अखरोट के छिलकों से मिनटों में साफ होगा जहरीला पानी! DU की छात्रा श्रीजा का अनोखा बायोचार इनोवेशन, जानें कैसे?

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Walnut Shell Biochar Water Purification Tips: गार्गी कॉलेज की छात्रा श्रीजा श्रीवास्तव ने अखरोट और फलों के छिलकों से बायोचार बनाकर जल शोधन का सस्ता और टिकाऊ तरीका खोजा है. यह बायोचार पानी से हानिकारक औद्योगिक डाई को सोख लेता है. जिससे कचरा प्रबंधन और जल प्रदूषण दोनों का एक साथ समाधान होता है.

दिल्ली: बढ़ते जल प्रदूषण और कचरे की समस्या के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज की छात्रा श्रीजा श्रीवास्तव ने ऐसा समाधान पेश किया है, जो दोनों चुनौतियों का एक साथ जवाब देता है. रोजमर्रा में फेंक दिए जाने वाले फल और अखरोट के छिलकों को उपयोग में लाकर गंदे पानी को साफ करने की तकनीक विकसित की गई है. यह इनोवेशन न केवल सस्ता है बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है.

क्या है बायोचार और कैसे बनता है?
इस तकनीक का आधार बायोचार है एक कार्बनयुक्त पदार्थ जो प्रदूषकों को सोखने की क्षमता रखता है. इसे तैयार करने के लिए सबसे पहले छिलकों को सुखाया जाता है. इसके बाद उन्हें कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में गर्म किया जाता है. जिससे वे जलते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बायोचार में बदल जाते हैं. आगे एक्टिवेशन प्रक्रिया के जरिए इसकी सतह पर सूक्ष्म छिद्र बनाए जाते हैं, जो पानी में मौजूद गंदगी को पकड़ने में मदद करते हैं.

प्रयोग में दिखा असर
श्रीजा श्रीवास्तव के प्रयोग में यह पाया गया कि बायोचार गंदे पानी में मौजूद हानिकारक रंगों और रसायनों को तेजी से सोख लेता है. खासतौर पर टेक्सटाइल और मेडिकल इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले डाई जैसे मेथिलीन ब्लू और मिथाइल ऑरेंज को हटाने में यह प्रभावी साबित हुआ. सीमित मात्रा में बायोचार डालने पर कम समय में पानी साफ होने लगा, जो इसकी कार्यक्षमता को दर्शाता है.

कम लागत, ज्यादा उपयोगिता
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और कम लागत है. इसमें महंगे उपकरणों या जटिल प्रक्रियाओं की जरूरत नहीं होती. यही वजह है कि इसे छोटे स्तर पर भी आसानी से अपनाया जा सकता है. गांवों, कस्बों और छोटे उद्योगों में जहां बड़े वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना संभव नहीं, वहां यह तरीका बेहद कारगर हो सकता है.

पर्यावरण को दोहरा फायदा
यह नवाचार सिर्फ पानी को साफ नहीं करता बल्कि कचरे को भी उपयोग में लाकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान देता है. इससे कचरे की मात्रा कम होती है और जल प्रदूषण भी घटता है. यानी एक ही प्रक्रिया से दो बड़ी समस्याओं का समाधान संभव हो पाता है.

भविष्य की संभावनाएं
श्रीजा श्रीवास्तव अपने इस प्रोजेक्ट को आगे और विकसित करने की दिशा में काम कर रही हैं. अगर इस तकनीक पर और रिसर्च कर बड़े स्तर पर लागू किया जाए, तो यह जल प्रदूषण के खिलाफ एक मजबूत हथियार बन सकती है. खासकर औद्योगिक क्षेत्रों में, जहां गंदा पानी सीधे जल स्रोतों में छोड़ा जाता है, वहां इसका इस्तेमाल बड़े बदलाव ला सकता है.

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Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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