शूटिंग के लिए मां ने रखी थी 12वीं में 98% की शर्त, अब एशियन गेम्स में जीता सिल्वर, कौन हैं DU स्टूडेंट आशिमा अहलावत?

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Asian Games 2026 : रोहतक की रहने वाली आशिमा अहलावत ने एशियन गेम्स 2026 के ट्रैप शूटिंग टीम इवेंट में सिल्वर मेडल जीता है. आशिमा दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट भी हैं. आशिमा के शूटिंग शुरू करने की कहानी दिलचस्प है.

Asian Games 2026 : आशिमा ने शूटिंग की शुरुआत पिस्टल से की थी.

Asian Games 2026 : जापान में चल रहे एशियन गेम्स में दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा अशीमा अहलावत ने सिल्वर मेडल जीतकर झंडे गाड़े हैं. उन्होंने यह मेडल ट्रैप टीम शूटिंग इवेंट में अपनी टीम की साथी नीरू ढांडा और मनीषा कीर के साथ मिलकर हासिल किया. आशिमा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमए की स्टूडेंट हैं. उनकी उपलब्धि पर DU में खुशी का माहौल है. कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि ऐसी उपलब्धियां देश के साथ-साथ विश्वविद्यालय का नाम भी रोशन करती हैं और दूसरे विद्यार्थियों व भावी खिलाड़ियों को प्रेरणा देती हैं.

आशिमा इससे पहले भी यूनिवर्सिटी लेवल पर शानदार प्रदर्शन कर चुकी हैं. अप्रैल 2026 में जीएनडीयू, अमृतसर में आयोजित ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी शूटिंग (महिला) टूर्नामेंट के ट्रैप इवेंट में वह DU की गोल्ड मेडल जीतने वाली महिला शूटिंग टीम का हिस्सा थीं. इसी प्रतियोगिता में उन्होंने व्यक्तिगत सिल्वर मेडल भी जीता था.

रोहतक की हैं आशिमा

आशिमा हरियाणा के रोहतक जिले के खरकड़ा गांव की रहने वाली हैं. 27 सितंबर 2003 को जन्मी आशिमा को साल 2018 के राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय निशानेबाजी के प्रदर्शन से शूटिंग में आने की प्रेरणा मिली. मनु भाकर और हीना सिद्धू के प्रदर्शन ने उनके मन में निशानेबाज बनने का सपना जगाया.

मां ने रखी पढ़ाई की शर्त

रिपोर्ट के अनुसार, आशिमा की मां सुमित्रा अहलावत ने बताया कि वह चाहती थीं खेल के कारण बेटी की पढ़ाई प्रभावित न हो. उन्होंने शर्त रखी कि 12वीं में 98% मार्क्स आने पर ही शूटिंग की अनुमति मिलेगी. आशिमा ने 98.6% अंक हासिल करके यह शर्त पूरी की और लेडी श्रीराम कॉलेज में दाखिला लिया.

पिस्टल से शुरू किया था सफर

सुमित्रा अहलावत ने बताया कि आशिमा ने शूटिंग की शुरुआत 10 मीटर एयर पिस्टल से की थी. बाद में पूर्व भारतीय निशानेबाज रंजन सोढ़ी की सलाह पर उन्होंने शॉटगन ट्रैप शूटिंग को अपना लिया. आशिमा की बेहतर ट्रेनिंग के लिए उनकी मां सुमित्रा को भी रोहतक से दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा. शुरुआती दौर में पहली शॉटगन और पर्याप्त कारतूस जुटाने में करीब आठ महीने लग गए.

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Praveen SinghSub Editor

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