प्रियांक पांचाल कौन हैं वैभव सूर्यवंशी की उपकप्तानी पर बोलने वाले? क्या 15 की उम्र में कप्तानी देना वाकई गलत है

नई दिल्ली. भारतीय घरेलू क्रिकेट में जब भी किसी युवा खिलाड़ी का सितारा चमकता है, तो उसके प्रदर्शन से ज्यादा चर्चा इस बात की होने लगती है कि उसे कब, कितनी और किस तरह की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए. हाल में दलीप ट्रॉफी के लिए ईस्ट जोन की टीम का ऐलान हुआ और उसमें बिहार के 15 वर्षीय युवा सनसनी वैभव सूर्यवंशी को उपकप्तान बनाया गया. इस फैसले के आते ही गुजरात के पूर्व कप्तान प्रियांक पांचाल ने सोशल मीडिया पर लिखा कि सेलेक्टर्स को वैभव को उपकप्तान बनाने से बचना चाहिए था, क्योंकि इससे इस युवा खिलाड़ी पर बेवजह का दबाव पड़ेगा और पहले उसे रेड बॉल क्रिकेट की बारीकियां समझनी चाहिए.

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रियांक पांचाल (Priyank Panchal) की यह सलाह वाकई में वैभव सूर्यवंशी (Vaibhav Sooryavanshi) के भले के लिए है, या फिर यह एक ऐसे स्थापित खिलाड़ी की संकीर्ण सोच है जो भारतीय क्रिकेट में आ रहे बदलाव को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा? आखिर प्रियांक पांचाल होते कौन हैं वैभव सूर्यवंशी की उपकप्तानी और उनकी काबिलियत पर फैसला सुनाने वाले?

प्रतिभा किसी उम्र या तजुर्बे की मोहताज नहीं होती
क्रिकेट का इतिहास गवाह है कि महानता उम्र देखकर नहीं आती. सचिन तेंदुलकर ने जब 16 साल की उम्र में वसीम अकरम और वकार यूनिस जैसी खूंखार गेंदबाजी के सामने कदम रखा था, तब भी कई ‘विशेषज्ञों’ ने कहा था कि उन्हें इतनी जल्दी इंटरनेशनल स्टेज पर नहीं उतारना चाहिए. लेकिन सचिन ने अपने बल्ले से हर आलोचक का मुंह बंद कर दिया था.

वैभव सूर्यवंशी केवल एक 15 साल के क्रिकेटर नहीं हैं. वह उस नई सोच और आक्रामक मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आज के दौर के भारतीय क्रिकेट की पहचान बन चुकी है. छोटी सी उम्र में जिस तरह से वैभव ने अपनी बल्लेबाजी से दिग्गजों को प्रभावित किया है, वह यह साबित करता है कि उनका आत्मविश्वास और क्रिकेटिंग समझ किसी परिपक्व खिलाड़ी से कम नहीं है. ऐसे में जब ईस्ट जोन के सेलेक्टर्स ने उनकी प्रतिभा और लीडरशिप पोटेंशियल पर भरोसा जताया है, तो उस पर सवाल उठाना सीधे तौर पर चयनकर्ताओं के विवेक और वैभव की क्षमता पर उंगली उठाने जैसा है.

प्रियांक पांचाल का अपना करियर और सोच का दायरा
प्रियांक पांचाल निश्चित रूप से गुजरात क्रिकेट के एक बड़े नाम रहे हैं. उन्होंने घरेलू क्रिकेट में रनों का अंबार लगाए हैं और लंबे समय तक गुजरात की कप्तानी भी की है. लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि घरेलू स्तर पर रनों का पहाड़ खड़ा करने के बावजूद प्रियांक कभी भी भारतीय नेशनल टीम का हिस्सा नहीं बन पाए. उनका अपना खेल हमेशा एक पारंपरिक और सुरक्षित सोच के इर्द-गिर्द घूमता रहा.

जो खिलाड़ी खुद अपने पूरे करियर में पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर आक्रामक या आउट-ऑफ-द-बॉक्स सोच का प्रदर्शन नहीं कर पाया, वह एक ऐसे युवा की कप्तानी पर सवाल उठा रहा है जो बेधड़क और मॉडर्न क्रिकेट खेलने के लिए जाना जाता है. प्रियांक पांचाल का यह बयान आधुनिक क्रिकेट की बदलती रफ्तार को न समझ पाने का नतीजा लगता है.

