RR Code @ Airport: हवाई यात्रा के दौरान बोर्डिंग पास पर छपे ‘RR’ कोड को देखकर अक्सर यात्रियों के मन में कई सवाल कौंधने लगते हैं. सबसे पहला सवाल तो यही कि मेरे ही बोर्डिंग पास पर खासतौर पर यह ‘RR’ क्यों छपा हुआ है? क्या उनके ऊपर कोई खास निगारानी रखी जा रही है? तो इसका जवाब है- हां. आपके ऊपर एयरपोर्ट सुरक्षा एजेंसियों की खास निगरानी है. संभव है कि आपको एयरपोर्ट पर अतिरिक्त सुरक्षा जांच से भी गुजरना पड़े.
दिल्ली एयरपोर्ट के चीफ एयरोड्रम सिक्योरिटी ऑफिसर (CASO) रह चुके सीआईएसएफ के उपमहानिरीक्षक (सेवानिवृत्त) सुदीप सिन्हा के अनुसार, RR का पूरा मतलब रैंडम रेफरल (Random Referral) है. कई जगह पर रैंडम रिव्यू (Random Review) के तौर पर भी रेफर किया जाता है. यह एक इंटरनेशनल सिक्योरिटी प्रोटोकॉल का हिस्सा है, जिसे भारत के सभी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भी लागू किया गया है. इसका मुख्य मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसेंजर की सिक्योरिटी को बेहतर है.
डीआईजी (सेवानिवृत्त) सुदीप सिन्हा के अनुसार, इस कोड को देखकर घबराने की कोई जरूरत नहीं है. यह कोड सिर्फ इस बात का संकेत है कि आप उन कुछ पैसेंजर्स में एक हैं, जिनको एक अतिरिक्त जांच से गुजरना है. ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी (बीसीएएस) के नियमों के अनुसार, RR कोड एक रैंडम प्रॉसेस है और इसका चयन पूरी तरह कंप्यूटर एल्गोरिदम पर आधारित है. इसका यात्री के नाम, धर्म, राष्ट्रीयता या टिकट के क्लास से कोई लेना देना नहीं है.
फ्लाइट के करीब 2 प्रतिशत से भी कम पैसेंजर्स को ही ‘रैंडम रेफरल’ प्रॉसेस के तहत चुना जाता है. इसलिए अगर आपके बोर्डिंग पास पर ‘RR’ लिखा दिखे तो चिंता करने की जरूरत नहीं है. यह सिर्फ एक अतिरिक्त सुरक्षा जांच की प्रक्रिया है, न कि आप पर किसी तरह का शक है या फिर आपको अपराधी की निगाह से देखा जा रहा है – सुदीप सिन्हा, उपमहानिरीक्षक (सेवानिवृत्त), सीआईएसएफ
- क्या पैसेंजर की प्रोफाइलिंग के आधार पर मिलता है आरआर कोड?
भारत में एयरपोर्ट सिक्योरिटी किसी भी धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर प्रोफाइलिंग नहीं करती. बीसीएएस के नियमों के अनुसार, आरआर कोड पूरी तरह निष्पक्षता के आधार पर दिया जाता है. कुछ देशों में जहां खास लोगों की ज्यादा जांच होती है, वहां से अलग भारत में सभी पैसेंजर्स को बराबर माना जाता है. यहां तक कि वीआईपी, सरकारी अधिकारी या मशहूर लोग भी अगर आरआर में चुने जाते हैं, तो उन्हें भी जांच से गुजरना पड़ता है. यही सिस्टम की सबसे बड़ी मजबूती है. - क्या सच में आरआर कोड के पीछे का एल्गोरिदम है?
अक्सर लोग सोचते हैं कि यह चयन किसी वॉच लिस्ट या पुराने रिकॉर्ड के आधार पर होता है, लेकिन ऐसा नहीं है. इसे समझने के लिए स्कूल की रैंडम सीटिंग का उदाहरण लिया जा सकता है. एयरलाइन या एयरपोर्ट सिस्टम में एक एल्गोरिदम होता है, जो बिना इंसानी दखल के पैसेंजर्स को चुनता है. इसमें सीट नंबर, टिकट बुक करने का समय या किराया जैसी चीजें मायने नहीं रखतीं. इसका असली मकसद पूरी तरह से अनिश्चितता बनाए रखना है, ताकि कोई भी इसका फायदा न उठा सके. - क्या है आरआर कोड को लागू करने का मकसद?
