी के उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा?
दिल्ली सरकार की इस व्यवस्था से सब्सिडी पाने वाले उपभोक्ताओं के बिल पर कोई नया असर नहीं पड़ेगा. वहीं, गैर-सब्सिडी वाले BSES और अन्य आम घरेलू उपभोक्ताओं पर केवल 2.4% का ही आंशिक असर दिखेगा. कमर्शियल और इंडस्ट्रियल श्रेणी पर अनुपातिक प्रभाव पड़ सकता है, जिसकी सरकार लगातार निगरानी कर रही है.
