सेंट्रल पार्क: राजनीति, यादों और उजड़ते आशियानों की कहानी

कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क इन दिनों सुर्खियों में है. राजधानी में सार्वजनिक जगहें हमेशा से राजनीतिक विरोध और जनभावनाओं को आवाज देने का माध्यम रही हैं. कभी किसी मैदान में सरकार के खिलाफ नारे गूंजते हैं, तो कभी किसी पार्क में जुटे लोग अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद करते हैं. सेंट्रल पार्क में होने वाला प्रदर्शन भी इसी राजनीतिक गतिविधि का हिस्सा है. हालांकि, इस जगह की पहचान केवल प्रदर्शनों या राजनीतिक हलचलों तक सीमित नहीं है. यह दिल्ली के उन खास ठिकानों में से एक है, जहां भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच लोग कुछ पल सुकून से बिता सकते हैं. सवाल यह भी है कि क्या हमारी राजनीति और विकास की दौड़ में शहर के ऐसे खुले स्थानों की अहमियत को पर्याप्त समझा जाता है?

कभी किसी बच्चे या फूलों के बगीचे को गौर से देखिए. तब समझ आएगा कि उनकी देखरेख किस तरह होती है और उन्हें संवारने में कितना प्यार लगता है. कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में कुछ पल गुजारिए. यहां खिले फूलों की खुशबू, साफ-सफाई और हरी घास पर बैठने का सुख महसूस कीजिए. आपको भी लगेगा कि इस जगह को सहेजने में कितनी मेहनत लगती होगी.

पार्क के चारों तरफ दिन भर ट्रैफिक चलता रहता है. गाड़ियों के हॉर्न बजते हैं और बाजार में लोगों की भीड़ लगी रहती है. लेकिन इसके भीतर आते ही बाहर का शोर कुछ दूर छूट जाता है. यहां बैठकर आप कनॉट प्लेस में घूमते लोगों और आसपास खड़ी ऊंची इमारतों को देखते हैं. कुछ देर बाद थकान अपने आप कम होने लगती है.

शायद ही कोई दिल्लीवाला हो, जो कभी न कभी अपने दोस्तों या परिवार के साथ यहां न आया हो. किसी के लिए यह मिलने-जुलने की जगह है, तो किसी के लिए अकेले बैठकर अपने मन की बातें सोचने का ठिकाना. लेकिन सेंट्रल पार्क केवल हरियाली का एक टुकड़ा नहीं है. इसके भीतर दिल्ली की कई यादें, कहानियां और बदलते समय के निशान भी छिपे हैं.

कनॉट प्‍लेस में शान से फहराता तिरंगा हर किसी के मन में राष्‍ट्रप्रेम का भाव भरता है. (फोटो: PTI)

कनॉट प्लेस के बीचोंबीच बसा एक संसार

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ऊपर बना सेंट्रल पार्क लगभग 41,500 वर्ग मीटर में फैला हुआ है. कनॉट प्लेस के निर्माण के शुरुआती दौर से ही इस खुले स्थान का महत्व रहा है. कनॉट प्लेस का निर्माण 1930 के दशक में हुआ. इसके डिजाइनर रॉबर्ट टोर रसेल ने इस इलाके की योजना बनाते समय बीचोंबीच खुली जगह के लिए स्थान रखा था. धीरे-धीरे यह पार्क दिल्ली के शहरी जीवन का अहम हिस्सा बन गया.

एक दौर में यहां शतरंज खेलने वालों की अच्छी-खासी भीड़ जुटती थी. पार्क में सात-आठ जगहों पर लोग शतरंज की बिसात बिछाकर बैठ जाते थे. लंबी-लंबी बाजियां चलती थीं. खिलाड़ी अगली चाल के बारे में सोचते रहते थे. कई लोग सिगरेट के कश लेते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को मात देने की कोशिश करते थे. उनके लिए शतरंज केवल एक खेल नहीं था. यह दोस्तों से मिलने, अपनी समझ आजमाने और वक्त गुजारने का बहाना भी था.

अब वे खिलाड़ी पहले की तरह दिखाई नहीं देते. सवाल उठता है कि वे कहां चले गए? क्या उनकी जगहें बदल गईं या शहर की बदलती रफ्तार ने उनके लिए समय ही नहीं छोड़ा? हो सकता है कि उनमें से कुछ अब उम्रदराज हो गए हों. कुछ ने दूसरी जगहों पर अपना ठिकाना बना लिया हो. लेकिन उनके गायब होने के साथ पार्क की पुरानी तस्वीर का एक हिस्सा भी गायब हो गया है.

किसी सार्वजनिक जगह का इतिहास केवल उसकी इमारतों और नक्शों में नहीं होता. वहां नियमित रूप से आने वाले लोग भी उस इतिहास का हिस्सा होते हैं. शतरंज खेलने वालों के साथ सेंट्रल पार्क में बैठकर घंटों गप्पें मारने वाले लोग भी इस जगह की पहचान बनाते थे.

तिरंगे के नीचे देशभक्ति का अहसास

सेंट्रल पार्क में लगा विशाल तिरंगा दूर से ही दिखाई देता है. करीब 90 फीट चौड़े और 60 फीट लंबे इस तिरंगे को वर्ष 2014 में फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद ने मिलकर यहां स्थापित किया था.

