हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने काफी सुर्खियां बटोरीं. हालांकि इसमें विदेशी फंडिंग की आशंका भी जताई जा रही है. आरोप लग रहे हैं कि आंदोलन को पीछे से सहयोग दिया गया है. वहीं अब भारतीय खुफिया और साइबर सुरक्षा एजेंसियों ने इस बात पर चिंता जताई है कि विदेशों से संचालित बॉट नेटवर्क, पाकिस्तान से जुड़े दुष्प्रचार (डिसइन्फॉर्मेशन) तंत्र और खालिस्तानी चरमपंथी संगठन भारत में होने वाले विरोध प्रदर्शनों का फायदा उठाने की कोशिश कर रह हैं. एजेंसियों का कहना है कि ये युवाओं को ऑनलाइन प्रभावित करने की नापाक कोशिशें कर रहे हैं.
CNN-News18 को मिले खुफिया इनपुट के अनुसार, बाहर से संचालित हो रहे ये नेटवर्क आमतौर पर खुद कोई आंदोलन शुरू नहीं करते. इसके बजाय वे पहले से चल रहे ऐसे आंदोलनों में शामिल होने की कोशिश करते हैं, जिनकी वास्तविक और स्थानीय समस्याएं होती हैं. जैसे किसानों की समस्याएं,श्रमिकों के मुद्दे,बेरोजगारी, छात्रों और युवाओं के आंदोलन आदि.
ये लोग इतने शातिर तरीके से इन आंदोलनों में घुसते हैं और इन्हें कैप्चर करने की कोशिश करते हैं कि आंदोलनकारियों को भी अंदाजा नहीं हो पाता है. इसके बाद वे धीरे-धीरे इन आंदोलनों से जुड़ी ऑनलाइन चर्चा (नैरेटिव) को अपनी दिशा में मोड़ने की कोशिश करते हैं.
अधिकारियों का कहना है कि यह तरीका पाकिस्तान की लंबे समय से बताई जाने वाली “K-2 रणनीति” से मेल खाता है. इसका मतलब है कश्मीर और खालिस्तान के मुद्दों को जोड़ना और भारत के लोकतांत्रिक मतभेदों का इस्तेमाल भारत विरोधी प्रचार के लिए करना.
एजेंसियों का दावा है कि इस पूरे नेटवर्क में पाकिस्तान में बैठे संचालक (हैंडलर), उत्तरी अमेरिका और यूरोप में सक्रिय खालिस्तानी संगठनों के साथ मिलकर काम करते हैं. उनका मकसद, एजेंसियों के अनुसार, सरकारी नीतियों से जुड़े आंदोलनों को धीरे-धीरे भारत विरोधी या अलगाववादी संदेशों में बदलना होता है.
खुफिया एजेंसियों की एक बड़ी चिंता सोशल मीडिया पर समन्वित फर्जी गतिविधियां (Coordinated Inauthentic Behaviour) हैं. रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप, उत्तरी अमेरिका और पाकिस्तान से संचालित नेटवर्क सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे विरोध प्रदर्शन से जुड़े हैशटैग पर नजर रखते हैं, लोकप्रिय नारों को अपनाते हैं और बॉट अकाउंट, ट्रोल समूह और एआई से तैयार सामग्री के जरिए भड़काऊ संदेशों को अधिक लोगों तक पहुंचाते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, इनका मकसद शुरुआत में सीधे चरमपंथी और कट्टर विचार फैलाना नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे उस चर्चा, आंदोलन या विरोध प्रदर्शन का विषय जवाबदेही और सुधार से हटाकर सरकार के साथ टकराव की ओर ले जाना होता है.
जांच एजेंसियों ने गुप्त फंडिंग के कुछ कथित तरीकों की भी पहचान की है. इनमें अवैध धन (डार्क मनी), गुप्त हवाला नेटवर्क और फर्जी प्रवासी संस्थाओं (डायस्पोरा चैरिटी) के जरिए धन पहुंचाने के आरोप शामिल हैं. एजेंसियों को शक है कि इन माध्यमों से शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में सक्रिय कुछ कट्टरपंथी तत्वों को आर्थिक मदद दी जाती है.
सुरक्षा एजेंसियों का यह भी दावा है कि कुछ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के लिए उकसाया जाता है, ताकि पुलिस की सख्त कार्रवाई हो और उसकी तस्वीरें व वीडियो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी प्रचार के लिए इस्तेमाल किए जा सकें.
सरकार पहले भी पाकिस्तान से जुड़े सूचना नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई कर चुकी है. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने किसानों के आंदोलन और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान कथित तौर पर दुष्प्रचार फैलाने वाले कई यूट्यूब चैनल और वेबसाइट ब्लॉक किए थे.
खुफिया एजेंसियां सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) जैसे संगठनों पर भी नजर रखे हुए हैं, जो मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप से संचालित होते हैं. अधिकारियों का आरोप है कि बड़े प्रदर्शनों के दौरान विदेशों में बैठे कुछ लोगों ने वीडियो जारी कर लाल किले जैसे प्रमुख स्थानों पर अलगाववादी प्रतीक दिखाने के बदले नकद इनाम देने की पेशकश की थी. यह आरोप विशेष रूप से 2021 की गणतंत्र दिवस हिंसा के संदर्भ में लगाया गया है.
हालांकि सुरक्षा एजेंसियां यह भी कहती हैं कि लोकतांत्रिक आंदोलनों में शामिल अधिकांश प्रदर्शनकारी आम नागरिक होते हैं और उनकी मांगें वास्तविक होती हैं. लेकिन एजेंसियों का दावा है कि विदेशी प्रभाव वाले नेटवर्क खासकर Gen Z (युवा पीढ़ी) को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रभावित कर आंदोलनों की दिशा बदलने और भारत के आंतरिक मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालने की कोशिश करते हैं.
