Last Updated:
जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. दोनों ने दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के जमानत खारिज करने के आदेश को चुनौती दी है. छह साल से अधिक समय से जेल में बंद दोनों ने दलील दी है कि लंबी कैद और एक भी गवाह की गवाही न होना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.
सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई है.
दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के आरोपी जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम की कानूनी लड़ाई अब सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच चुकी है. दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत की उम्मीद टूटने के बाद इन दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. अदालत में दायर याचिकाओं में सबसे बड़ा सवाल यह उठाया गया है कि आखिर बिना एक भी गवाह से पूछताछ किए किसी को इतने लंबे समय तक जेल में कैसे रखा जा सकता है? हालांकि दिल्ली पुलिस इन्हें इस पूरे खौफनाक षड्यंत्र का मास्टरमाइंड और वैचारिक ड्राइवर बताकर लगातार विरोध कर रही है.
छह साल से जेल में कैद
सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में दोनों कार्यकर्ताओं के वकीलों ने सबसे बड़ा मुद्दा ट्रायल में हो रही भारी देरी को बनाया है. दलील दी गई है कि वे पिछले छह साल से अधिक समय से बतौर अंडरट्रायल सलाखों के पीछे हैं, लेकिन अभियोजन पक्ष 900 से ज्यादा गवाह होने के बावजूद अभी तक एक भी गवाह से पूछताछ या परीक्षा नहीं कर पाया है. लंबी कैद अब सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों पर प्रहार कर रही है.
आर्टिकल 21 और समयसीमा का हवाला
याचिकाओं में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नई जमानत याचिका दाखिल करने के लिए तय किया गया एक साल का समय अब खत्म होने की कगार पर है. संविधान का आर्टिकल 21 हर नागरिक को जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है. ऐसे में बिना ट्रायल शुरू हुए अनिश्चितकाल तक जेल में रखना कानून की प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन है. वहीं, दिल्ली पुलिस का कहना है कि ये दोनों इस साजिश के “मास्टरमाइंड” और “कमांड अथॉरिटी” रहे हैं.
पहले भी खारिज हो चुकी है जमानत याचिकाएं
इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने 4 जुलाई को उनकी जमानत याचिका तीसरी बार खारिज कर दी थी, जिसके बाद वे हाई कोर्ट पहुंचे थे. हाई कोर्ट ने भी यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि वह सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों और न्यायिक अनुशासन से बंधा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पहले टिप्पणी की थी कि यूएपीए (UAPA) के तहत इन दोनों की भूमिका अन्य आरोपियों से अलग और ‘वैचारिक ड्राइवर’ के रूप में थी.
यूएपीए की सख्त शर्तों और लंबी कैद पर सवाल
यह मामला सिर्फ उमर और शरजील तक सीमित नहीं है, बल्कि यूएपीए (UAPA) जैसे कड़े कानूनों के तहत बंद अंडरट्रायल कैदियों की लंबी कैद और जमानत की कड़ी शर्तों पर भी सवाल खड़े करता है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस तरह के मामलों को बड़ी बेंच के पास भेज चुका है. अब देखने वाली बात यह होगी कि सुप्रीम कोर्ट इस नई याचिका पर क्या रुख अपनाता है और क्या इन्हें राहत मिलती है.
