नोएडा: मेट्रो सिटी और महानगरों में काम का बढ़ता दबाव, लगातार भागदौड़ और व्यस्त दिनचर्या के चलते बड़ी संख्या में लोग तनाव, डिप्रेशन और एंजायटी जैसी मानसिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं. ऐसे में AIIMS के पूर्व प्रोफेसर और वरिष्ठ चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. प्रदीप कुमार सिंघल ने एक आसान तरीका बताया है. उनका दावा है कि अगर व्यक्ति रोजाना सिर्फ छह मिनट रामचरितमानस के दोहे और चौपाइयों को पढ़े, उनके अर्थ को समझे और जीवन में उतारने का प्रयास करे, तो इससे उसके अवचेतन मन पर सकारात्मक असर पड़ता है और मानसिक मजबूती बढ़ती है. हालांकि, डॉक्टर की सलाह और निर्धारित दवाइयां जारी रखनी चाहिए. इनका दावा है कि इस नियम से दवाइयां दुगनी तेजी से काम करती हैं और कोई मरीज दुगनी तेजी से रिकवर करता है.
दोहे और चौपाइयों में छिपा है इलाज
आजकल बड़े शहरों में रफ्तार भरी जिंदगी में काम का दबाव, करियर की चिंता, आर्थिक तनाव और लगातार व्यस्त रहने की आदत लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रही है. डिप्रेशन और एंजायटी जैसी समस्याएं आज केवल किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि युवा, छात्र और कामकाजी लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं. इसी बीच AIIMS के पूर्व प्रोफेसर और वरिष्ठ चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. प्रदीप कुमार सिंघल ने मानसिक मजबूती के लिए रामचरितमानस के दोहों और चौपाइयों के नियमित अध्ययन को उपयोगी बताया है.
उनका दावा है कि रोजाना सिर्फ 6 मिनट रामचरितमानस के दोहों को पढ़ने, उनका अर्थ समझने और उनके संदेश को अपने जीवन में अपनाने से व्यक्ति के विचारों और अवचेतन मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. हालांकि, उन्होंने साफ किया कि उनका उद्देश्य आधुनिक चिकित्सा का विरोध करना नहीं है. मरीज को अपनी दवाइयां डॉक्टर की सलाह के अनुसार जारी रखनी चाहिए.
मात्र 6 मिनट में होता है चमत्कारी करिश्मा
डॉ. प्रदीप कुमार सिंघल लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि वो पिछले करीब 45 वर्षों से चिकित्सा क्षेत्र में काम कर रहे हैं. AIIMS में प्रोफेसर के रूप में सेवाएं देने के बाद वर्तमान में वह एक निजी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उन्होंने बताया कि कई वर्षों तक रामचरितमानस का अध्ययन करने के दौरान उन्हें यह महसूस हुआ कि इसमें मौजूद दोहे और चौपाइयां व्यक्ति को जीवन की कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने में मदद कर सकती हैं.
उनका कहना है कि महानगरों में रहने वाले लोग अक्सर तनाव और चिंता के बीच खुद के लिए समय नहीं निकाल पाते. ऐसे में सुबह के समय केवल कुछ मिनट शांत मन से किसी दोहे या चौपाई को पढ़ना, उसका अर्थ समझना और उसके संदेश पर विचार करना मानसिक रूप से सकारात्मक अभ्यास होता है.
अवचेतन मन को मिलती एनर्जी
डॉ. सिंघल ने बताया कि उनकी संस्कृति संज्ञान संस्था छात्रों को रामचरितमानस से जोड़ने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करती है. उनका कहना है कि बहुत से लोग रामचरितमानस का पाठ तो करते हैं, लेकिन उसके पीछे छिपे अर्थ और जीवन के व्यावहारिक संदेश को समझने का प्रयास नहीं करते. उनकी संस्था की ओर से छात्रों को सुबह समय पर उठकर रामचरितमानस के दोहे पढ़ने, उनका अर्थ समझने और उनके संदेश को अपने जीवन में उतारने के लिए प्रेरित किया जाता है. उनका मानना है कि हर रोज ऐसा करने से व्यक्ति का अवचेतन मन सकारात्मक विचारों से प्रभावित होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और लक्ष्य को लेकर एकाग्रता मजबूत होती है.
ये दोहा सुनाकर दिया उदाहरण
डॉ. सिंघल ने डिप्रेशन और एंजायटी से जूझ रहे लोगों का उदाहरण देते हुए बताया कि जब भरत अयोध्या लौटते हैं और उन्हें पिता महाराज दशरथ के निधन और भगवान राम के वनवास की जानकारी मिलती है, तब गुरु वशिष्ठ उन्हें समझाते हुए कहते हैं “सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ. हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ.” इसका भावार्थ है कि हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश जैसी परिस्थितियां मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं, इसलिए कठिन समय में धैर्य बनाए रखना जरूरी है. डॉ. सिंघल का मानना है कि इस संदेश को नियमित रूप से पढ़ने और समझने से व्यक्ति परिस्थितियों को स्वीकार करने और मानसिक रूप से मजबूत बने रहने की प्रेरणा पा सकता है.
बीमारी की मेडिसन लेना भी जरूरी
डॉ. सिंघल के मुताबिक, उनकी संस्कृति संज्ञान संस्था 19 महाविद्यालयों में रामचरितमानस दोहा प्रतियोगिताओं का आयोजन करती है और हजारों छात्र व पुजारी इससे जुड़े हुए हैं. उनका दावा है कि इन कार्यक्रमों से जुड़े छात्रों में सकारात्मक सोच, एकाग्रता और लक्ष्य के प्रति ऊर्जा देखने को मिली है. हालांकि, डिप्रेशन और एंजायटी गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जिनके लिए एक्सपर्ट डॉक्टर्स की सलाह जरूरी है.
डॉ. सिंघल भी कहते हैं कि रामचरितमानस का अध्ययन किसी भी स्थिति में दवाइयों या मानसिक स्वास्थ्य एक्सपर्ट की सलाह का विकल्प नहीं है. उनका मानना है कि धार्मिक या आध्यात्मिक अध्ययन व्यक्ति को मानसिक सहारा और सकारात्मक सोच देता है, जबकि जरूरत पड़ने पर आधुनिक चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक उपचार भी साथ-साथ जारी रहना चाहिए.
