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Delhi Sons Refuse To Take Father Body: दिल्ली के कालकाजी में 75 वर्षीय बुजुर्ग संगीतकार रवि डे की लाश उनके बंद मकान में पांच दिन तक सड़ती रही. पड़ोसियों द्वारा दुर्गंध की सूचना मिलने पर पुलिस ने दमकल की मदद से दरवाजा तोड़कर शव बरामद किया. लाजपत नगर में रहने वाले उनके दो बेटों ने शुरुआत में आने से इनकार कर दिया, लेकिन पुलिस के सख्त रवैये के बाद वे पोस्टमार्टम के लिए पहुंचे.
पुलिस मामले की जांच कर रही है.
नई दिल्ली. इंसान ताउम्र एक-एक ईंट जोड़कर मकान बनाता है, पेट काटकर औलाद की ख्वाहिशें पूरी करता है, सिर्फ इस उम्मीद में कि ढलती उम्र में कोई लाठी बनेगा. जब वही औलाद बड़ी होकर अपने खून को ही गैर बना दे तो उस बाप की आत्मा जीते-जी मर जाती है. दिल्ली के कालकाजी में जो हुआ, वह सिर्फ एक बुजुर्ग की मौत की खबर नहीं है, यह हमारी आधुनिक सभ्यता और मर चुकी संवेदनाओं का एक भयानक दस्तावेज है. एक 75 साल के बूढ़े संगीतकार रवि डे जिनके हाथों ने कभी साज पर सुरीली धुनें छेड़ी होंगी उनकी अपनी जिंदगी का अंत इतनी खामोश चीख के साथ होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था.
पांच दिन, सड़ता हुआ जिस्म और खामोश दीवारें
गोविंदपुरी एक्सटेंशन के एक छोटे से कमरे में 14 अगस्त की रात तक जब बदबू इतनी बढ़ गई कि पड़ोसियों का दम घुटने लगा तब पुलिस को खबर की गई. दमकलकर्मियों ने जब लोहे का बंद दरवाजा तोड़ा तो अंदर का नजारा इंसानियत को शर्मसार करने वाला था. बाथरूम के पास रवि डे की लाश पड़ी थी. पांच दिनों की सड़न से जिस्म गल चुका था, कीड़े रेंग रहे थे. जिस इंसान ने जिंदगी भर अपनों की आहट सुनने के लिए कान तरसाए होंगे, वह पांच दिन तक बेजान पड़ा रहा और दुनिया अपनी रफ्तार से चलती रही.
अभी फुर्सत नहीं है… बेटों का पत्थर दिल जवाब
कहानी का सबसे खौफनाक पहलू यह है कि रवि डे इस शहर में लावारिस नहीं थे. लाजपत नगर में उनके दो सगे बेटे रहते हैं. वही बेटे, जिनकी पहली किलकारी पर कभी इस बाप ने खुशियों के नगमे गाए होंगे. पुलिस ने जब बेटों को फोन करके बताया कि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं तो जवाब मिला, “अभी रात बहुत हो गई है, हम नहीं आ सकते.” अगली सुबह भी कोई नहीं आया. जब पुलिस ने कानून, नैतिकता और सख्ती का चाबुक चलाया, तब जाकर 16 अगस्त को दोनों बेटे एम्स की मॉर्चरी पहुंचे. बहाना क्या था? माता-पिता का तलाक हो गया था और हम काम में बहुत बिजी थे.
व्यस्तता का मुखौटा और मरता हुआ समाज
यह घटना हमें आइना दिखाती है कि हम किस तरफ बढ़ रहे हैं. हम कंक्रीट के जंगल तो बना रहे हैं लेकिन दिलों को बंजर करते जा रहे हैं. एक संगीतकार जो कभी सुरों को जोड़ता था, अपने ही रिश्तों को बिखरने से न रोक सका. पिता का शव तो जलकर राख हो गया लेकिन यह सवाल हवा में तैरता छोड़ गया, क्या औलाद का बड़ा हो जाना, मां-बाप के वजूद का खत्म हो जाना है?
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पत्रकारिता में 16 वर्षों से अधिक का सुदीर्घ अनुभव रखने वाले संदीप गुप्ता वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर होम पेज पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. जटिल और सामरिक विषयों को बेहद सरल भाषा में पाठकों त…
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