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Shalimar Bagh Bulldozer Action: सालों की यादें और खून-पसीने से खड़े किए गए आशियाने मलबे के ढेर में तब्दील किए जा रहे हैं. दिल्ली के शालीमार बाग में जब प्रशासन का बेरहम बुलडोजर गरजा तो कई बेबस परिवारों के आशियाने जमींदोज हो गए. सुप्रीम कोर्ट के आदेश और कानून के सख्त डंडे के आगे बेबसी के आंसू रोते बिलखते बुजुर्गों और महिलाओं की चीखें हवा में गूंजती रहीं. विकास की चौड़ी सड़क के लिए कानून ने तो अवैध निर्माण वाली जमीन वापस ले ली, लेकिन कई मासूम जिंदगियों के सिर से उनकी छत और सुनहरे सपने हमेशा के लिए छिन गए.
आठ एकड़ जमीन पर अतिक्रमण: सीएम रेखा गुप्ता के विधानसभा क्षेत्र शालीमार बाग इलाके में सेंट्रल जिला प्रशासन द्वारा करीब आठ एकड़ सरकारी जमीन को पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए यह व्यापक अभियान चलाया गया है. जिला मजिस्ट्रेट (DM) शैलेंद्र सिंह परिहार के नेतृत्व में कई बुलडोजर और अर्थमूवर मशीनों को एक साथ काम पर लगाया गया. नोटिस की अवधि समाप्त होते ही इस पूरी कार्रवाई को शुरू कर दिया गया. (PTI)
सड़क परियोजना के लिए खाली कराई गई जमीन: इस पूरी डिमोलिशन ड्राइव का मुख्य उद्देश्य मास्टर प्लान के तहत प्रस्तावित 30 मीटर चौड़ी सड़क कॉरिडोर के निर्माण के लिए रास्ता साफ करना है. वर्तमान में एक खास हिस्से पर सड़क बेहद संकरी होने के कारण पूरे इलाके में भीषण ट्रैफिक जाम लगता था. इसके अलावा मानसून के समय यहां जलभराव की गंभीर समस्या पैदा हो जाती थी.
120 से अधिक ढांचे जद में: प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किए गए मैपिंग और जमीनी सर्वे के बाद यह पाया गया कि मधुमिलन चौराहे से लेकर छावनी तक करीब 120 से अधिक अवैध निर्माण सीधे तौर पर सड़क चौड़ीकरण के रास्ते में बाधा बन रहे थे. इन सभी चिन्हित ढांचों को गिराने के लिए बकायदा पहले कानूनी नोटिस और चेतावनी जारी की गई थी.
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साल 1980 में ही मिल चुका मुआवजा: जिला मजिस्ट्रेट शैलेंद्र सिंह ने साफ किया कि इस विवादित भूमि का अधिग्रहण प्रशासन द्वारा साल 1980 में ही कर लिया गया था. उस समय के जो मूल भूस्वामी थे, उन्हें नियमों के तहत उचित मुआवजा भी दिया जा चुका था. इसके बाद भी जमीन पर अवैध कब्जा करके मकान और व्यावसायिक ढांचे खड़े कर लिए गए थे.
किसी भी कब्जाधारी के पास नहीं मिले दस्तावेज: नोटिस मिलने के बाद करीब 157 निवासियों ने राहत के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अदालत के निर्देश पर प्रशासन ने सभी कब्जाधारियों की व्यक्तिगत रूप से विस्तृत सुनवाई की. इस कानूनी प्रक्रिया के दौरान एक भी निवासी सरकारी भू-राजस्व दस्तावेजों में खुद को वैध मालिक साबित करने वाला कोई प्रमाण पत्र नहीं दिखा सका.
सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली कानूनी राहत: दिल्ली हाई कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कब्जाधारियों को 30 मई तक स्वेच्छा से जगह खाली करने का अंतिम आदेश दिया था. इसके बाद जब पीड़ित पक्ष देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली. दोनों अदालतों के आदेश के बाद ही प्रशासन ने कब्जे की कार्रवाई शुरू की.
पैरामिलिट्री फोर्स का कड़ा सुरक्षा पहरा: कार्रवाई के दौरान किसी भी प्रकार के विरोध प्रदर्शन या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति से निपटने के लिए इलाके में भारी पुलिस बल और पैरामिलिट्री फोर्स तैनात की गई थी. डीसीपी और एसीपी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी खुद मौके पर मौजूद रहकर स्थिति की निगरानी कर रहे थे. सुरक्षा के लिहाज से प्रभावित जोन की सभी सड़कों को सील कर दिया गया था.
