Noida News: नोएडा के सेक्टर-144 स्थित जलसाघर आर्ट स्टूडियो में देश के अलग-अलग हिस्सों की हस्तनिर्मित कला और कारीगरों के बनाए उत्पादों को एक जगह लाकर सजाया गया है. यहां राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, नॉर्थ ईस्ट, असम, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों की कला से जुड़े उत्पाद मौजूद हैं. मार्बल आइटम, ग्लास आर्ट, बांस से बने उत्पाद, लकड़ी की कारीगरी, ब्रास और आयरन आर्ट, हैंडपेंटेड वस्तुएं, ज्वेलरी, बैग और हैंडीक्राफ्टेड साड़ियां यहां लोगों को देखने को मिलती हैं. स्टूडियो की खास बात यह है कि लोग इन उत्पादों को सिर्फ देख ही नहीं, बल्कि उन्हें करीब से समझ और महसूस भी कर सकते हैं, और अपने घर, बेडरूम, ऑफिस और गेस्टरूम के साथ खास जगह के लिए खरीदारी कर सकते हैं.
विभिन्न राज्यों के अनोखे हैंडीक्राफ्ट उत्पाद मिलेंगे यहां
आरती अवस्थी ने लोकल-18 से बात करते हुए बताया कि लंबे समय तक मीडिया में काम करने और देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा के दौरान उन्हें स्थानीय कारीगरों और उनकी कला को करीब से देखने का मौका मिला. इसी अनुभव के बाद उन्होंने अपनी नई पारी में उन कारीगरों तक पहुंचकर उनकी बनाई चीजों को एक जगह लोगों तक पहुंचाने की शुरुआत की. स्टूडियो में किशनगढ़ के मार्बल से बने आइटम, फिरोजाबाद की कांच कला, असम के बांस से बने मग, कोलकाता की कालीघाट शैली से प्रेरित हैंडपेंटेड उत्पाद और मुरादाबाद की धातु कारीगरी जैसी कई चीजें शामिल हैं. यहां हाथ से तैयार किए गए चेस बोर्ड और अन्य सजावटी वस्तुएं भी मौजूद हैं.
कारीगरों और भारतीय शिल्प को समर्पित स्टूडियो
आरती अवस्थी के अनुसार, स्टूडियो का प्रयास कारीगरों से सीधे उत्पाद लेकर बीच के कई स्तरों को कम करना है, जिससे कारीगरों को उनके काम का उचित मेहनताना मिल सके और खरीदारों तक भी उत्पाद उचित कीमत पर पहुंचें. यहां राजस्थान की ब्लू पॉटरी, जोधपुर की हैंडपेंटेड मैंगो वुड ट्रे, फिरोजाबाद के हैंडमेड शैंडलियर और हाथ से बने जोधपुरी बैग भी शामिल हैं. स्टूडियो में अलग-अलग राज्यों की कला के साथ-साथ हर उत्पाद के पीछे की कहानी और उसकी बनावट को भी लोगों के सामने रखने की कोशिश की गई है. स्टूडियो का एक खास हिस्सा हस्तनिर्मित और हैंडीक्राफ्ट साड़ियों को समर्पित है.
पारंपरिक भागलपुरी साड़ियों की बुनाई में लगता है समय
वहीं शिल्पी श्रीवास्तव ने लोकल-18 से बात करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी नई शुरुआत के लिए बिहार की कला और खासतौर पर भागलपुर की हैंडीक्राफ्टेड साड़ियों को चुना. उनके अनुसार, यहां मौजूद साड़ियां पावरलूम की बजाय हाथ से बुनी गई हैं और इन्हें तैयार करने में कई दिन लगते हैं. उन्होंने बताया कि कारीगरों तक पहुंचना भी आसान नहीं होता और एक साड़ी की बुनाई में करीब 8 से 10 दिन तक का समय लग सकता है. उनका प्रयास ऐसी पारंपरिक कला को उन लोगों तक पहुंचाना है, जो तेजी से मशीनों से बने उत्पादों की ओर बढ़ रहे हैं.
खरीदारी और कला प्रेमियों के लिए बेहतरीन विकल्प
करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुए जलसाघर आर्ट स्टूडियो में शुरुआत हस्तनिर्मित गिफ्टिंग और डेकोर आइटम से हुई थी, जबकि हैंडलूम साड़ियों को पिछले कुछ महीनों में शामिल किया गया है. स्टूडियो के जरिए अलग-अलग राज्यों के कारीगरों की कला को नोएडा और दिल्ली-एनसीआर के लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है. यहां एक ही जगह पर देश के अलग-अलग हिस्सों की पारंपरिक कला, हस्तनिर्मित डेकोर, ज्वेलरी, बैग और साड़ियों का संग्रह देखने को मिलता है, जो स्थानीय लोगों के लिए खरीदारी के साथ भारतीय हस्तशिल्प को करीब से जानने का भी एक अलग अनुभव बन सकता है. आप आगामी त्योहार पर कुछ खास और अलग खरीदने का प्लान बना रहे हैं, तो इस स्टूडियो में विजिट कर सकते हैं, यहां आपको खास और विश्वसनीय आइटम आपकी पसंद के अनुसार मिल जाएंगे.
