Noida-Greater Noida E Bus Service : नोएडा में बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की उम्मीद के साथ शुरू की गई ई बस सेवा को अभी ढाई महीने भी पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन इसके चलने के तौर तरीके पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं. तस्वीर यह है कि सड़कों पर ये ई बसें कम सवारियों या लगभग खाली हालत में दौड़ती दिखाई दे रही हैं. ऐसा होने की बड़ी वजह नोएडा अथॉरिटी और उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) के बीच हुए किलोमीटर आधारित समझौता है. इस व्यवस्था में भुगतान बस के यात्रियों की संख्या के बजाय उसके तय किलोमीटर चलने के आधार पर किया जाता है. ऐसे में बस ऑपरेटर के लिए सबसे अहम टारगेट यही बन जाता है कि वाहन तय दूरी पूरी करे. लिहाजा, अब सवाल ई बसों के चलने का नहीं, बल्कि इस बात का है कि क्या शहर को बसें चाहिए या केवल तय किलोमीटर पूरा करने वाली बस सेवा?
200 किलोमीटर रोज, 65 रुपये प्रति किलोमीटर का हिसाब
एनबीटी की रिपोर्ट कहती है कि ‘एक ई बस को रोजाना करीब 200 किलोमीटर चलाने की शर्त है. इसके लिए 65 रुपये प्रति किलोमीटर की दर से भुगतान होता है. इस हिसाब से एक बस पर महीने का खर्च करीब चार लाख रुपये तक पहुंचता है. ऐसे में यहां सवाल इसलिए ज्यादा गंभीर हो जाता है क्योंकि बस की कमाई और उसके चलने खर्च के बीच का अंतर नोएडा अथॉरिटी को उठाना है. टिकट से जो रेवेन्यू आता है, उसे घटाने के बाद बाकी रकम का भुगतान प्राधिकरण करता है. यानी बस में 50 यात्री हों या 5, किलोमीटर पूरा होने पर पेमेंट का स्ट्रक्चर लगभग वही रहता है. यही व्यवस्था यात्रियों की असल मांग के बजाय बस की दूरी को उसके चलाने का मुख्य पैमाना बना देती है.
जिस रूट पर यात्री कम, वहां भी बस दौड़ती रहेगी?
गौर किया जाए तो ग्रेटर नोएडा वेस्ट, सेक्टर-52 और नोएडा सिटी सेंटर जैसे इलाकों में बसों के कम यात्रियों के साथ चलने की बात सामने आई है. यहां असली सवाल रूट तय करने की प्रक्रिया को लेकर है. किस समय किस इलाके में कितने यात्री निकलते हैं, किस रूट पर डिमांड ज्यादा है और कहां बस की जरूरत कम है, अगर इन आंकड़ों को जांचकर बसों की संख्या और फ्रीक्वेंसी तय नहीं होती तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का मतलब ही क्या है? दिलचस्प बात यह है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में सार्वजनिक परिवहन की पहले से बड़ी कमी रही है, जोकि यहां के आम लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या है. ऐसे में प्राइवेट व्हीकल सड़कों पर बड़ी तादात में दौड़ते हैं, जिसका नतीजा सुबह और शाम आप और हम सड़कों पर भारी जाम के रूप में भी देखते हैं.
बसें खाली, फिर भी खर्च जनता की जेब से
इस मॉडल का बड़ा सवाल पैसों का भी है. अगर बस खाली या बेहद कम यात्रियों के साथ चलती है तो चार्जिंग के लिए बिजली, ड्राइवर-कंडक्टर की सैलरी, मेनटेनेंस और दूसरे ऑपरेशन खर्च तो होते ही हैं, लेकिन यात्रियों से मिलने वाला पैसा बेहद कम रहता है. ऐसे में सरकारी धन का इस्तेमाल ऐसी सर्विस पर हो रहा है जिसका लाभ यात्रियों को ज्यादा से ज्यादा मिल ही नहीं रहा, तो कमाई होगी कैसे? हालांकि नोएडा अथॉरिटी का कहना है कि ई बसों में यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. अथॉरिटी के अनुसार जुलाई में करीब 1.5 लाख लोगों ने सफर किया, जबकि अगस्त में 100 ई बसों से करीब 3.5 लाख यात्रियों ने यात्रा की. यात्रियों को बस में बैठाने में लापरवाही की शिकायत के लिए हेल्पलाइन भी जारी की गई है और बसों की निगरानी के लिए लाइव ट्रैकिंग व्यवस्था शुरू करने की बात कही गई है.
असली जरूरत किलोमीटर नहीं, यात्री हैं
नोएडा, ग्रेटर नोएडा, दादरी, जेवर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता. शहर तेजी से फैल रहा है और मेट्रो के बाद आखिरी छोर तक पहुंचने के लिए बड़ी आबादी को बस, ऑटो या कैब पर निर्भर रहना पड़ता है. हाल की रिपोर्टों में भी नोएडा में जरूरत के मुकाबले सिटी बसों की कमी और यात्रियों की निजी वाहनों पर बढ़ती निर्भरता का मुद्दा सामने आया है. ऐसे में सवाल यह नहीं है कि ई बसें चलनी चाहिए या नहीं. सवाल यह है कि उन्हें चलाने का तौर तरीका सही है या नहीं. क्या पेमेंट सिर्फ किलोमीटर के आधार पर हो या इसमें यात्रियों की संख्या, टिकट से होने वाली कमाई, समय पर इसके चलने और रूट की मांग जैसे मानकों को भी जोड़ा जाना चाहिए. अगर किसी रूट पर सुबह और शाम यात्रियों की संख्या कई गुना बढ़ती है तो उसी समय बसों की फ्रीक्वेंसी बढ़नी चाहिए. इसके उलट कम मांग वाले समय में उतनी ही संख्या में बसें चलाना संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल नहीं माना जा सकता.
