Last Updated:
सरदार तेजा सिंह समुंदरी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष भी पंथ और समाज की सेवा में समर्पित किए. 17 जुलाई 1926 को लाहौर जेल में उन्होंने शहादत प्राप्त की. सरदार तेजा सिंह समुंदरी को अकाली आंदोलन के सबसे सम्मानित नेताओं में से एक और 20वीं सदी के प्रारंभिक गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रमुख वास्तुकारों में गिना जाता है.
दिल्ली के एलजी टी.एस. संधू ने अपने दादा सरदार तेजा सिंह समुंदरी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी.
नई दिल्ली: दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार टी.एस. संधू ने शुक्रवार को अपने दादा और प्रख्यात सिख नेता सरदार तेजा सिंह समुंदरी की 100वीं शहादत वर्षगांठ के अवसर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. इस अवसर पर नई दिल्ली स्थित गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब के भाई लखी शाह वंजारा हॉल में एक विशेष स्मृति समारोह का आयोजन किया गया.
कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण कौर, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, दिल्ली मंत्रिमंडल के सदस्य, सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट के न्यायाधीशों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे. सभी गणमान्य व्यक्तियों ने सरदार तेजा सिंह समुंदरी के जीवन और उनके योगदान को श्रद्धापूर्वक याद किया.
कार्यक्रम की शुरुआत पद्मश्री सम्मानित रागी भाई हरजिंदर सिंह (श्रीनगर वाले) द्वारा शबद कीर्तन से हुई, जिसने समारोह को आध्यात्मिक वातावरण प्रदान किया. इसके बाद सिख परंपरा के अनुसार गुरु का लंगर आयोजित किया गया.
गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रमुख नेता थे समुंदरी
सरदार तेजा सिंह समुंदरी को अकाली आंदोलन के सबसे सम्मानित नेताओं में से एक और 20वीं सदी के प्रारंभिक गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के प्रमुख वास्तुकारों में गिना जाता है. उन्होंने ऐतिहासिक सिख गुरुद्वारों को कुप्रबंधन से मुक्त कर समुदाय के नियंत्रण में लाने के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया.
गुरु का बाग मोर्चा सहित कई आंदोलनों में निभाई अहम भूमिका
गुरु का बाग मोर्चा में उनके नेतृत्व को अकाली आंदोलन की शांतिपूर्ण प्रतिरोध और बलिदान की विचारधारा को स्थापित करने में निर्णायक माना जाता है. इसके अलावा उन्होंने रकाबगंज, जैतो, नाभा और चाबियां मोर्चों में भी सिख और हिंदू पंजाबी समुदाय को संगठित कर अहिंसक आंदोलनों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
सामाजिक सुधार और शिक्षा के लिए भी किया कार्य
सरदार तेजा सिंह समुंदरी ने केवल धार्मिक सुधार तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि पंजाब में सामाजिक बदलाव के लिए भी उल्लेखनीय प्रयास किए. उन्होंने अमृतसर और तरनतारन के गांवों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और दलितों को सार्वजनिक कुओं से पानी लेने तथा सामाजिक बराबरी का अधिकार दिलाने का प्रयास किया. शिक्षा को सशक्तिकरण का माध्यम मानते हुए उन्होंने वर्ष 1917 में सरहाली और लायलपुर में विद्यालयों की स्थापना कर युवाओं में शिक्षा को बढ़ावा दिया.
स्वतंत्रता आंदोलन में भी रहा महत्वपूर्ण योगदान
उनका प्रभाव समुदाय की सीमाओं से परे था. बताया जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी उन्हें अपनी कार्य समिति में शामिल करने की इच्छा जताई थी. धार्मिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलन के बीच सेतु बनाने की उनकी क्षमता को व्यापक सम्मान मिला. वर्ष 1924 में हिंदुस्तान टाइम्स की स्थापना के प्रयासों से भी उनका जुड़ाव रहा.
17 जुलाई 1926 को लाहौर जेल में हुई शहादत
सरदार तेजा सिंह समुंदरी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष भी पंथ और समाज की सेवा में समर्पित किए. 17 जुलाई 1926 को लाहौर जेल में उन्होंने शहादत प्राप्त की. इस अवसर पर उपराज्यपाल टी.एस. संधू ने कहा कि सरदार तेजा सिंह समुंदरी का जीवन निस्वार्थ सेवा, नैतिक साहस और सिद्धांतों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि उनकी विरासत आज भी समाज और संस्थाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है.
About the Author
राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें
