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दिल्ली के डॉ. आदित्य विज के पास 23,000 माचिसों का अनोखा कलेक्शन है. यह संग्रह 120 साल पुराना इतिहास समेटे हुए है. उन्होंने 8 साल की उम्र से इन्हें सहेजना शुरू किया था. पुराने समय में माचिस एक खास उपहार मानी जाती थी. आज पर्यटक उनका यह अनोखा खजाना देखने आते हैं.
नई दिल्ली: आज के दौर में माचिस का महत्व कम हो चुका है. अब हर घर में लाइट है और आग जलाने के लिए अक्सर लाइटर की मदद ली जाती है. लेकिन अगर आज से करीब 50 से 60 साल पीछे जाएं तो आपको जानकर हैरानी होगी कि माचिस लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा हुआ करती थी. लोग उपहार के तौर पर माचिस का बॉक्स दिया-लिया करते थे. उस समय गिफ्ट में मासिल मिलना बड़ी बात होती थी. इसे बहुत ही सहेज कर और हिफाजत से रखा जाता था. यह सुनकर आप यकीनन हैरान हो रहे होंगे लेकिन यह सच है. दिल्ली के बालीनगर के रहने वाले डॉ. आदित्य विज के पास 120 साल पुरानी माचिस बॉक्स का कलेक्शन आज भी सुरक्षित है. जिसे देखने के लिए पर्यटक आते हैं. यही नहीं डॉक्टर आदित्य विज के पास वह माचिस के बॉक्स भी उपलब्ध है जो 60 से 70 साल पहले गिफ्ट के तौर पर मार्केट में आते थे और उनकी कीमत 10 से करीब 20 रुपए तक हुआ करती थी.
23,000 माचिस बॉक्स का कलेक्शन
डॉ. आदित्य विज ने बताया कि उनके पास लगभग 23000 माचिस बॉक्स का कलेक्शन है, जो उन्होंने 8 साल की उम्र से इकट्ठा करना शुरू किया था. उनके पिता उनसे माचिस बॉक्स को कलेक्ट करने के लिए कहते थे. हर एक माचिस बॉक्स को उन्होंने कलेक्ट करके उसकी फाइल तैयार की जो आज भी उनके पास मौजूद है. माचिस कलेक्शन की बात करें तो यह माचिस कलेक्शन लगभग 120 साल पुराना है. यानी 120 साल पहले से लेकर आज तक जितनी भी माचिस बॉक्स मार्केट में उतरे वो सब उनके पास मौजूद है. उन्होंने बताया कि आज भी जब उनके घर कोई आता है तो वह मिठाई का डिब्बा लेकर नहीं आता है बल्कि माचिस बॉक्स लेकर आता है, क्योंकि सबको पता है कि उन्हें माचिस बॉक्स कलेक्ट करने का शौक है.
सोने से भी ज्यादा माचिस को तवज्जो
उन्होंने बताया कि आज से करीब 50 से 70 साल पहले चले जाएं तो दिल्ली में लाइट नहीं होती थी. सोचिए जब देश की राजधानी का यह हाल था तो देश के बाकी राज्यों और गांव का क्या हाल रहा होगा. आदित्य विज ने बताया कि यही वजह है कि उस वक्त माचिस बहुत महत्व रखती थी क्योंकि यात्रा के दौरान माचिस काम आती थी. घर का चूल्हा भी माचिस से जलता था. घर की लालटेन माचिस से जलती थी. बच्चे पढ़ाई करते थे तो मोमबत्ती को जलाने के लिए माचिस का इस्तेमाल होता था.
एक तरफ से माचिस लोगों के जीवन का बहुत ही अहम हिस्सा हुआ करती थी. उस वक्त माचिस के बॉक्स आते थे. एक माचिस बॉक्स में करीब 5 या 10 माचिस हुआ करती थी. लोग एक दूसरे के घर जाते थे तो उनके लिए मिठाइयां नहीं बल्कि माचिस का बॉक्स लेकर जाते थे. ज्यादातर यही परंपरा पुराने जमाने में हुआ करती थी. उस वक्त उपहार में माचिस बॉक्स मिलने से लोग बहुत खुश हो जाते थे. यही वजह है कि 120 साल पुराने माचिस बॉक्स कलेक्शन को उन्होंने आज तक सहेज कर रखा है. आज भी जो लोग यहां आते हैं वो इस माचिस के बॉक्स के कलेक्शन को देखकर हैरान हो जाते हैं. तो कुछ को उनके बचपन की याद आ जाती है.
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प्रसून सिंह को मीडिया में 7 साल काम करने का अनुभव है. खबरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोचक अंजाद में पेश करना खासियत है. दैनिक भास्कर अखबार में इंटर्नशिप के साथ करियर की शुरुआत हुई.
इसके बाद ETV Bharat (बिहार)…
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