रेखा गुप्‍ता सरकार का क‍िसानों को बंपर ऑफर, लेकिन द‍िल्‍ली में खेती की जमीन है कितनी?

दिल्ली की रेखा गुप्‍ता सरकार ने फसल नुकसान झेलने वाले किसानों को बड़ा ऑफर द‍िया है. फसल नुकसान होने पर अब क‍िसानों को 75,000 रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजा मिलेगा. सरकार कह रही क‍ि इससे करीब 10,000 किसानों को फायदा होगा. लेकिन असल सवाल क‍ि द‍िल्ली में आखिर खेती की जमीन है कितनी?

दिल्ली को आमतौर पर संसद, मंत्रालयों, मेट्रो नेटवर्क और ऊंची इमारतों वाले महानगर के रूप में देखा जाता है, लेकिन राजधानी का एक चेहरा गांवों और खेतों का भी है. जहां किसान रहते हैं, खेती करते हैं. सब्‍ज‍ियां और फसल उगाते हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में कृषि भूमि लगातार घट रही है और खेती का दायरा पहले की तुलना में काफी छोटा हो चुका है.

दिल्ली का कुल क्षेत्रफल कितना है?

द‍िल्‍ली प्‍लानिंग की र‍िपोर्ट के मुताबिक- दिल्ली का कुल क्षेत्रफल 1,47,483 हेक्टेयर यानी करीब 1,483 वर्ग किलोमीटर है. इसमें शहरी, ग्रामीण, वन, जल निकाय, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र शामिल हैं. दिल्ली सरकार के आर्थिक सर्वे और भूमि उपयोग संबंधी दस्तावेज बताते हैं कि राजधानी का बड़ा हिस्सा अब शहरी उपयोग में आ चुका है.

कृषि योग्य भूमि कितनी है?

  1. कृषि विभाग और भूमि उपयोग संबंधी उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में लगभग 52,000 हेक्टेयर भूमि ऐसी है जिसे कृषि योग्य या कल्टिवेबल लैंड माना जाता है. यह दिल्ली के कुल क्षेत्रफल का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा है.
  2. कृषि योग्य भूमि का मतलब सिर्फ वह जमीन नहीं है जिस पर इस समय खेती हो रही हो. इसमें वह भूमि भी शामिल होती है जिस पर भविष्य में खेती की जा सकती है या जो खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है. यानी यह संभावित कृषि क्षेत्र का आंकड़ा है.

वास्तव में खेती कितनी जमीन पर हो रही है?

दिल्ली सरकार के विकास विभाग की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान समय में लगभग 26,000 हेक्टेयर भूमि पर ही वास्तविक कृषि गतिविधियां हो रही हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो कृषि योग्य मानी जाने वाली कुल जमीन का लगभग आधा हिस्सा ही खेती के उपयोग में है.बाकी जमीन या तो परती है, या उस पर अन्य गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं, या फिर विभिन्न कारणों से खेती नहीं हो रही.

20 साल में कितना घटा खेती का रकबा?

दिल्ली की कृषि भूमि में गिरावट का अंदाजा ग्रॉस क्रॉप्ड एरिया के आंकड़ों से लगाया जा सकता है. वर्ष 2000-01 में दिल्ली का कुल फसल क्षेत्र 52,817 हेक्टेयर था. यह वह क्षेत्र है जहां साल भर में एक या एक से अधिक फसलें उगाई गईं. वर्ष 2019-20 तक यह आंकड़ा घटकर 34,750 हेक्टेयर रह गया. यानी लगभग 18,000 हेक्टेयर फसल क्षेत्र दो दशकों के भीतर कम हो गया. प्रतिशत के हिसाब से देखें तो दिल्ली का फसल क्षेत्र करीब 34 प्रतिशत तक सिमट चुका है.

खेती की जमीन आखिर गई कहां?

विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे सबसे बड़ा कारण शहरीकरण है. पिछले 25 वर्षों में दिल्ली में नई आवासीय कॉलोनियां, औद्योगिक क्षेत्र, मेट्रो परियोजनाएं, एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं तेजी से विकसित हुई हैं. इसके लिए बड़ी मात्रा में भूमि की जरूरत पड़ी.

इसके अलावा दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में जमीन की कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई. कई स्थानों पर खेती से होने वाली आय की तुलना में जमीन बेचने से मिलने वाली रकम कहीं अधिक थी. इसका असर कृषि भूमि पर पड़ा. भूमि उपयोग विशेषज्ञ मानते हैं कि दिल्ली की कई कृषि भूमि धीरे-धीरे रियल एस्टेट और गैर-कृषि उपयोग में परिवर्तित होती चली गई.

दिल्ली में खेती कहां-कहां होती है?

  • उत्तर-पश्चिम दिल्ली का नरेला क्षेत्र, बवाना, अलीपुर, कंझावला, कराला और आसपास के गांव खेती के लिए जाने जाते हैं.
  • पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के नजफगढ़, झटीकरा, घुम्मनहेड़ा और आसपास के इलाकों में भी बड़े पैमाने पर खेती होती है.
  • यमुना खादर क्षेत्र में सब्जियों और बागवानी की खेती विशेष रूप से की जाती है. यहां उगाई जाने वाली सब्जियां सीधे दिल्ली की मंडियों तक पहुंचती हैं.

दिल्ली के किसान क्या उगाते हैं?

दिल्ली में मुख्य रूप से गेहूं, धान, बाजरा, ज्वार और सरसों की खेती की जाती है. इसके अलावा पालक, मूली, फूलगोभी, टमाटर, भिंडी और अन्य मौसमी सब्जियों का उत्पादन भी बड़ी मात्रा में होता है. यमुना के किनारे स्थित खादर क्षेत्र सब्जी उत्पादन के लिए खास तौर पर प्रसिद्ध है. हालांकि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेती का पैटर्न भी बदल रहा है. कम जमीन और अधिक मुनाफे की जरूरत के कारण किसान पारंपरिक फसलों से हटकर सब्जी और बागवानी की ओर बढ़ रहे हैं.

कितने किसान हैं दिल्ली में?

दिल्ली सरकार के अनुमान के मुताबिक राजधानी में करीब 10,000 किसान सीधे तौर पर खेती से जुड़े हुए हैं. यही वह वर्ग है जिसे फसल नुकसान पर बढ़ाए गए मुआवजे का सीधा लाभ मिलने की संभावना है. प्राकृतिक आपदाएं, असमय बारिश, ओलावृष्टि और बाढ़ जैसी घटनाएं किसानों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं. ऐसे में मुआवजा राशि बढ़ाने को राहत देने वाला कदम माना जा रहा है.

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