दिल्ली. दिल्ली के इस कारीगर की कहानी सिर्फ सारंगी बनाने तक सीमित नहीं है. करीब तीन दशक से दिल्ली में सारंगी बनाने वाले रामपाल ने इसी पारंपरिक हुनर के सहारे अपना परिवार चलाया और अपने चार बच्चों की शादी भी इसी काम की कमाई से की. आज जब नई पीढ़ी इस कला से दूर होती जा रही है, तब भी रामपाल अपने हाथों से सारंगी बनाकर इस पुराने हुनर को जिंदा रखने में जुटे हैं. इस लंबे सफर में उनकी मुलाकात मेनका गांधी, शीला दीक्षित, मदनलाल खुराना और जया जेटली जैसी कई जानी-मानी हस्तियों से भी हुई.
पिता से 1978 में सीखा सारंगी बनाने और बजाने का हुनर
रामपाल बताते हैं कि जब उन्होंने सारंगी बनाना और बजाना सीखा, तब वह पढ़ाई कर रहे थे. परिवार में सबसे बड़े होने के कारण जिम्मेदारियां भी उनके कंधों पर थीं. साल 1978 में उन्होंने अपने पिता से सारंगी बनाना और बजाना सीखा. धीरे-धीरे यही हुनर उनकी पहचान और कमाई का जरिया बन गया.
1996 में आए दिल्ली, तब 50 पैसे में बिकती थी सारंगी
रामपाल साल 1996 में दिल्ली आए और तभी से यहीं सारंगी बनाने का काम कर रहे हैं. वह बताते हैं कि जब उन्होंने सारंगी बेचनी शुरू की थी, तब इसकी कीमत महज 50 पैसे थी. वक्त बदला तो कीमत भी बढ़ी. आज उनके हाथ से बनी सारंगी करीब 300 रुपये से लेकर 1500 रुपये तक की कीमत में बिकती है.
रामपाल सारंगी बनाने का पूरा काम खुद करते हैं. लकड़ी को आकार देने से लेकर उसे तैयार करने और उसमें सुर पैदा करने तक की प्रक्रिया उनके हाथों से होती है. एक बार में करीब 10-15 सारंगी तैयार करने के बाद उनका काम आगे बढ़ता है. वह बताते हैं कि काम के बीच उन्हें काफी समय मेहनत करनी पड़ती है, तभी ये साज तैयार हो पाता है.
इसी काम से बच्चों की परवरिश, 4 बच्चों की शादी भी की
रामपाल के लिए सीरंगी सिर्फ एक पारंपरिक कला नहीं, बल्कि उनके परिवार की जिंदगी का आधार रही है. उन्होंने इसी काम से अपने बच्चों की परवरिश की और चार बच्चों की शादी भी इसी कारोबार से हुई कमाई के सहारे की.
वह बताते हैं कि जब वह 1996 में दिल्ली आए थे, तब उनके बच्चे काफी छोटे थे. आज उनकी दोनों बेटियां पढ़-लिखकर बैंक में काम कर रही हैं. रामपाल कहते हैं कि एक पिता के तौर पर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की कोशिश की और अपने बच्चों को उनके मुकाम तक पहुंचाया.
बेटे नहीं अपनाना चाहते पुश्तैनी हुनर
रामपाल बताते हैं कि उनके बेटे इस काम को आगे नहीं बढ़ाना चाहते. वह उनसे कहते हैं कि अब यह काम छोड़कर कुछ और करें. रामपाल भी मानते हैं कि आज की पीढ़ी का समय और काम करने का तरीका बदल गया है. इसके बावजूद वह इस कला को खत्म होते नहीं देखना चाहते. उनका कहना है कि वह रहें या न रहें, यह कला किसी न किसी के हाथ में जरूर रहनी चाहिए. उनके मुताबिक आने वाली पीढ़ी को सारंगी बनाना और बजाना सीखना चाहिए, ताकि यह पारंपरिक हुनर आगे भी जिंदा रहे.
मेनका गांधी से शीला दीक्षित तक, कई हस्तियों से हुई मुलाकात
दिल्ली में इतने लंबे समय से काम करने के दौरान रामपाल की मुलाकात कई चर्चित हस्तियों से हुई. वह मेनका गांधी, शीला दीक्षित, मदनलाल खुराना और जया जेटली के साथ हुई मुलाकातों को भी अपने सफर का खास हिस्सा बताते हैं. दिल्ली हाट से भी उनकी यादें जुड़ी हैं और वह राजीव तलवार को दिल्ली हाट के शुरुआती दौर से जुड़े व्यक्ति के तौर पर याद करते हैं. इन मुलाकातों की तस्वीरें और यादें उनके लिए सिर्फ तस्वीरें नहीं हैं, बल्कि उस दौर की गवाही हैं जब उनके हाथों से निकली सारंगी और उनका हुनर दिल्ली की पहचान से जुड़ता गया.
धुन उंगलियों से निकलती है
जब रामपाल से पूछा गया कि सारंगी से इतनी खूबसूरत धुन आखिर निकलती कैसे है, तो उनका जवाब बेहद सरल था. धुन उंगलियों से निकलती है. इसके बाद उन्होंने सरगम बजाकर भी सुनाई. रामपाल कहते हैं कि सारंगी सीखने के लिए सिर्फ अभ्यास ही काफी नहीं, बल्कि मेहनत, लगन और गुरु का आशीर्वाद भी जरूरी है. करीब पांच दशक पहले पिता से सीखा यह हुनर आज भी उनकी उंगलियों में जिंदा है. उनकी बस यही इच्छा है कि उनके बाद भी किसी के हाथों में यह सारंगी रहे और इसके सुर सुनाई देते रहें.
