संजय गांधी के हवाई सपने से बना नोएडा, खेतों में कैसे बने सेक्टर और चमचमाती इमारतें? मेगा सिटी बनने की कहानी

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संजय गांधी ने आसमान से देखा सपना और खेतों में उगी इमारतें, नोएडा कैसे बना शहर

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Noida History: आज नोएडा का जिक्र होने पर चमचमाती इमारतों वाला शहर आंखों के सामने तैर जाता है. चौड़ी सड़कों, इंडस्ट्रियल कंपनियों, रिहायशी इलाकों वाला नोएडा शहर जहां गांव के साथ ही मॉल्स और पब भी हैं. सड़कों पर बेशुमार गाड़ियों से लेकर गगनचुंबी बिल्डिंग तक है. रियल एस्टेट और आईटी हब बने शहर के बनने की नींव पड़े हुए 50 साल पूरे हो गए. देशभर से लोग यहां रोजगार के लिए पैर जमाते हैं. लेकिन ये शहर हमेशा से ही ऐसा नहीं था. एक समय यहां गांव थे, कच्ची पगडंडियां थीं, खेती की उबड़-खाबड़ जमीन थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि पूरे इलाके की किस्मत ही पलट गई? यह किसका सपना था, जो धीरे-धीरे कई सालों में पूरा हुआ? आइए शुरू से जानते हैं हर एक बात.

नोएडा आज के गौतमबुद्धनगर जिले का शहरी हिस्सा है. यमुना नदी और हिंडन नदी के बीच का यह इलाका ठेठ ग्रामीण जीवनशैली वाला था. सेक्टर-18 के शॉपिंग मॉल्स और मार्केट से लेकर फिल्म सिटी हो या 12-22 और बॉटेनिकल गार्डेन तक का इलाका, ये सब खेत और गांव थे. आजादी के बाद दिल्ली शहर राजधानी के रूप में देश की बागडोर संभाल रहा था. दिल्ली का ओखला इलाका कई सारी इंडस्ट्री का गढ़ बन रहा था और इसके साथ ही वहां बोझ भी बढ़ रहा था.

नोएडा का सपना साल 1975-76 के दौर में आया. उस दौर में देश में इमर्जेंसी लगी हुई थी. गिरफ्तारियां हो रही थी और जेल भरे जा रहे थे. उसी दौर की बात है जब इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी विमान में बैठकर यूपी के तत्कालीन सीएम नारायण दत्त तिवारी के साथ लखनऊ से दिल्ली के बीच में यात्रा कर रहे थे. दिल्ली में आने से पहले संजय को दिल्ली में यमुना नदी के किनारे गांव और खेत का इलाका नजर आया.

संजय गांधी को इन खेतों में नए शहर का भविष्य नजर आ गया. दिल्ली की आवासीय इलाकों में लगी इंडस्ट्रियल यूनिट्स को यमुनापार के इन इलाकों में शिफ्ट करने का प्लान तैयार हुआ. उनका कहना था कि इससे दिल्ली पर बढ़ रहा बोझ कुछ हल्का होगा और साथ ही प्रदूषण की समस्या में भी कमी आएगी. सीएम एन.डी. तिवारी की पहचान उस समय न्यू डेल्ही तिवारी के तौर पर थी, जो सरकार के सारे आदेश मान लिया करते थे.

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आपातकाल के दौर में गांधी परिवार की हनक का आलम यह था कि ब्यूरोक्रेसी को फौरन आदेश दे दिया गया. फाइलें तैयार होने लगीं. यमुना नदी के पार यानी वर्तमान के नोएडा के खेतों में उद्योग कंपनियां और शहरी स्ट्रक्चर तैयार करने की कवायद तेज हो गई. 17 अप्रैल 1976 को एक ऑर्डिनेंस के रूप में यूपी सरकार की कैबिनेट ने यूपी इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट आर्डिनेंस-1976 को मंजूरी दे दी. आज 2026 में इसी ऑर्डिनेंस की 50वीं सालगिरह मनाई जा रही है.

उस समय यह हिस्सा गाजियाबाद और बुलंदशहर के हिस्सों को अधिग्रहित किया जाने लगा. शहर के गठन के लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून के अर्जेंसी क्लॉज को लागू कर दिया. हरौला, नयाबांस गांव की जमीनों के अधिग्रहण से शुरुआत हुई. इसके बाद निठारी, अट्टा, चौड़ा रघुनाथपुर की बारी आई. उस वक्त औने-पौने दाम पर और जबर्दस्ती जमीनें लेने के आरोप भी लगे. किसानों को 4 रुपये प्रति गज के हिसाब से रेट दिया गया. कई किसानों ने इन फैसलों का विरोध किया. जमीन देने और मुआवजा लेने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट तक इसकी लड़ाई भी लड़ी गई.

एक बार नींव पड़ जाने पर साल-दर-साल शहर का विस्तार बढ़ता रहा. होशियारपुर, सर्फाबाद, ममूरा, बरौला, गिझोड़, अगाहपुर, गढ़ी चौखंडी, सलारपुर, भंगेल, पर्थला खंजरपुर, हाजीपुर, शाहपुर गोवर्धनपुर तक के गांवों तक अधिग्रहण होता रहा. आज ये पुराने गांव मौजूद हैं लेकिन जमीनें और खेत शहर का रूप ले चुके हैं. फ्लाईओवर से लेकर एलिवेटेडे रोड और अंडरपास और एक्सप्रेसवे तक पर गाड़ियां फर्राटा भर रही हैं.

दिल्ली के ओखला के विस्तार के तौर पर बनाए गए शहर को नोएडा नाम दिया गया. यह अंग्रेजी के NOIDA का हिंदी तर्जुमा है, जिसका फुलफॉर्म न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एरिया है. साल 1976 से 1980 के बीच सबसे पहले सेक्टर 1 से 11 तक विकसित हुआ. साल 1997 में मायावती की सरकार ने आधिकारिक तौर पर गौतमबुद्धनगर जिले की स्थापना की, जिसमें नोएडा से लेकर दादरी, दनकौर, जेवर तक का हिस्सा शामिल है. 2001 में डीएनडी फ्लाइवे तैयार होने से दिल्ली की दूरी घट गई. 2009 में नोएडा में मेट्रो की एंट्री हुई.

आज नोएडा का विकास नोएडा एक्सटेंशन से लेकर ग्रेटर नोएडा तक फैल चुका है. जेवर में एयरपोर्ट तैयार हो चुका है. दादरी-नोएडा-गाजियाबाद इनवेस्टमेंट रीजन को तैयार किया जा रहा है. आज नोएडा आईटी और कॉर्पोरेट हब है. हाउसिंग और रियल एस्टेट के साथ ही लॉजिस्टिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, मैनुफैक्चरिंग इंडस्ट्री, डेटा सेंटर, इंडस्ट्रियल पार्क का गढ़ है. देश-दुनिया की कंपनियां यहां हैं. संगठित और असंगठित सेक्टर मिलाकर यहां लाखों की संख्या में लोग काम करते हैं. गौतमबुद्धनगर अकेले यूपी की जीडीपी में करीब 10 से 11 प्रतिशत का योगदान देता है और राज्य के राजस्व में इसकी हिस्सेदारी लगभग 25 फीसदी की है.

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