बोर्डिंग पास पर आरआर कोड का इस्तेमाल कई सालों से एवएिशन सिक्योरिटी के लिए पूरी दुनिया कर रही है. भारत में इसे ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी (BCAS) के नियमों के अनुसार लागू किया गया है. जब किसी पैसेंजर को यह कोड मिलता है, तो इसका मतलब होता है कि कंप्यूटर सिस्टम ने उसे अतिरिक्त सिक्योरिटी जांच के लिए रैंडम तरीके से चुना है. यह किसी पैसेंजर को टारगेट करने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि एक तय प्रॉसेस के तहत होता है. इसका मकसद एयरपोर्ट की सिक्योरिटी को सुनिश्चित करते हुए गलत इरादों को नाकाम करना है. - क्या यह केवल इंटरनेशनल फ्लाइट्स तक सीमित है?
सामान्यतौर पर RR कोड सिर्फ इंटरनेशनल पैसेंजर्स को ही मिलता है, लेकिन यह पूरा सही नहीं है. ज्यादातर इंटरनेशनल फ्लाइट्स से हवाई सफर रहे पैसेंजर्स के बोर्डिंग पास पर आरआर कोड देखा जाता है, लेकिन कई बार यह डोमेस्टिक पैसेंजर्स को भी इस प्रॉसीजर के लिए चुना जाता है. चूंकि इस कोड को पूरी तरह से कस्टम्स डील करती है, लिहाजा हाई सिक्योरिटी अलर्ट के समय और संवेदनशील रूट्स पर कस्टम रैंडम जांच करती है. लिहाजा, चाहे आप दिल्ली से मुंबई जा रहे हों या दिल्ली से लंदन, दोनों ही मामलों में आपको आरआर कोड मिल सकता है. - फॉरेन करेंसी और प्रतिबंधित सामान से क्या है रिश्ता?
राज्यसभा में 2015 में दिए गए एक जवाब में बताया गया था कि आरआर कोड का मुख्य उद्देश्य अवैध सामान और पैसे की तस्करी को रोकना है. भारतीय रिजर्व बैंक की तय सीमा से ज्यादा विदेशी या बिना घोषित भारतीय मुद्रा ले जाने वाले पैसेंजर्स पर नजर रखने के लिए यह प्रक्रिया अपनाई जाती है. इसके अलावा, प्रतिबंधित वन्यजीव उत्पाद, नकली दस्तावेज और अवैध हथियारों की तस्करी रोकने में भी यह मददगार साबित होता है. जब सिस्टम किसी को भी रैंडम तरीके से चुनता है, ऐसे में तस्करों के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि वे पकड़े जाएंगे या नहीं. - कैसे अलग है इस कोड वाले पैसेंजर्स की जांच प्रक्रिया?
अगर आपके बोर्डिंग पास पर आरआर कोड है, तो सामान्य जांच के बाद भी आपको कुछ अतिरिक्त जांच से गुजरना होगा. सबसे पहले, हैंड बैगेज की फिर से स्कैनिंग होती है, जो ज्यादा एडवांस मशीनों या मैन्युअल तरीके से की जाती है. इसके बाद, पैसेंजर की दोबारा तलाशी ली जाती है, जिसमें शरीर के उन हिस्सों पर खास ध्यान दिया जाता है जहां कुछ छिपाया जा सकता है. तीसरे चरण में, चेक-इन बैग को खोलकर भी देखा जा सकता है. कई बार डॉग स्क्वाड की मदद भी ली जाती है. कस्टम अधिकारी आपके पास मौजूद सभी ट्रैवल डॉक्युमेंट्स की एक बार फिर जांच करते हैं. - डॉक्यूमेंट की जांच के साथ पूछे जा सकते हैं ये सवाल
आरआर कोड होने पर सिक्योरिटी अधिकारी आपसे आपकी यात्रा से जुड़े सवाल पूछ सकते हैं, जैसे आप कहां जा रहे हैं, क्यों जा रहे हैं, कहां रुकेंगे और क्या काम करते हैं. ज्यादातर यह प्रॉसेस जानकारी को वैरिफाई करने के लिए होता है. पासपोर्ट, वीजा, रिटर्न टिकट, होटल बुकिंग और ऑफिस से जुड़े डाक्यूमेंट ध्यान से देखे जाते हैं. अगर आप नौकरी के लिए जा रहे हैं, तो कंपनी का आईडी या इनविटेशन लेटर भी मांगा जा सकता है. इसका मकसद आपको परेशान करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सब कुछ सही है. - अगर आप आरआर सिलेक्ट हो जाएं तो क्या न करें?
