दिल्ली. आज के दौर में सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे, किशोर, युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग रोजाना 4 से 6 घंटे तक स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर समय बिता रहे हैं, जिससे दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है.
कंसंट्रेशन और मेमोरी पर असर
डॉक्टर संजीव के अनुसार, ज्यादा स्क्रीन टाइम से ब्रेन का कंसंट्रेशन, मेमोरी और कॉग्निटिव फंक्शन 30-40% तक कम हो सकता है. इसके साथ ही हैप्पीनेस कोटिएंट में भी गिरावट देखी जा रही है. लगातार सोशल मीडिया के संपर्क में रहने से तनाव, चिंता, पैनिक अटैक और डिप्रेशन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.
लाइक्स और फॉलोअर्स का दबाव
आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स, फॉलोअर्स और शेयर को अपनी पहचान मानने लगी है. यह तुलना का माहौल बना रहा है, जहां लोग दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर खुद को कमतर समझने लगते हैं. डॉक्टर का मानना है कि यह एक अवास्तविक दुनिया है, जो मानसिक दबाव को बढ़ाती है.
नींद, खानपान और लाइफस्टाइल पर बुरा असर
सोशल मीडिया के ज्यादा इस्तेमाल से नींद के पैटर्न बिगड़ रहे हैं. इसके साथ ही जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की आदत बढ़ रही है, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं. कम शारीरिक गतिविधि और ज्यादा स्क्रीन टाइम इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं.
बचपन में ही शुरू हो रही लत
आजकल छोटे बच्चों को भी बहुत कम उम्र में स्मार्टफोन दे दिया जाता है. 1-2 साल के बच्चे भी मोबाइल पर निर्भर होते जा रहे हैं, जिससे उनका व्यवहार और मूड प्रभावित हो रहा है. विशेषज्ञ इसे बेहद खतरनाक ट्रेंड मानते हैं. ऐसे में डॉक्टर संजीव के अनुसार, सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रहना जरूरी नहीं, बल्कि संतुलित उपयोग जरूरी है. अगर सोशल मीडिया का इस्तेमाल 30 मिनट से कम किया जाए, तो इसके नकारात्मक प्रभाव कम हो सकते हैं.
मानसिक सेहत के लिए जरूरी टिप्स
समय पर और पर्याप्त नींद लें.
रोजाना एक्सरसाइज करें.
जंक और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएं.
सकारात्मक सोच और वैल्यू सिस्टम अपनाएं.
स्क्रीन टाइम को सीमित करें.
नंबर नहीं, जिंदगी जरूरी है
डॉक्टर ने यह भी कहा कि आज का एजुकेशन सिस्टम बच्चों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाल रहा है. स्कूल, कोचिंग और एग्जाम के बोझ में बच्चे रोबोट बनते जा रहे हैं. ऐसे में माता-पिता और समाज को यह समझना होगा कि सिर्फ नंबर और कॉलेज ही जिंदगी का अंतिम लक्ष्य नहीं हैं.