उपकप्तानी दबाव नहीं, आत्मविश्वास का जरिया है
प्रियांक पांचाल का तर्क है कि उपकप्तानी देने से वैभव पर ‘अनावश्यक दबाव’ पड़ेगा. लेकिन क्या वाकई में ऐसा है? आज का युवा खिलाड़ी दबाव से डरता नहीं, बल्कि दबाव में बिखरने के बजाय निखरता है. उपकप्तानी जैसी जिम्मेदारी किसी भी खिलाड़ी को यह अहसास कराती है कि सिस्टम उस पर भरोसा करता है. जब चयनकर्ता किसी 15 साल के खिलाड़ी को उपकप्तान बनाते हैं, तो वे उसे केवल एक पद नहीं दे रहे होते, बल्कि उसे यह संदेश दे रहे होते हैं कि वह टीम का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है. यह जिम्मेदारी खिलाड़ी के अंदर परिपक्वता लाती है और उसे मैदान पर बेहतर निर्णय लेने में मदद करती है.

वैभव सूर्यवंशी को रेड बॉल क्रिकेट की बारीकियां सिखाने का तरीका यह नहीं है कि उन्हें साइडलाइन करके रखा जाए या जिम्मेदारी से दूर रखा जाए. बारीकियां मैदान में रहकर और फैसले लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर ही सीखी जाती हैं. ड्रेसिंग रूम में कप्तान के साथ रणनीति बनाना और टीम के माहौल को समझना वैभव के विकास की प्रक्रिया को और तेज करेगा, न कि उसे नुकसान पहुंचाएगा.

भविष्य की दूरदर्शी सोच
ईस्ट जोन के चयनकर्ताओं का वैभव को उपकप्तान बनाने का फैसला एक दूरदर्शी कदम है. काफी लंबे समय से भारतीय घरेलू क्रिकेट में ईस्ट जोन को लेकर यह धारणा रही है कि वहां से नए और आक्रामक लीडर कम निकल रहे हैं. ऐसे में वैभव जैसे प्रतिभाशाली और निर्भीक खिलाड़ी को लीडरशिप ग्रुप में शामिल करना ईस्ट जोन क्रिकेट के भविष्य के लिए एक मास्टरस्ट्रोक है. प्रियांक पांचाल जैसे पूर्व खिलाड़ियों को यह समझना होगा कि क्रिकेट अब 90 के दशक का खेल नहीं रहा, जहां किसी खिलाड़ी को कप्तानी या उपकप्तानी देने के लिए 10 साल तक घरेलू क्रिकेट में घिसने का इंतजार कराया जाए. अगर किसी में 15 साल की उम्र में नेतृत्व करने की क्षमता और क्रिकेटिंग माइंड है, तो उसे मौका क्यों न दिया जाए?

दूसरों के सफर पर ब्रेक लगाने के बजाय समर्थन की जरूरत
भारतीय क्रिकेट को इस समय ऐसे बुजुर्गवारों या पूर्व कप्तानों की सलाह की जरूरत नहीं है जो युवाओं के पंख काटने की बात करें. वैभव सूर्यवंशी बिहार और पूरे देश के उन करोड़ों युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं जो छोटे शहरों से निकलकर बड़े सपने देखते हैं. जब कोई प्रियांक पांचाल जैसा पूर्व खिलाड़ी सोशल मीडिया पर जाकर सार्वजनिक रूप से यह कहता है कि ‘वैभव को उपकप्तान नहीं बनाना चाहिए था’, तो वह जाने-अनजाने में उस युवा खिलाड़ी के मन में अपने ही प्रति संदेह का बीज बोने की कोशिश करता है. एक सीनियर और पूर्व कप्तान होने के नाते प्रियांक का काम वैभव का हौसला बढ़ाना होना चाहिए था, न कि चयनकर्ताओं के उस फैसले पर सवाल उठाना जिसने एक युवा को आगे बढ़ने का हौसला दिया है.

वैभव सूर्यवंशी क्रिकेट पर राज करने आए हैं
प्रियांक पांचाल के पास अपनी व्यक्तिगत राय रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन उनके विचार आधुनिक क्रिकेट की वास्तविकताओं और वैभव सूर्यवंशी की असीम क्षमता के सामने पूरी तरह से अप्रासंगिक नजर आते हैं. वैभव सूर्यवंशी केवल रेड बॉल क्रिकेट की बारीकियां सीखने नहीं आए हैं, बल्कि वे इस खेल पर अपना राज कायम करने आए हैं. ईस्ट जोन की उपकप्तानी कोई बोझ नहीं, बल्कि वैभव के उस लंबे और ऐतिहासिक सफर की पहली सीढ़ी है जो वे भारतीय क्रिकेट में तय करने वाले हैं. आलोचकों को चाहिए कि वे इस होनहार के रास्ते में सवाल खड़े करने के बजाय शांत होकर उसके खेल का लुत्फ उठाएं और उसे अपनी चमक से पूरी दुनिया को रोशन करने दें.

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