हाल ही में दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में बने बॉयज हॉस्टल की बिल्डिंग गिरने से 7 लोगों की मौत हो गई. इस हादसे ने भले ही लोगों को बेचैन कर दिया लेकिन हॉस्टलों को लेकर अब एक नींद उड़ाने वाला सर्वे सामने आया है. हादसे के ठीक बाद एमसीडी के इस सर्वे के अनुसार दिल्ली में चल रहे पीजी और हॉस्टलों में से 99 फीसदी बिल्डिंगों में फायर एनओसी ही नहीं है. जबकि 10 में से 3 बिल्डिंगों के पास लेआउट अप्रूवल ही नहीं है. यानि उन्होंने एमसीडी से नक्शा ही पास नहीं कराया है और एक के बाद एक मंजिलें चढ़ाकर बिल्डिंग बना दी है.
दिल्ली नगर निगम के राजधानी में मौजूद पेइंग गेस्ट (पीजी) आवासों के सर्वे में आए आंकड़ों ने एक बार फिर लोगों की चिंता बढ़ा दी है. इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक इस सर्वे में शामिल 2453 पीजी इमारतों में से महज 1.2 प्रतिशत के पास ही दिल्ली फायर सर्विस का फायर एनओसी मिला है, बाकी इमारतें बिना फायर सेफ्टी के हैं और इनमें रोजाना लाखों छात्र अपनी जान को जोखिम में डालकर रह भी रहे हैं. आंकड़ों के अनुसार करीब 99 प्रतिशत पीजी बिना अग्नि सुरक्षा मंजूरी के चल रहे हैं.
दिल्ली में पीजी और हॉस्टलों का हाल किसी जेल से कम नहीं है, यहां कमरों में खिड़कियां भी नहीं होतीं.
हाईकोर्ट के डंडे के बाद शुरू हुआ था सर्वे
आज जब हादसे के महज एक हफ्ते बाद ही सर्वे के नतीजे सामने आ गए हैं तो उसके पीछे भी दिल्ली हाईकोर्ट का डंडा है, क्योंकि हाईकोर्ट ने ही सख्त रुख अपनाया और 7 सितंबर को इस मामले में नाराजगी जताते हुए एमसीडी को फटकार लगाई थी. इसके बाद एमसीडी ने शहर के सभी 12 जोनों में अवैध निर्माणों पर कार्रवाई के साथ-साथ पीजी आवासों की जांच शुरू की. दस्तावेजों की जांच में स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट, ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसीसी) और मास्टर प्लान फॉर दिल्ली (एमपीडी) के अनुपालन जैसे बिंदु शामिल किए गए थे, जिसके बाद बच्चों की जान से हो रहे खिलबाड़ के चौंकाने वाले नतीजे मिले.
बिना बिल्डिंग प्लान के तंग गलियों में बन गए विशालकाय पीजी
सर्वे के मुताबिक, सिर्फ 726 पीजी इमारतों (करीब 30 प्रतिशत से भी कम) के पास ही मंजूर बिल्डिंग प्लान मिला है. जबकि स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट तो महज आठ इमारतों के पास ही है. मान लीजिए अगर यहां कोई आपदा आ जाती है, जलजला आ जाता है तो शायद कोई भी न बचे. यहां बनी बिल्डिंगे बिना किसी सुरक्षा प्लान के खड़ी कर दी गई हैं, जबकि यह देश की राजधानी है. इस सर्वे ने अब बड़े गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
सर्वे की मुख्य बातें क्या हैं?
