नई दिल्ली. नानी पिछले कुछ सालों से अपनी इमेज से हटकर एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं. कभी फैमिली-ओरिएंटेड और सीरियस रोल्स के लिए जाने जाने वाले नानी अब इंटेंस और बड़े एक्शन रोल्स में खुद को साबित कर रहे हैं. डायरेक्टर श्रीकांत ओडेला के साथ उनकी नई फिल्म ‘द पैराडाइज’ इसी दिशा में एक बड़ी कोशिश है. 24 सितंबर 2026 को रिलीज हो चुकी यह फिल्म शोषण, पावर, कड़वे अतीत और बदले की एक दमदार कहानी बताने का वादा करती है. हालांकि, बड़े बजट, शानदार प्रोडक्शन डिजाइन और नानी की शानदार परफॉर्मेंस के बावजूद, क्या यह फिल्म दर्शकों पर कोई गहरा असर डाल पाती है? आइए जानते हैं विस्तार से.
कहानी
फिल्म 1980 के दशक में सिकंदराबाद के एक काल्पनिक इलाके में सेट है, जिसका अजीब नाम ‘पैराडाइज’ है. नाम भले ही पैराडाइज हो, लेकिन यहां रहने वाली सावरी कम्युनिटी नरक से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर है. खाना, कपड़ा, घर और इंसानी इज्जत जैसी बेसिक जरूरतों के लिए तरसने वाली यह कम्युनिटी पीढ़ियों से गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई है. बेरहम और ताकतवर मलिक (मोहन बाबू) इस बस्ती और इसके रहने वालों पर पूरी ताकत से राज करता है. वह न सिर्फ उनका पैसे और शरीर से शोषण करता है, बल्कि उनसे उनकी पहचान भी छीन लेता है.
जदल (नानी) इस दबी-कुचली बस्ती से निकलता है. बचपन में जुल्म और जेल का शिकार, जदल अपनी मां, शमक्का (सोनाली कुलकर्णी) से नफरत करता है, जिसे अपनी और अपने बेटे की भूख मिटाने के लिए प्रॉस्टिट्यूशन में धकेला गया था. सालों बाद, जब जदल जेल से छूटकर लौटता है, तो वह अपनी मां से दूर रहने का इरादा करता है. लेकिन जब वह अपनी आंखों के सामने उसकी सबके सामने बेइज्जती देखता है, तो उसके अंदर बदले की आग जल उठती है.
इसी बीच, उसकी मुलाकात एक मासूम और खूबसूरत लड़की (कयादू लोहार) से होती है, जो उसकी अंधेरी जिंदगी में उम्मीद की एक नई किरण लेकर आती है. अपना बदला लेने की शुरुआत करते हुए, जदल सबसे पहले मलिक के पागल बेटे विक्रम (राघव जुयाल) का सिर काट देता है. इस हिम्मत के बाद, मलिक पूरी सावरी कम्युनिटी को खत्म करने का पक्का इरादा कर लेता है. यहीं से जदल का पर्सनल बदला पूरी सावरी कम्युनिटी के हक, इज्जत और आजादी की लड़ाई में बदल जाता है. क्या जदल अपने लोगों को मलिक के चंगुल से आजाद करा पाएगा और सच में ‘पैराडाइज’ को पैराडाइज बना पाएगा? यही फिल्म का मेन हिस्सा है.
एक्टिंग
नानी खुद फिल्म की सबसे बड़ी और मजबूत नींव हैं. जदल के रोल में, नानी ने अपनी पूरी जान स्क्रीन पर डाल दी है. उनकी आंखों में जलता गुस्सा, दिल में दबा दर्द और शरीर पर जुल्म के निशान… नानी हर फ्रेम में खुद को साबित करते हैं. उनकी परफॉर्मेंस खासकर उनकी मां के साथ वाले सीन में जबरदस्त है. एक्शन सीन में भी वह जोश दिखाते हैं. सोनाली कुलकर्णी एक बार फिर मां (शमक्का) के रोल में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाती हैं. उनके और नानी के बीच के इमोशनल सीन फिल्म को एक इमोशनल कोर देते हैं जिसकी बाकी स्क्रिप्ट में बहुत कमी है. मलिक के रूप में मोहन बाबू कागज पर मेन विलेन के तौर पर एक अच्छी च्वाइस हो सकते हैं, लेकिन स्क्रीन पर उनका कैरेक्टर उस तरह का डर या दबदबा पैदा करने में फेल हो जाता है, जैसी इतने बड़े कैनवस वाली फिल्म से उम्मीद की जाती है. हीरो और विलेन के बीच टकराव फीका पड़ जाता है. राघव जुयाल (विक्रम) ने क्रूर और सनकी बेटे को दिखाने की कोशिश की है, लेकिन उनकी राइटिंग सीरियस होने के बजाय जोकर जैसी और मजेदार ज्यादा है. डर पैदा करने के बजाय, उनका कैरेक्टर कई बार इरिटेटिंग हो जाता है. हीरोइन के तौर पर कयादू लोहार के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है. वह सिर्फ हीरो की जिंदगी में बदलाव और गानों के लिए इस्तेमाल होती दिखती हैं.