अगर आपके बोर्डिंग पास पर आरआर कोड है, तो घबराकर कोई गलत कदम न उठाएं. कई बार पैसेंजर्स ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिसका खामियाजा उनको बेवजह भुगतना पड़ता है. यदि आप के बोर्डिंग पास पर आरआर का कोड आ जाए तो आप कभी भी इसे छुपाने की कोशिश ना करें. इस कोड को लेकर काउंटर पर किसी तरह की बहस भी ना करें. बैग में रखे सामान को बदलने की कोशिश भी आपको भारी पड़ सकती है.
क्या आरआर कोड मिलने का मतलब है कि एयरपोर्ट सिक्योरिटी एजेंसियां आप पर शक कर रही हैं?
बिल्कुल नहीं. आरआर कोड मिलने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आप किसी अपराध, आतंक से जुड़े मामले या निगरानी सूची में हैं. यह पूरी तरह एक मशीन आधारित और रैंडम प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति की सोच शामिल नहीं होती. यह सिर्फ एक संयोग है, जिससे डरने की जरूरत नहीं है बल्कि इसे सिक्योरिटी में सहयोग के रूप में देखा जाना चाहिए.
आरआर जांच में आमतौर पर कितना अतिरिक्त समय लगता है?
आमतौर पर आरआर जांच में 10 से 20 मिनट का अतिरिक्त समय लग सकता है, लेकिन यह कई बातों पर निर्भर करता है. अगर एयरपोर्ट पर ज्यादा भीड़ है, सिक्योरिटी स्टाफ कम है, या आपके सामान में कोई ऐसी चीज है जिसे समझने में समय लग रहा है, तो यह समय बढ़कर 30 मिनट से 1 घंटे तक हो सकता है. अगर जांच के दौरान कुछ संदिग्ध पाया जाता है, तो सीआईएसएफ या कस्टम अधिकारी आपसे पूछताछ भी कर सकते हैं, जिससे और समय लग सकता है.
क्या पैसेंजर अपनी मर्जी से आरआर जांच से बच सकते हैं?
कोई भी पैसेंजर चाह कर भी इस आरआर की जांच से नहीं बच सकता है. चूंकि आरआर जांच के बाद आपके बोर्डिंग पास पर एक स्टैंप लगाई जाती है और जब तक यह स्टैंप आपके बोर्डिंग पास पर नहीं हो, तब तक आपको प्लेन में बोर्ड करने की इजाजत नहीं मिलेगी. और हां, यदि आप इस जांच का विरोध करते हैं या किसी तरह की नाराजगी दिखाते हैं तो आपके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है.
अगर पैसेंजर के साथ बुजुर्ग या बच्चा है तो क्या कोई राहत मिल सकती है?
नियमों के अनुसार उम्र के आधार पर आरआर जांच में कोई छूट नहीं मिलती. अगर परिवार का कोई एक सदस्य चुना जाता है, तो उसके साथ यात्रा कर रहे बाकी लोगों की भी जांच हो सकती है, क्योंकि कई बार गलत काम परिवार के साथ मिलकर किए जाते हैं. हालांकि, व्यवहारिक तौर पर एयरपोर्ट स्टाफ बुजुर्ग, दिव्यांग या छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वाले लोगों के साथ नरमी से पेश आते हैं. लेकिन जांच तो सभी की होती है.
क्या आरआर और ‘SSSS’ कोड में कोई अंतर है?
हां, दोनों में फर्क होता है. आरआर का मकसद तस्करी की कोशिशों को रोकना है, जबकि ‘SSSS’ पूरी तरह से सुरक्षा जांच से संबंधित है. ज्यादातर देशों में SSSS अमेरिका की टीएसए द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप किया जाता है. ‘SSSS’ जांच ज्यादा सख्त और विस्तार से होती है, जिसमें बैग खोलकर जांच, केमिकल टेस्ट, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की गहराई से जांच और पूरे शरीर की स्कैनिंग शामिल होती है. इसके अलावा, ‘SSSS’ कई बार पैसेंजर के प्रोफाइल जैसे वॉचलिस्ट, एकतरफा टिकट या पेमेंट मोड पर भी निर्भर करता है.
