नई दिल्ली: महज 18 साल की उम्र में जब परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था, तब कर्नाटक की पार्वती बाई ने सिलाई मशीन को अपना सहारा बना लिया. उसी दिन उन्होंने एक अनोखा संकल्प लिया कि जब भी सिलाई या कढ़ाई करेंगी तो दुल्हन का जोड़ा पहनकर ही करेंगी. चार दशक बीत गए, लेकिन उनका यह संकल्प आज भी अटूट है. चाहे कोई प्रदर्शनी हो, हस्तशिल्प मेला हो या कोई बड़ा आयोजन हो, वह हर जगह शादी के जोड़े में ही पहुंचती हैं. उनके लिए यह सिर्फ एक परिधान नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और अपनी कला के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक है.
आज उनकी यही अनोखी पहचान लोगों को प्रेरित कर रही है और उनकी मेहनत ने न केवल परिवार की आर्थिक स्थिति बदली, बल्कि उन्हें एक अलग मुकाम भी दिलाया. भारत मंडपम में आयोजित भारत टैक्सटाइल एक्सपो में जब वह पहुंची हैं तो हर कोई उन्हें देखता ही रह गया कि आखिर इस इवेंट में कोई महिला इतना भारी भरकम शादी का जोड़ा पहनकर कैसे आ सकती है. हर कोई उनसे सवाल पूछने लगा, लेकिन उन्होंने भी अपने संकल्प के बारे में सबको खुशी-खुशी बताया.
ऐसे शुरू हुई पार्वत की कहानी
पार्वती बाई ने बताया कि वह कर्नाटक के एक छोटे से गांव की रहने वाली हैं. आज से करीब 40 साल पहले कम उम्र में शादी हो जाती थी. उनकी शादी भी बेहद कम उम्र में हो गई थी. तब उन्होंने घर के आर्थिक हालातों को सुधारने के लिए सिलाई मशीन को उठाया. उन्हें सहारा मिला, उस वक्त एक एनजीओ का जिसने उन्हें सिलाई कढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया.
इस दौरान उन्होंने अनोखा संकल्प लिया कि वह जब कहीं भी जाएगी या जब भी कोई टांका लगाएंगी चाहे वह बैग हो या साड़ी हो तो अपने शादी के जोड़े में ही लगाएंगी. यानी शादी का जोड़ा पहन कर ही मशीन चलाएंगी. यहीं से उनकी कहानी शुरू हो गई और आज 40 साल बीत चुके हैं. वह जब भी कोई साड़ी या बैग बनाती हैं तो शादी का जोड़ा पहन कर बनाती है. यहां तक की बड़े से बड़े एक्सपो में भी जाती हैं तो शादी का जोड़ा ही पहन कर जाती हैं. जो लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता है.
फ्लाइट में भी कर चुकी हैं सफर
पार्वती भाई ने बताया कि उनकी शादी का जोड़ा बहुत अलग है. इसमें ब्लाउज लहंगे के साथ ओढ़नी होती है. इसके अलावा पायल की जगह पर मोटे लोहे होते हैं. उसके नीचे कंगन के बराबर की पायल पहनी जाती है. हाथों में प्लास्टिक और कांच दोनों की चूड़ियां होती हैं. उन्होंने बताया कि इसी काम के जरिए उन्होंने अपने घर के आर्थिक हालातों को सही किया. आज वह कई बार फ्लाइट में बैठ चुकी हैं. भारत सरकार भी उन्हें बहुत सहयोग करती है. इसके अलावा उन्होंने बताया कि जिस एंब्रॉयडरी को वह करती हैं, उसे लंबादी एंब्रॉयडरी कहते हैं.
यह भारत की एक प्रसिद्ध पारंपरिक कढ़ाई कला है, जिसे लंबानी, बंजारा या सुगाली समुदाय की महिलाएं सदियों से करती आ रही हैं. यह कला मुख्य रूप से कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कुछ हिस्सों में राजस्थान में प्रचलित है. इसकी खासियत यह है कि इसमें रंग-बिरंगे सूती या रेशमी धागों का उपयोग छोटे-छोटे शीशे जड़ना, कौड़ियां, सिक्के, मोती और धातु की सजावट, ज्यामितीय आकृतियां, फूल-पत्तियां और पारंपरिक जनजातीय डिजाइन होती है. हर डिजाइन हाथ से बनाई जाती है. इसलिए दो वस्तुएं बिल्कुल एक जैसी नहीं होती हैं. यह कढ़ाई भारतीय जनजातीय संस्कृति और लोककला की पहचान मानी जाती है. लंबादी एंब्रॉयडरी वाले उत्पाद भारत के साथ-साथ विदेशों में भी काफी लोकप्रिय हैं.
