नोएडा. आठ साल पहले में रोजगार की तलाश में बिहार से दिल्ली पहुंचे शम्स परवेज ने अपने अनुभव और एक अनोखे आइडिया के दम पर ऐसा बिजनेस शुरू किया, जिसने आगे चलकर एक बड़ी कंपनी का रूप ले लिया. शम्स बताते हैं कि वे बिहार में पहले से ही छोटे स्तर पर कारोबार करते थे, लेकिन साल 2016 में हुई नोटबंदी ने उनके सोचने का तरीका बदल दिया. नोटबंदी के दौरान बैंकों के बाहर लगी लंबी कतारों और लोगों को हो रही परेशानी को देखकर उनके मन में सवाल आया कि आखिर बैंकिंग सेवाओं को लोगों के घर और उनकी जरूरत के करीब कैसे पहुंचाया जा सकता है. इसी सवाल से एक नए बिजनेस आइडिया की शुरुआत हुई.
पेटीएम को करीब से समझा
लोकल 18 से शम्स तबरेज (सीईओ & फाउंडर ऑफ एजीपी) बताते हैं कि नोटबंदी के दौरान उन्होंने Paytm के बढ़ते इस्तेमाल को करीब से समझने की कोशिश की. करीब दो साल तक इस पूरे क्षेत्र पर रिसर्च की. इसी दौरान उनके मन में एक ऐसा मॉडल तैयार हुआ, जिसमें किराना दुकान या स्थानीय दुकानदार को बैंकिंग सेवा का माध्यम बनाया जा सके. उनका विचार था कि लोग किसी दुकान पर जाकर अपने रोजमर्रा के सामान के साथ अपने बैंक खाते से पैसे भी निकाल सकें या जमा कर सकें. इसी सोच के आधार पर उन्होंने Ezeepay की शुरुआत की.
दुकानदारों को मिली नई कमाई
Ezeepay के जरिए दुकानदारों को ‘बैंक मित्र’ और बैंकिंग एजेंट के तौर पर जोड़ा गया. शम्स के अनुसार, इन बैंक मित्रों के माध्यम से ग्राहक आधार के जरिए अपने बैंक खाते से पैसे निकालने और जमा करने के साथ बिल पेमेंट, फ्लाइट बुकिंग, होटल बुकिंग और ट्रैवल बुकिंग जैसी सेवाओं का लाभ ले सकते हैं. उनका कहना है कि इस मॉडल का उद्देश्य बैंकिंग सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना था, खासकर उन इलाकों में जहां बैंक की शाखाएं लोगों से दूर हैं. दुकानदारों के लिए यह अतिरिक्त कमाई का जरिया बना, क्योंकि वह अपनी दुकानदारी के साथ बैंकिंग सेवाएं देकर कमीशन कमा सकते हैं. शम्स के मुताबिक, इस मॉडल के जरिए उन्होंने रोजगार के अवसर पैदा करने के साथ बैंकिंग सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने की कोशिश की है.
5 लाख से ज्यादा एजेंट
शम्स परवेज कहते हैं कि आज इस कंपनी के बैंक मित्र देशभर के करीब 12 हजार पिन कोड्स में मौजूद हैं. उनके अनुसार, कंपनी के साथ 5 लाख से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं, जो बैंक मित्र एजेंट के तौर पर काम करते हैं और कमीशन के जरिए महीने में करीब 20 से 25 हजार रुपये तक अतिरिक्त कमाई करते हैं. कंपनी में करीब 200 लोग ऑन-पेरोल काम कर रहे हैं, जबकि ऑफ-पेरोल नेटवर्क में 5 लाख से ज्यादा बैंक मित्र एजेंट जुड़े हुए हैं. इस तरह उनका कहना है कि छोटे दुकानदारों को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ने वाला यह मॉडल रोजगार और डिजिटल बैंकिंग दोनों को आगे बढ़ाने का माध्यम बना.
क्या आई चुनौती
शम्स तबरेज बताते हैं कि आज कंपनी का टर्नओवर महीने का करीब 1100 करोड़ का है. इस सफर की शुरुआत शम्स के लिए आसान नहीं थी. वे कहते हैं कि बिहार के एक छोटे शहर से दिल्ली आने के बाद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह थी कि उनका बैकग्राउंड टेक्नोलॉजी का नहीं था, जबकि उनका पूरा बिजनेस टेक्नोलॉजी पर आधारित था. इसके बावजूद उन्होंने एक टीम तैयार की और उसके साथ आगे बढ़ते गए. शम्स का कहना है कि अगर सोच सच्ची हो और उस पर पूरी मेहनत और विश्वास के साथ काम किया जाए, तो रास्ते में सही लोग और सही मौके मिलते जाते हैं.
