दिल्ली. दिल्ली में यमुना का प्रदूषण लंबे समय से चिंता का विषय रहा है. लेकिन अब इसका असर सिर्फ नदी के पानी तक सीमित नहीं माना जा रहा. यमुना के किनारे उगाई जाने वाली सब्जियों को लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के वनस्पति विभाग की एक रिसर्च में ऐसी बातें सामने आई हैं, जो सीधे हमारी सेहत और खाने की थाली से जुड़ी हैं. रिसर्च के मुताबिक, यमुना के आसपास की मिट्टी और वहां उगाई जा रही कुछ सब्जियों के सैंपल में भारी धातुएं (Heavy Metals) पाई गई हैं.
इस रिसर्च को लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के बॉटनी विभाग के प्रोफेसर दीनबंधु साहू ने बताया कि उनकी टीम ने यमुना के करीब 22 किलोमीटर के इलाके में पानी, मिट्टी और सब्जियों को लेकर अध्ययन किया. खास तौर पर कालिंदी कुंज के आसपास के इलाकों से सैंपल लिए गए.
यमुना के प्रदूषित पानी से मिट्टी तक पहुंच रहे हैं भारी धातु
प्रोफेसर दीनबंधु साहू के मुताबिक, उनकी टीम कई सालों से यमुना के पानी में प्रदूषण के स्तर को लेकर रिसर्च कर रही है. इसी दौरान यह सवाल उठा कि यमुना के आसपास जिस मिट्टी में खेती हो रही है, उस पर प्रदूषण का कितना असर पड़ रहा है. जब मिट्टी के सैंपल की जांच की गई तो उसमें क्रोमियम, लेड, कैडमियम, आर्सेनिक और निकेल जैसी भारी धातुएं पाई गईं. इसके बाद टीम ने उसी इलाके में उगाई जाने वाली सब्जियों के सैंपल भी लिए.
मूली से लेकर पालक और आलू तक की हुई जांच
रिसर्च में अलग-अलग तरह की सब्जियों को शामिल किया गया. इनमें सफेद मूली, लाल मूली, धनिया, मेथी, पालक और आलू शामिल थे. प्रोफेसर के मुताबिक, सभी सब्जियों के सैंपल लिए गए और उन्हें टेस्टिंग के लिए भेजा गया. जांच में इन सब्जियों में भी भारी धातुओं की मौजूदगी सामने आई. प्रोफेसर का कहना है कि कुछ मामलों में इनकी मात्रा तय अंतरराष्ट्रीय मानकों से कई गुना ज्यादा पाई गई. यानी जिस मिट्टी और पानी के संपर्क में ये सब्जियां बढ़ रही हैं, उसका असर फसल तक पहुंचने की चिंता सामने आई है.
सिर्फ भारी धातु नहीं, पानी में बैक्टीरिया का भी खतरा
प्रोफेसर ने बताया कि यमुना के पानी में सिर्फ केमिकल प्रदूषण ही नहीं है, बल्कि बैक्टीरिया का लोड भी काफी ज्यादा है. पानी में कई तरह के बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जिनकी वजह से इसे पीने के लिए सुरक्षित नहीं माना जा सकता. ऐसे में सवाल यह है कि अगर इसी तरह के प्रदूषित पानी का इस्तेमाल खेती में किया जा रहा है, तो उसका असर सब्जियों पर कितना पड़ सकता है.
सब्जी को धोने से क्या भारी धातुएं निकल जाएंगी
यह सवाल आम लोगों के लिए सबसे जरूरी है. अगर सब्जी खरीदकर घर लाने के बाद उसे अच्छी तरह धो लिया जाए, तो क्या वह पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगी? प्रोफेसर दीनबंधु साहू के मुताबिक, सब्जी को धोने से उसकी सतह पर मौजूद मिट्टी और गंदगी हटाई जा सकती है, लेकिन अगर भारी धातु पौधे के अंदर तक पहुंच चुकी है, तो सिर्फ धोने से उसे निकालना संभव नहीं होगा. इसलिए सिर्फ सब्जी को धोना ही पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता. असली सवाल यह है कि वह सब्जी किस मिट्टी और किस पानी में उगाई गई है.
बहुत ज्यादा साफ-सुंदर सब्जी देखकर न खरीदें, सोर्स जानना भी जरूरी
अक्सर बाजार में हम सब्जी का रंग और ताजगी देखकर उसे खरीद लेते हैं. खासकर पालक या दूसरी हरी सब्जियां ज्यादा हरी दिखें तो हमें लगता है कि वह ज्यादा अच्छी होंगी. लेकिन प्रोफेसर ने साफ किया कि सब्जी का हरा रंग अपने आप में उसकी गुणवत्ता या सुरक्षा की गारंटी नहीं है. पौधों में क्लोरोफिल की वजह से हरा रंग आता है. किसी सब्जी का बाहर से अच्छा दिखना यह साबित नहीं करता कि उसके अंदर सब कुछ ठीक है.
फिर आम लोग क्या करें
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सब्जियों को छोड़ नहीं सकते, तो फिर सावधानी कैसे बरतें? प्रोफेसर के मुताबिक, सबसे जरूरी है कि लोग सब्जियों के स्रोत को लेकर जागरूक हों. संभव हो तो यह पता करें कि सब्जी कहां उगाई गई है और किस तरह के पानी से उसकी खेती हुई है. उन्होंने ऑर्गेनिक और हाइड्रोपोनिक खेती का भी जिक्र किया, जहां खेती नियंत्रित परिस्थितियों में की जाती है. हालांकि हर व्यक्ति के लिए ऐसी सब्जियां खरीदना आसान या किफायती हो, यह जरूरी नहीं है.
सब्जियों की टेस्टिंग और लेबलिंग पर जोर
प्रोफेसर के मुताबिक, इस समस्या से निपटने के लिए सिर्फ किसान या सिर्फ आम लोगों की जिम्मेदारी नहीं हो सकती. पानी, मिट्टी और सब्जियों की नियमित जांच जरूरी है. उन्होंने सब्जियों की भी उसी तरह ट्रेसिंग और लेबलिंग की जरूरत बताई, जिस तरह पैक्ड फूड पर जानकारी दी जाती है. अगर लोगों को यह पता हो कि सब्जी कहां से आई है और उसकी खेती किस जगह हुई है, तो वे खरीदारी को लेकर ज्यादा जानकारी के साथ फैसला कर सकते हैं.
यमुना का प्रदूषण सिर्फ दिल्ली की समस्या नहीं
प्रोफेसर ने यह भी कहा कि नदियों का प्रदूषण सिर्फ पानी तक सीमित नहीं रहता. भारी धातुएं मिट्टी में पहुंचने के बाद भूजल तक भी जा सकती हैं. इसलिए यह समस्या आने वाले समय में और बड़ी हो सकती है. उनका कहना है कि अगर अभी से पानी, मिट्टी और खेती को लेकर निगरानी और जांच शुरू नहीं की गई, तो भविष्य में इसका असर लोगों की सेहत पर काफी ज्यादा पड़ सकता है.
