10 साल के एक बच्चे के अपहरण और हत्या केस में उम्रकैद की सजा पाने वाली साधना ने जेल से बाहर आने के बाद ऐसी जिंदगी शुरू की, जिसकी भनक लंबे समय तक पुलिस को भी नहीं लगी. दिसंबर 2005 में पेरोल पर बाहर आने के बाद साधना वापस जेल नहीं लौटी. इसके बाद उसने अपना नाम बदला, शहर बदले और धीरे-धीरे अपनी पुरानी पहचान से पूरी तरह दूरी बना ली. पुलिस के मुताबिक, वह अब ‘पूजा’ के नाम से रह रही थी. करीब दो दशक बाद दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच ने उसे हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया.
इस कहानी की शुरुआत 6 जनवरी 1990 से होती है. 10 साल का बच्चा आजादपुर टी-प्वॉइंट से अचानक लापता हो गया था. पुलिस के मुताबिक, उस शाम करीब 5.30 बजे जगदीश चंद और वसदेव नाम के दो गवाहों ने साधना को बच्चे का हाथ पकड़कर जीटी रोड पार करते देखा था. जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने साधना और उसके सह-आरोपी राज कुमार को जहांगिरपुरी से गिरफ्तार किया.
पुलिस के अनुसार, साधना और राज कुमार साथ रहते थे और बच्चे के पिता बलवंत राम और उनके परिवार ने इस रिश्ते का विरोध किया था. पुलिस ने दावा किया कि पहले हुए विवाद ने दोनों के मन में नाराजगी पैदा की और इसी से बदला लेने की साजिश ने जन्म लिया. जांच के दौरान साधना उस बच्चे के साथ आखिरी बार देखे जाने वाली व्यक्ति के तौर पर सामने आई. पुलिस का यह भी आरोप था कि उसने अपने घर में कुमार की मौजूदगी छिपाई और पूरी साजिश में सक्रिय भूमिका निभाई.
मामला अदालत पहुंचा तो साधना को हत्या, हत्या के लिए अपहरण और आपराधिक साजिश के आरोपों में दोषी ठहराया गया. उसे आईपीसी की धारा 302, 364 और 120B के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गई. 9 जनवरी 1990 को उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. करीब 15 साल जेल में रहने के बाद 27 दिसंबर 2005 में पेरोल ने साधना को जेल से बाहर निकलने का मौका दिया. मेडिकल आधार पर इस पैरोल को तीन हफ़्ते और बढ़ा दिया गया था. हालांकि, 18 जनवरी 2006 को उसने सरेंडर नहीं किया और इसके बाद वह गायब हो गई. जिस महिला को उम्रकैद पूरी करने के लिए जेल में होना था, वह अचानक पुलिस रिकॉर्ड से भी दूर हो गई. पुलिस के मुताबिक, उसने पहचान बदली, अलग-अलग शहरों में ठिकाने बनाए और आखिरकार ‘पूजा’ के नाम से एक नई जिंदगी शुरू कर ली.
पुलिस ने बताया कि उसकी आखिरी पैरोल का इंतजाम तिलक नगर के रहने वाले एक दूसरे राज कुमार ने किया था. यह इंतजाम जानकी के कहने पर किया गया था, जो जेल में साधना के साथ ही बंद थी. नोएडा की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने से पहले साधना उसी राज कुमार के साथ रही थी. वहां उसकी मुलाकात केशव नाम के एक बढ़ई से हुई. वे मुकुंदपुर चले गए और वहां लगभग पांच साल रहने के बाद हरिद्वार चले गए. पुलिस के मुताबिक, साधना ने केशव से मंदिर में शादी की और कागजात में उसे अपना पति बताया, जिससे उसकी असली पहचान छिपाने में मदद मिली.
इस बीच, जांच करने वाली टीम इंटेलिजेंस, पुराने साथियों और परिवार के संपर्कों के जरिए सुराग ढूंढती रही. एक महिला के फर्जी पहचान के साथ रहने की हालिया जानकारी मिलने पर टीम हरिद्वार पहुंची और 27 सितंबर को साधना को गिरफ़्तार कर लिया गया. दो दशक से ज्यादा समय तक यह पहचान उसके लिए सुरक्षा कवच बनी रही. लेकिन दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की जांच आखिरकार हरिद्वार तक पहुंची और साधना की नई पहचान का पर्दाफाश हो गया. 1990 के उस पुराने केस की दोषी जो 2005 में पेरोल से निकलने के बाद वापस जेल नहीं लौटी थी, अब फिर पुलिस की गिरफ्त में है.
