Gandhi Jayanti 2026: गांधी जी के आखिरी 144 दिनों की गवाह है दिल्ली की ये जगह, कमरे से शहीद स्तंभ तक जुड़ी हैं यादें

नई दिल्ली: अगर आप दिल्ली में ऐसी जगह देखना चाहते हैं, जहां इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं बल्कि अपनी आंखों के सामने महसूस किया जा सकता है, तो गांधी स्मृति आपके लिए खास जगह हो सकती है. नई दिल्ली के 5, तीस जनवरी मार्ग पर स्थित यह जगह पहले बिड़ला हाउस के नाम से जानी जाती थी. यही वह जगह है जहां महात्मा गांधी ने अपने जीवन के आखिरी 144 दिन बिताए थे. 9 सितंबर 1947 से 30 जनवरी 1948 तक गांधी जी इसी परिसर में रहे. फिर 30 जनवरी को यहीं उनकी हत्या हुई. आज इस पूरे परिसर को गांधी स्मृति के रूप में संरक्षित किया गया है.

सबसे पहले दिखती है गांधी जी की बड़ी प्रतिमा
गांधी स्मृति में प्रवेश करते ही सबसे पहले एक बड़ी प्रतिमा आपका ध्यान खींचती है. इसमें गांधी जी के साथ एक बच्चा और एक बच्ची कबूतर पकड़े हुए दिखाई देते हैं. प्रतिमा के नीचे गांधी जी का संदेश My Life is My Message लिखा है. यहीं से इस जगह का माहौल आपको गांधी जी के विचारों और उनके जीवन की तरफ ले जाना शुरू कर देता है.

सबसे खास है गांधी जी का कमरा
गांधी स्मृति की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक है वह कमरा जहां गांधी जी अपने आखिरी दिनों में रहते थे.इस कमरे को उस समय की स्थिति के मुताबिक ही संभालकर रखा गया है। यहां गांधी जी का सादा बिस्तर, उनका चश्मा, छड़ी, चाकू-कांटा-चम्मच और दूसरी निजी चीजें देखी जा सकती हैं. कमरे में फर्श पर रखा साधारण गद्दा और उसके पास छोटी लकड़ी की मेज गांधी जी की सादगी की झलक देते हैं.यहां उनकी इस्तेमाल की हुई गीता भी रखी गई है.यानी यह कमरा सिर्फ एक म्यूजियम का हिस्सा नहीं, बल्कि गांधी जी के आखिरी दिनों की रोजमर्रा की जिंदगी की झलक देता है.

144 दिनों की कहानी तस्वीरों में
गांधी स्मृति में एक पूरा हिस्सा गांधी जी के जीवन के आखिरी 144 दिनों को समझने के लिए तैयार किया गया है.कमरे की ओर जाने वाली गैलरी में उनकी शांति यात्रा और शहादत से जुड़ी जानकारी मिलती है.इसके बाद फोटो प्रदर्शनी के जरिए इन 144 दिनों की घटनाओं को बताया गया है. इसमें प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण भी शामिल किए गए हैं. यानी यहां आने वाला व्यक्ति सिर्फ यह नहीं जानता कि गांधी जी ने यहां आखिरी 144 दिन बिताए, बल्कि तस्वीरों और प्रदर्शनी के जरिए यह भी समझ सकता है कि उस समय दिल्ली और देश में क्या परिस्थितियां थीं.

जहां रोज होती थी प्रार्थना, वहीं बना है शहीद स्तंभ
गांधी स्मृति का प्रार्थना स्थल भी इस जगह का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है. गांधी जी यहां रोज होने वाली प्रार्थना सभाओं में शामिल होते थे. आज इसी परिसर में वह शहीद स्तंभ मौजूद है, जो उस जगह को चिह्नित करता है जहां 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या हुई थी.स्तंभ के चारों तरफ श्रद्धांजलि देने के लिए जगह बनाई गई है.
प्रार्थना स्थल के पास लाल बलुआ पत्थर की एक बेंच भी है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक गांधी जी प्रार्थना के दौरान या लोगों से बातचीत करते समय इस बेंच पर बैठा करते थे. आज भी यह बेंच उस दौर की एक खास याद के तौर पर यहां मौजूद है.

सिर्फ कमरा और तस्वीरें ही नहीं, पूरा म्यूजियम है यहां
गांधी स्मृति में गांधी जी के जीवन से जुड़ी तस्वीरें, पेंटिंग्स, मूर्तियां, भित्तिचित्र और दूसरी यादगार चीजें भी प्रदर्शित की गई हैं.इमारत के अलग-अलग हिस्सों में गांधी जी के बचपन से लेकर उनके महात्मा बनने तक की यात्रा को आसान तरीके से दिखाया गया है.

पहली मंजिल पर गांधी की झलक
गांधी स्मृति में गांधी नाम की मल्टीमीडिया प्रदर्शनी भी है.इसमें आधुनिक तकनीक के जरिए गांधी जी के जीवन और उनके विचारों को समझाने की कोशिश की गई है.इस प्रदर्शनी में गांधी जी के सत्य और अहिंसा से जुड़े विचारों को अलग तरीके से प्रस्तुत किया गया है.

पांच एकड़ के परिसर में इतिहास से सामना
गांधी स्मृति का खास अनुभव सिर्फ अंदर की प्रदर्शनियों तक सीमित नहीं है.पूरा परिसर, भवन, कमरा, प्रार्थना स्थल और शहीद स्तंभ उस दौर की यादों को अपने अंदर समेटे हुए हैं. सरकार ने पुराने बिड़ला हाउस को 1971 में अधिग्रहित किया था और इसे राष्ट्रीय स्मारक में बदला गया.15 अगस्त 1973 को इसे आम लोगों के लिए खोला गया.

आज गांधी स्मृति में पहुंचकर जब कोई उस कमरे को देखता है जहां गांधी जी के आखिरी दिन बीते, उसी रास्ते पर चलता है जहां से वह प्रार्थना के लिए जाते थे और फिर शहीद स्तंभ तक पहुंचता है, तो इतिहास को करीब से महसूस करने का मौका मिलता है.यही गांधी स्मृति की सबसे खास बात है यहां गांधी जी की कहानी सिर्फ पढ़ाई नहीं जाती, बल्कि उनके आखिरी 144 दिनों से जुड़ी जगहों और चीजों के जरिए दिखाई भी जाती है.

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