कनॉट प्लेस में खरीदारी करने या घूमने आने वाले लोगों के लिए यह तिरंगा आकर्षण का केंद्र है. इसे देखकर देशभक्ति का भाव भी जागता है. बाजार की भागदौड़ से थक जाने पर कोई व्यक्ति इसके आसपास कुछ देर बैठ सकता है. कोई परिवार के साथ तस्वीर खिंचवाता है, तो कोई दूर से ही इसे निहारता रहता है.

पार्क में एक एम्फीथिएटर भी है. यहां कवि सम्मेलन, नाटक और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं. इस तरह सेंट्रल पार्क मनोरंजन और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. यहां लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने और अलग-अलग कलाओं से जुड़ने के अवसर मिलते हैं.

कनॉट प्लेस में होने वाले आयोजनों का महत्व इसलिए भी है कि यहां दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंच सकते हैं. मेट्रो की सुविधा के कारण यह जगह राजधानी के लोगों के लिए आसानी से सुलभ है. यही वजह है कि किसी प्रदर्शन या सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए भी यह स्थान लोगों का ध्यान खींचता है.

प्रेम के प्रतीक वैलेंटाइन डे पर भी यह पार्क खास तौर पर गुलजार हो जाता है. फूलों की खुशबू और हरियाली के बीच युवा जोड़े यहां वक्त बिताते हैं. पार्क की खुली जगह और सहज माहौल इसे लोगों के लिए आकर्षक बनाते हैं.

यहां अर्जुन, चंपा, जामुन, सेमल, अमलतास, बरगद, गुलमोहर, शीशम और अशोक के पेड़ हैं. ये पेड़ पूरे वातावरण को खुशनुमा बनाते हैं. पार्क की खासियत यह है कि यहां आने के लिए आपको किसी विशेष उद्देश्य की जरूरत नहीं. आप चाहें तो टहलें, चाहें तो बैठकर लोगों को आते-जाते देखें. कभी-कभी किसी सार्वजनिक जगह की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि वहां कुछ न करने की भी पूरी आजादी होती है.

सेंट्रल पार्क का इतिहास काफी पुराना है. (फोटो: PTI)

पेड़ों की छांव में किताब और जिंदगी

सेंट्रल पार्क में आप किसी पेड़ के नीचे किसी व्यक्ति को अपनी पसंदीदा किताब पढ़ते हुए भी देख सकते हैं. जाड़े की मीठी धूप में किसी पार्क में बैठकर किताब पढ़ने से बड़ा सुख शायद ही कोई हो. न किसी काम को पूरा करने की जल्दबाजी और न किसी से मिलने की मजबूरी. किताब, धूप और पेड़ों की छांव के बीच समय अपनी रफ्तार से चलता है.

मेट्रो निर्माण के वक्‍त इसे बंद कर दिया गया था. बाद में इसे नए रूप में विकसित किया गया. (फोटो: PTI)

मेट्रो आई, पार्क लौटा; लेकिन फव्वारा नहीं

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के निर्माण के दौरान सेंट्रल पार्क को वर्ष 2002 से 2006 के बीच हटा दिया गया था. उस समय कुछ लोगों को डर था कि शायद दिल्ली को अपना यह पार्क दोबारा न मिले. कनॉट प्लेस के बीचोंबीच इतनी बड़ी खुली जगह को खोने की आशंका ही लोगों को परेशान करने के लिए काफी थी.

लेकिन भूमिगत मेट्रो स्टेशन का निर्माण पूरा होने के बाद नई दिल्ली नगरपालिका परिषद और दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने इसे फिर से विकसित किया. पार्क नए रूप में सामने आया. इसकी हरियाली और सुंदरता को वापस लाने की कोशिश की गई. यह कहा जा सकता है कि पार्क ने अपना नया रूप हासिल कर लिया, लेकिन पुराने सेंट्रल पार्क की कुछ खास यादें लौटकर नहीं आईं.

उनमें सबसे प्रमुख था विशाल फव्वारा. पहले जब गर्मियों में फव्वारा चलता था, तो उसके आसपास लोगों की भीड़ जुट जाती थी. पानी की फुहारों के बीच गर्मी से कुछ राहत मिलती थी.

विकास की कीमत चुकाते परिंदे

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन और आसपास की मेट्रो लाइनों के निर्माण के दौरान कनॉट प्लेस और उसके इर्द-गिर्द अनेक पेड़ काटे गए. इनमें कई पुराने और घने पेड़ थे. उन्होंने इस इलाके को बनते और बदलते देखा था. वे केवल पेड़ नहीं थे, बल्कि पक्षियों के आशियाने भी थे.

शाम के समय इन पेड़ों पर तोतों और दूसरे पक्षियों का शोर सुनाई देता था. कई बार उनकी चहचहाहट इतनी तेज होती थी कि आसपास खड़े लोगों को एक-दूसरे की आवाज सुनने में कठिनाई होती थी. ऐसा लगता था, जैसे दिन भर बाहर रहने के बाद वे अपने साथियों को दिन भर की बातें सुना रहे हों. मानो वे बता रहे हों कि आज कहां गए, क्या देखा और किससे मिले.

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