Success Story: मौत से 2-2 बार जीती जंग, आज राष्ट्रीय लेवल पर मशहूर हैं अधिवक्ता राघवेंद्र प्रसाद सिंह, गरीबों का केस लड़ते हैं मुफ्त

नई दिल्ली: राघवेंद्र पी. सिंह यह नाम वकालत के क्षेत्र में आज ना सिर्फ देश, बल्कि विदेशों तक अपना परचम लहरा चुका है. मात्र 24 साल की उम्र में काला कोट पहनकर लोगों को न्याय दिलाने के लिए निकले राघवेंद्र सिंह की जिंदगी ने उनको हर कदम पर चुनौती थी, लेकिन हर चुनौती को उन्होंने पार कर लिया. पहले ब्रेन स्ट्रोक, उसके बाद दो बार कोरोना और फिर डेंगू, जिसमें 9 किलो वजन घट जाने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और सभी बीमारियों को मात देकर वापस सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट पहुंच गए ताकि जिनको उन्होंने न्याय दिलाने का वादा किया है वो वादा पूरा कर सकें.

आज भी राघवेंद्र सिंह का दाहिना हिस्सा यानी हाथ और पैर ब्रेन स्ट्रोक होने के बाद सही से काम नहीं करता है. बोलने में भी उनको थोड़ी दिक्कत होती है, लेकिन इन सब के बावजूद वह विदेश तक अकेले जाते हैं. मुकदमा लड़ते हैं और जीत कर आते हैं. लोकल 18 के खास इंटरव्यू में उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा साझा किया. आइये जानते हैं उन्होंने क्या कुछ साझा किया.

1995 में बिहार से आए थे दिल्ली

राघवेंद्र सिंह ने बताया कि 1995 में वह बिहार से दिल्ली पहली बार आए थे. परिवार में कोई भी वकील नहीं था. पिता बिहार के पूर्व डीएसपी रह चुके हैं, जिनका नाम राजदेव प्रसाद सिंह था. बिहार से जब वह दिल्ली आए तो उन्होंने पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में किरोड़ीमल कॉलेज में दाखिला लिया. इसके बाद वकालत की पढ़ाई के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में उनकी रैंक आ गई. शुरुआत के तीन-चार महीने उन्हें लगा कि वह वकालत क्यों कर रहे हैं. क्योंकि वह कुछ और करना चाहते थे, लेकिन पांचवें और छठे महीने में जब वकालत की पढ़ाई समझ में आने लगी, तब लगा कि इससे अच्छी पढ़ाई तो कुछ और हो ही नहीं सकती.

उस समय बेस्ट टीचर बीबी पांडेय ने उनको काफी प्रभावित किया. जहां से पढ़ाई करने के बाद वह कोटक महिंद्रा बैंक में लीगल मैनेजर बन गए. जहां पर उन्होंने 9 साल काम किया. यही उनकी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. क्योंकि यहां पर उन्होंने कॉर्पोरेट केस देखे ना सिर्फ देश बल्कि विदेशों तक के मामले देखने के बाद उन्होंने जाना ड्राफ्टिंग क्या है. कहां बोलना है और कितना बोलना है. कैसे कॉर्पोरेट क्लाइंट को डील करना है. यहां से उनका नाम यूरोप समेत विदेशों तक पहुंच चुका था. यही वक्त था जब उन्होंने साल 2012 में तय किया कि अब वक्त आ गया है कि खुद का फॉर्म बनाया जाए. फिर 2012 में उन्होंने बना दिया कॉन्सेप्ट लीगल इंटरनेशनल, इसके वह आज मालिक हैं.

2018 में हुआ ब्रेन स्ट्रोक और बदल गई जिंदगी

राघवेंद्र सिंह ने बताया कि उनकी जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन तभी 2018 आया. जब उनको ब्रेन स्ट्रोक हो गया. 27 दिन वह आईसीयू के अंदर रहे. तब उन्हें लगने लगा था कि दुनिया जैसे खत्म हो गई है. क्योंकि शरीर का दाहिना हिस्सा काम करना बंद कर चुका था. वह ठीक से बोल तक नहीं पा रहे थे. तभी उन्होंने डॉक्टरों की बात सुन ली, जिसमें एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर से कह रहे थे कि राघवेंद्र को ब्रेन स्ट्रोक हुआ है और वह 6 साल तक बिस्तर से नहीं उठ पाएंगे. यह बात उनको इतनी ज्यादा बुरी लगी कि उन्होंने ठान लिया कि अपने पैरों पर तो वह खड़े होकर दिखाएंगे ही.

मार्च के बाद वह जब अपने घर आए तो जुलाई में छुट्टियों के बाद दोबारा जब कोर्ट खुलता है तो 3 जुलाई को उनका मामला लगा हुआ था. एक मामले की सुनवाई पर उन्हें एक वकील के तौर पर जाना था. उनके सारे दोस्तों ने पहले से ही उनके सभी मामलों को देखने का मोर्चा संभाल रखा था, लेकिन फिर भी राघवेंद्र कोर्ट पहुंचे. जज ने जब उनकी हालत देखी तो उन्हें अपने पास बुला लिया. राघवेंद्र ने लड़खड़ाती आवाज में कहा कि वह स्टे चाहते हैं. जज ने तुरंत स्टे दे दिया और यहां से उनका हौसला लौट आया.

बिना पैसे लिए लड़ते हैं गरीबों के मामले

राघवेंद्र सिंह ने बताया कि 2018 में ब्रेन स्ट्रोक के बाद उन्हें कोरोना के वक्त कोरोना भी दो बार हो गया था. उसके बाद डेंगू हो गया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. आज वह कॉर्पोरेट और रियल स्टेट के साथ-साथ मैट्रिमोनियल और क्रिमिनल केस भी देखते हैं. अब तक करीब 1800 से लेकर 1900 केस वह लड़ चुके हैं. जिनके पास पैसे नहीं होते हैं, उनके मामलों को राघवेंद्र फ्री में लड़ते हैं. रोज रविवार को दोपहर 12:00 बजे से लेकर 2:00 बजे तक वह अपने ऑफिस के दरवाजे को हर उस व्यक्ति के लिए खोल कर रखते हैं, जिसके पास मुकदमा लड़ने का पैसा नहीं होता है.

वर्तमान में करीब 50 से ज्यादा फाइल उनके पास हैं, जिनका मुकदमा वह बिना पैसे लिए ही लड़ रहे हैं. उन्होंने बताया कि आज वह अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं और खुश हैं और लगातार देश-विदेश के मुकदमों को लड़ रहे हैं. उनकी पत्नी हैं, जो सरकारी टीचर हैं और एक बेटी है. जो कि मेडिकल की पढ़ाई कर रही है और बेटा भी अभी पढ़ाई कर रहा है.

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