Last Updated:
दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा अब सिर्फ फेफड़ों के लिए ही नहीं बल्कि प्रजनन स्वास्थ्य के लिए भी चिंता बढ़ा रही है. जीटीबी अस्पताल के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. अमितेश अग्रवाल ने चेताया है कि लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से पुरुषों में स्पर्म काउंट प्रभावित हो सकता है. महिलाओं में हॉर्मोन का संतुलन बिगड़ने की आशंका भी है. कुछ अध्ययनों में प्रदूषण और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याओं के बीच संबंध सामने आया है. दिमाग और याददाश्त पर इसके संभावित असर को लेकर भी शोध जारी है. जानिए डॉक्टर ने बचाव के लिए कौन सी सावधानियां बताई हैं और एन95 मास्क कितनी सुरक्षा दे सकता है.
दिल्ली-NCR के वायु प्रदूषण से प्रजनन स्वास्थ्य पर भी असर पड़ने की आशंका है. (फाइल फोटो)
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का नाम आते ही सबसे पहले आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में तकलीफ का ख्याल आता है. लेकिन हवा में घुला यह जहर शरीर को सिर्फ फेफड़ों तक नुकसान नहीं पहुंचा रहा. इसका असर हमारी सेहत के उन हिस्सों पर भी पड़ सकता है जिनके बारे में आमतौर पर प्रदूषण से जोड़कर बात नहीं होती. जीटीबी अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने चेताया है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से पुरुषों में स्पर्म काउंट प्रभावित हो सकता है. महिलाओं में हॉर्मोन का संतुलन भी बिगड़ने की आशंका है. यानी दिल्ली-एनसीआर की खराब हवा आने वाले समय में प्रजनन स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का कारण बन सकती है.
गुरु तेग बहादुर अस्पताल के मेडिसिन विभाग के प्रमुख और यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज से जुड़े डॉ. अमितेश अग्रवाल के मुताबिक प्रदूषण का असर शरीर के कई अंगों और उनकी सामान्य कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है. उन्होंने साफ किया कि प्रदूषित हवा में सांस लेने का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को बांझपन की समस्या हो जाएगी. लेकिन लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से शरीर में सूजन और दूसरी जैविक प्रक्रियाओं में बदलाव हो सकता है. इसका असर प्रजनन स्वास्थ्य पर भी पड़ने की आशंका है. चिंता की बात यह है कि इसके अलावा मेटाबॉलिज्म और दिमाग की सेहत पर भी प्रदूषण के असर को लेकर अध्ययन किए जा रहे हैं.
डॉ. अग्रवाल का कहना है कि प्रदूषण को सिर्फ सर्दियों में होने वाली धुंध या खांसी-सांस की परेशानी तक सीमित नहीं समझना चाहिए.
प्रदूषण का खतरा सिर्फ प्रजनन स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. डॉ. अग्रवाल ने बताया कि प्रदूषित हवा के संपर्क और शरीर के मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी के बीच भी संबंध देखा गया है. कुछ शोधों में इससे डायबिटीज का जोखिम बढ़ने की आशंका जताई गई है. वैज्ञानिक अब यह भी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि वायु प्रदूषण का नर्वस सिस्टम और दिमाग पर क्या असर पड़ता है.
मानसिक स्वास्थ्य और याददाश्त के साथ सोचने-समझने की क्षमता पर इसके संभावित प्रभाव भी शोध का विषय हैं. यानी प्रदूषण को केवल सांस की बीमारी मानना सही नहीं होगा. इसका असर शरीर की कई प्रणालियों पर पड़ सकता है.
डॉ. अग्रवाल का कहना है कि प्रदूषण को सिर्फ सर्दियों में होने वाली धुंध या खांसी-सांस की परेशानी तक सीमित नहीं समझना चाहिए. इससे निपटने के लिए हवा की गुणवत्ता सुधारने के साथ शोर प्रदूषण पर नियंत्रण और कचरे का सही प्रबंधन भी जरूरी है. जलस्रोतों और मिट्टी को प्रदूषित होने से बचाना होगा. हानिकारक रसायनों के संपर्क को भी कम करना होगा. आखिरकार पर्यावरण की सुरक्षा ही इंसानी सेहत की सुरक्षा से जुड़ी है.
About the Author
खबरें पढ़ने का बेहतरीन अनुभव
