नई दिल्ली. भारत में आज भी मासिक धर्म यानी पीरियड्स पर खुलकर बात करना आसान नहीं माना जाता. बड़े शहरों में भी कई लड़कियां और महिलाएं इस विषय पर झिझक महसूस करती हैं. लेकिन अब दिल्ली सरकार इस सोच को बदलने की कोशिश कर रही है. सरकार मासिक धर्म को सिर्फ महिलाओं का निजी मुद्दा नहीं, बल्कि ‘पब्लिक हेल्थ’ यानी सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा विषय मानकर काम कर रही है. मासिक धर्म स्वच्छता दिवस (28 मई) पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने साफ कहा कि अब पीरियड्स पर चुप्पी खत्म होनी चाहिए. उनके मुताबिक, महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को बेहतर बनाने के लिए मासिक धर्म स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना जरूरी है.
सिर्फ सैनिटरी पैड नहीं, पूरी व्यवस्था बदलने की कोशिश
अब तक ज्यादातर सरकारी योजनाएँ सैनिटरी पैड बांटने तक सीमित रहती थीं. लेकिन दिल्ली सरकार इस विषय को बड़े स्तर पर देखने की तैयारी कर रही है. सरकार स्कूलों और सार्वजनिक जगहों पर साफ और सुरक्षित शौचालयों की व्यवस्था सुधारने पर जोर दे रही है. इसके साथ ही सरकारी स्कूलों में सैनिटरी उत्पादों की नियमित उपलब्धता, वेंडिंग मशीनों की देखरेख और खराब सुविधाओं की मरम्मत पर भी काम किया जा रहा है. दिल्ली सरकार शिक्षा विभाग के जरिए कक्षा 6 से 9 तक मासिक धर्म शिक्षा को और मजबूत बनाने की योजना पर काम कर रही है, ताकि किशोर लड़कियां ही नहीं बल्कि लड़के भी इस विषय को सही तरीके से समझ सकें.
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य का सीधा असर लड़कियों की पढ़ाई और महिलाओं के रोजगार पर पड़ता है. दसरा फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल करीब 2.3 करोड़ लड़कियाँ सही मासिक धर्म सुविधाओं की कमी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं। कई स्कूलों में साफ शौचालय नहीं होते, पानी की व्यवस्था कमजोर होती है या लड़कियां शर्म और डर की वजह से स्कूल आना बंद कर देती हैं. यही वजह है कि भारत में प्राथमिक स्तर पर दाखिला तो बढ़ा है, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है.
महिलाओं की नौकरी में भागीदारी भी बड़ी चिंता
भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर अभी भी काफी कम है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक 15 साल से ऊपर की महिलाओं की श्रम भागीदारी दर करीब 35.3% रही. दिलचस्प बात यह है कि भारत में शहरी महिलाओं की नौकरी में भागीदारी ग्रामीण महिलाओं से भी कम है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षित सार्वजनिक सुविधाओं की कमी, सामाजिक झिझक और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे इसके पीछे बड़ी वजह हैं. दिल्ली सरकार अब इस मुद्दे को ‘महिला कल्याण’ के बजाय ‘शहरी विकास’ और ‘पब्लिक हेल्थ’ से जोड़कर देख रही है. सरकार का मानना है कि अगर महिलाओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक सुविधाएँ बेहतर होंगी, तो शिक्षा और रोजगार दोनों में उनकी भागीदारी बढ़ेगी.
लड़कों को जागरूक बनाने पर भी फोकस
इस पूरी पहल की सबसे अहम बात यह है कि दिल्ली सरकार सिर्फ लड़कियों पर नहीं, बल्कि लड़कों को भी जागरूक बनाने पर जोर दे रही है. आज भी देश में बड़ी संख्या में लड़के पीरियड्स को लेकर सही जानकारी के बिना बड़े होते हैं. कई लोग शादी के बाद ही इस विषय को ठीक से समझ पाते हैं. ऐसे में स्कूल स्तर पर ही लड़कों और लड़कियों दोनों को सही जानकारी देने की तैयारी की जा रही है. सरकार और शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक लड़कों की सोच नहीं बदलेगी, तब तक पीरियड्स से जुड़ी झिझक और सामाजिक टैबू पूरी तरह खत्म नहीं होंगे.
दूसरे राज्यों के मॉडल से भी सीख
दिल्ली सरकार की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब देश के कई राज्य पहले से मासिक धर्म स्वास्थ्य पर काम कर रहे हैं. केरल की ‘शी पैड योजना’ ने स्कूलों में बेहतर सुविधाएं देने पर फोकस किया था. आंध्र प्रदेश ने स्वयं सहायता समूहों के जरिए ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए. वहीं उत्तर प्रदेश की ‘मिशन शक्ति’ योजना ने महिलाओं में जागरूकता और आत्मविश्वास बढ़ाने पर काम किया. अब दिल्ली सरकार इन प्रयासों को शहरी सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल के साथ जोड़कर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है.
क्या बदल सकती है यह पहल?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मासिक धर्म स्वास्थ्य को पानी, सड़क और सफाई की तरह जरूरी सार्वजनिक सुविधा माना जाए, तो इसका असर सिर्फ महिलाओं के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहेगा. इससे लड़कियों की पढ़ाई जारी रखने में मदद मिलेगी, महिलाओं की नौकरी में भागीदारी बढ़ेगी और समाज में इस विषय को लेकर सामान्य बातचीत भी आसान होगी. दिल्ली सरकार की यह पहल आने वाले समय में दूसरे राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकती है. क्योंकि सवाल सिर्फ पीरियड्स का नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा, शिक्षा और बराबरी का है.