डायरेक्शन
डायरेक्टर श्रीकांत ओडेला ने सावरी कम्युनिटी की दबी-कुचली दुनिया को बनाने में काफी मेहनत की है. पहले हाफ में वह दर्शकों को भूख, धूल, मिट्टी और खून से सनी दुनिया में सक्सेसफुली ले जाते हैं. हालांकि, फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसका ट्रीटमेंट और स्क्रीनप्ले है. कहानी के सोशल मैसेज और इमोशन पर भरोसा करने के बजाय श्रीकांत ओडेला बहुत ज्यादा और खूनी हिंसा का सहारा लेते हैं. प्रेग्नेंट महिलाओं, मासूम बच्चों और बुजुर्गों पर जुल्म के सीन इतने ग्राफिक हैं कि कुछ समय बाद देखने वाला कहानी से जुड़ने के बजाय असहज हो जाता है. एक्शन सीन इतने सुपरनैचुरल और अविश्वसनीय हैं कि डायरेक्टर की रियलिस्टिक माहौल बनाने की कोशिश नाकाम हो जाती है.
सिनेमैटोग्राफी
‘पैराडाइज’ का स्लम सेट, उसकी लगातार बारिश, कीचड़ और डार्क बैकग्राउंड काफी असली लगते हैं. मेकअप और कॉस्ट्यूम डिपार्टमेंट ने किरदारों को असली जैसा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. हालांकि, डार्क और बेरहम बैकग्राउंड, बारिश, खदान/झुग्गी जैसा माहौल और मां-बेटे के बीच का इमोशनल एंगल दर्शकों को बार-बार ‘KGF’ जैसी फिल्मों की याद दिलाता है. ऐसा लगता है जैसे हम वही पुरानी ‘मसीहा कहानी’ नए नाम से देख रहे हैं.
म्यूजिक
अनिरुद्ध रविचंदर का म्यूजिक इस कमजोर और बिखरी हुई कहानी के लिए लाइफ-सपोर्ट सिस्टम का काम करता है. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) एक्शन सीन को शानदार और शानदार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. जब भी कहानी अपनी रफ्तार खोती है, अनिरुद्ध का म्यूजिक उनमें एनर्जी भर देता है. उनका स्कोर इमोशनल सीन में भी असरदार साबित होता है.
कमियां
बिना किसी ठोस वजह के स्क्रीन पर खून-खराबा और भयानक सीन आम दर्शकों को परेशान कर सकते हैं. नानी जैसे मजबूत हीरो का सामना करने के लिए एक जबरदस्त और डरावना विलेन न होना एक बड़ी कमी है. फिल्म का लगभग तीन घंटे का रनिंग टाइम इस कहानी के लिए बहुत लंबा है. दूसरा हाफ बुरी तरह खिंचता है और अपनी दिशा खो देता है. मां-बेटे का रिश्ता, जो फिल्म की जान होना चाहिए था, कई जगहों पर अचानक गायब हो जाता है और फिर बिना किसी सही बिल्ड-अप के वापस आ जाता है.
आखिरी फैसला
‘द पैराडाइज’ एक ऐसी फिल्म है जो बड़े वादे के साथ शुरू होती है लेकिन अपनी ही हिंसा और बिखरे हुए स्क्रीनप्ले के बोझ तले दब जाती है. नानी ने अपना बेस्ट दिया है और उनके फैन्स को उनका यह जबरदस्त वर्जन जरूर पसंद आएगा. अनिरुद्ध का म्यूजिक और फिल्म का पहला हाफ भी कुछ उम्मीदें जगाता है. लेकिन अगर आप एक बैलेंस्ड कहानी, एक मजबूत विलेन और मतलब वाला ड्रामा ढूंढ रहे हैं, तो यह तीन घंटे की खूनी लड़ाई निराश कर सकती है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 2 स्टार.