- कुल सर्वे किए गए पीजी: 2,453
- फायर एनओसी वाले: सिर्फ 31 (1.2 प्रतिशत)
- मंजूर बिल्डिंग प्लान वाले: 726 (30 प्रतिशत से कम)
- स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट वाले: सिर्फ 8
- सिविल लाइन्स जोन: 608 पीजी (सबसे ज्यादा), फायर एनओसी 28, स्ट्रक्चरल सर्टिफिकेट शून्य
- केशव पुरम जोन: 410 पीजी, फायर एनओसी 2, स्ट्रक्चरल 2
- साउथ जोन: 390 पीजी, फायर एनओसी, स्ट्रक्चरल, बिल्डिंग प्लान और ओसीसी सभी शून्य
- सर्वे हाईकोर्ट के आदेश के बाद शुरू, डेडलाइन के बाद भी जारी
सत्य निकेतन हादसे के बाद एमसीडी जर्जर इमारतों पर कार्रवाई कर रही है. (पीटीआई)
साउथ कैंपस में सबसे खतरनाक हाल
जोन-वाइज आंकड़े और भी चिंताजनक हैं. सिविल लाइन्स जोन में, जहां दिल्ली विश्वविद्यालय का नॉर्थ कैंपस स्थित है, सबसे ज्यादा 608 पीजी आवास मिले. इनमें से सिर्फ 364 के पास मंजूर बिल्डिंग प्लान हैं, 28 के पास फायर एनओसी, 27 के पास रेगुलराइजेशन अप्रूवल है, जबकि किसी के पास भी स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट नहीं है. जबकि केशव पुरम जोन में 410 पीजी मिले. इनमें सिर्फ 54 के पास मंजूर प्लान, दो के पास फायर एनओसी और दो के पास स्ट्रक्चरल सर्टिफिकेट है. ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट किसी के पास नहीं.
साउथ जोन, जहां डीयू साउथ कैंपस, आईआईटी दिल्ली और जेएनयू जैसे संस्थान हैं, वहां 390 पीजी दर्ज किए गए. यहां किसी भी इमारत के पास न तो फायर क्लियरेंस है, न स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट, न बिल्डिंग प्लान मंजूरी और न ही ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट. मास्टर प्लान के तहत पीजी गतिविधि की अनुमति भी किसी में दर्ज नहीं हुई.
हर नियम ताक पर, कैसे चल रही राजधानी?
नियमों के मुताबिक, इमारतों को एमसीडी से लेआउट प्लान मंजूर कराना जरूरी है. फायर एनओसी दिल्ली फायर सर्विस की ओर से दी जाती है, जो इमारत की अग्नि सुरक्षा सुनिश्चित करती है. इसमें आपातकाल में भागने के रास्ते खुले रखना, फायर फाइटिंग उपकरण चालू हालत में रखना जैसी शर्तें शामिल हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि हर नियम को ताक पर रखकर राजधानी में पीजी का जाल फैला हुआ है और मजे से सब चल भी रहे हैं.
सत्य निकेतन में यही हाल ले डूबा
सत्य निकेतन इमारत में कथित तौर पर सिर्फ एक ही निकास मार्ग था. वहीं स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट उसके पास भी नहीं था जो यह साबित करता है कि इमारत अपने भार और दबाव को झेल सकती है या नहीं. ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट निर्माण पूरा होने के बाद जारी होता है. रेगुलराइजेशन के जरिए कुछ अवैध निर्माणों को नियमों के दायरे में लाया जाता है.
आखिर क्यों दिल्ली के पीजी में रहते हैं छात्र
दिल्ली में लाखों की संख्या में आज भी छात्र पढ़ाई करने आते हैं क्योंकि यहां देश की कई नामी यूनिवर्सिटीज हैं. इसके अलावा एनसीआर के ज्यादातर छात्र भी यहीं पढ़ाई करने को प्राथमिकता देते हैं लेकिन चाहे डीयू हो जेएनयू या अन्य कोई यूनिवर्सिटी, इनके पास इतने हॉस्टल ही नहीं हैं कि ये छात्र यहां रह सकें और यही वजह है कि यहां खरपतवार की तरह हॉस्टल उग आए हैं. घरों में अवैध रूप से बने पीजी बिना एनओसी के और नियमों को ताक पर रखकर चल रहे हैं.
