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शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने मानदेय बढ़ाकर बड़ी राहत दी है. अब शिक्षामित्रों को 10,000 की जगह 18,000 और अनुदेशकों को 9,000 की जगह 17,000 रुपये प्रतिमाह मिलेंगे. लंबे समय से कम आय और आर्थिक संकट से जूझ रहे शिक्षामित्रों के लिए यह फैसला उनके वर्षों के संघर्ष के बाद उम्मीद की नई किरण लेकर आया है.
गाजियाबाद. उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को बड़ी राहत देते हुए उनके मानदेय में बढ़ोतरी का फैसला किया है. अब शिक्षामित्रों को 10000 की जगह 18000 और अनुदेशकों को 9000 की जगह 17000 प्रतिमाह मानदेय मिलेगा. इस प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी भी मिल चुकी है. गाजियाबाद जिले में 464 शिक्षामित्र और 92 अनुदेशक इस फैसले से सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे. लेकिन यह सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं है, यह उन सालों के संघर्ष, दर्द और इंतजार की कहानी है जिसे शिक्षामित्रों ने चुपचाप सहा है. गाजियाबाद शिक्षामित्र यूनियन के अध्यक्ष रिजवान राणा ने बताया कि एक शिक्षामित्र का जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा है. 10000 के मानदेय में परिवार का पालन-पोषण करना बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना बेहद मुश्किल था.
महंगाई के इस दौर में इतनी कम आय में घर चलाना किसी चुनौती से कम नहीं था. रिजवान राणा कहते हैं कि उनके परिवार में पत्नी और तीन बच्चे हैं जिनकी पढ़ाई और घर की जिम्मेदारी पूरी तरह उन्हीं पर है. बच्चों की फीस, किताबें और जरूरी खर्च इतने ज्यादा थे कि कई बार उन्हें अपनी जरूरतों और इच्छाओं को दबाना पड़ा. कम आमदनी के कारण जिंदगी की कई खुशियां उनसे दूर होती चली गई. वह एक मार्मिक पल याद करते हुए बताते हैं कि सर्दियों में जब पड़ोसी और रिश्तेदार अपने बच्चों के लिए नए स्वेटर, जैकेट और जूते लाते थे तो उनका बेटा एक कोने में खड़ा होकर बस दूसरों को देखता रहता था. उस समय एक पिता के रूप में वह बेहद असहाय महसूस करते थे, क्योंकि वह अपने बच्चे को ठंड से बचाने के लिए एक अच्छा स्वेटर तक नहीं दिला पा रहे थे.
2017 से 2026 तक का यह सफर बेहद कठिन रहा
कम आमदनी के चलते समाज और रिश्तेदारों के ताने सुनने पड़े. कई करीबी लोग भी मुश्किल समय में दूर हो गए, रिजवान कहते हैं कि इस दौर ने उन्हें सिखाया कि अगर आमदनी कम हो तो समाज भी दूरी बना लेता है. आर्थिक और मानसिक दबाव का असर उनकी सेहत पर भी पड़ा. लगातार तनाव के चलते उन्हें कम उम्र में हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ा. कई बार उन्होंने यह भी सोचा कि इतनी कम आय में नौकरी छोड़ देना ही बेहतर होगा. वह बताते हैं कि एक रिक्शा चलाने वाला दिन में ₹1000 तक कमा लेता है, जबकि एक शिक्षामित्र की दैनिक आय लगभग ₹333 ही होती है.
फिर भी उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी क्योंकि उन्हें अपने काम और सम्मान पर भरोसा था. इस कठिन समय में उनके परिवार खासकर उनकी पत्नी ने उनका पूरा साथ दिया. कई बार घर में कई दिनों तक एक ही सब्जी खाकर गुजारा करना पड़ा और कभी सिर्फ रोटी व लाल मिर्च की चटनी से पेट भरना पड़ा. अब जब सरकार ने मानदेय बढ़ाकर 18000 कर दिया है और 5 लाख तक की कैशलेस चिकित्सा सुविधा भी दी है तो शिक्षामित्रों को बड़ी राहत मिली है. रिजवान राणा कहते हैं कि यह फैसला उनके लंबे संघर्ष का फल है और अब उन्हें उम्मीद है कि उनके परिवार की जिंदगी में कुछ सुधार आएगा.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें
