अगर आप अगले साल अपना स्मार्टफोन अपग्रेड करने की सोच रहे हैं, तो आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है. अगली जनरेशन के फ़्लैगशिप फ़ोन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी होने वाली है, और इसकी मुख्य वजह स्मार्टफोन्स की डिज़ाइन टीम नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती वैश्विक मांग है. AI की वजह से दुनिया भर में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग पर भारी दबाव है, जिससे कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री में कंपोनेंट की लागत बढ़ रही है. नतीजतन, आपकी जेब में मौजूद फ़ोन पर एक छिपा हुआ AI टैक्स लगने वाला है.
कीमतों में इस उछाल की मुख्य वजह हाई-परफॉर्मेंस मेमोरी चिप्स की भारी ग्लोबल कमी है. बड़े क्लाउड-बेस्ड AI मॉडल को चलाने और नए डेटा सेंटर बनाने के लिए, बड़ी टेक कंपनियां बहुत बड़ी मात्रा में एंटरप्राइज़ मेमोरी खरीद रही हैं. Samsung, SK Hynix और Micron जैसी बड़ी चिप बनाने वाली कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को स्टैंडर्ड मोबाइल RAM से हटाकर ज़्यादा मुनाफ़े वाले हाई बैंडविड्थ मेमोरी (HBM) और खास सर्वर DRAM की ओर ले जा रही हैं. क्योंकि AI सर्वर से कहीं ज़्यादा मुनाफ़ा होता है, इसलिए जो सिलिकॉन वेफ़र पहले स्मार्टफ़ोन मेमोरी बनाने में इस्तेमाल होते थे, वे अब एंटरप्राइज़ हार्डवेयर के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं.
प्रोडक्शन में इस बदलाव की वजह से डायनामिक रैंडम-एक्सेस मेमोरी (DRAM) की कीमतों में ज़बरदस्त उछाल आया है. बता दें, RAM स्मार्टफोन को स्पीड देता है और सुचारु रूप से चलाती है. मोबाइल LPDDR5 मॉड्यूल की कंपोनेंट कीमतों में दो अंकों में बढ़ोतरी हुई है, जिससे डिवाइस बनाने वाली कंपनियों के लिए लागत का बिल तेज़ी से बढ़ गया है. भारत में, कंपोनेंट की वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का असर रिटेल बाज़ार पर बहुत ज़्यादा पड़ता है.
तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे हब में एप्पल, लोकल असेंबली बढ़ाने के बावजूद, सिलिकॉन प्रोसेसर और मेमोरी चिप्स जैसे महंगे मुख्य कंपोनेंट पूरी तरह से इम्पोर्ट किए जाते हैं. जब 200 डॉलर (19,088.47 रुपए) की वैश्विक कंपोनेंट कीमत में बढ़ोतरी के साथ इम्पोर्ट टैरिफ, 18% GST और करेंसी हेजिंग जुड़ जाती है, तो रिटेल कीमत में 26,000 रुपये तक का उछाल आ सकता है. इससे टॉप-टियर फ़्लैगशिप फोन की कीमत 160000 रुपये से ज़्यादा हो सकती है, जिससे मिडिल क्लास का अपग्रेड बजट बढ़ सकता है और कंज्यूमर, मल्टी-ईयर फाइनेंसिंग प्लान पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं.
ऑन-डिवाइस AI के लिए ज़्यादा सिलिकॉन की ज़रूरत
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से स्मार्टफ़ोन को पहले से कहीं ज़्यादा फिजिकल मेमोरी की ज़रूरत है. डिवाइस पर ही हार्ड जेनरेटिव एआई फ़ीचर चलाने के लिए फ़ोन को बहुत ज़्यादा RAM की ज़रूरत होती है. Apple Intelligence जैसे फीचर्स को काम करने के लिए कम से कम 8GB मेमोरी की ज़रूरत होती है, और भविष्य के सॉफ़्टवेयर अपडेट के साथ हार्डवेयर की ज़रूरतें 12GB या उससे ज़्यादा हो सकती हैं. इससे एक मुश्किल स्थिति पैदा होती है: एक तरफ़ मोबाइल RAM की प्रति गीगाबाइट कीमत काफ़ी बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ़ स्मार्टफ़ोन ब्रांड्स को हर डिवाइस में ज़्यादा गीगाबाइट RAM देनी पड़ रही है.
इसका सबसे ज़्यादा असर ग्लोबल खरीदारों पर क्यों पड़ेगा?
हालांकि, Apple जैसी बड़ी टेक कंपनियों के पास शुरुआती झटकों से निपटने के लिए काफी कैश रिजर्व और लंबे समय के सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट होते हैं, लेकिन आखिर में कंपोनेंट की बढ़ती लागत का असर कंज्यूमर पर ही पड़ता है.
भारत, ब्रिटेन और यूरोप जैसे बाज़ारों में, मैन्युफैक्चरिंग लागत में डॉलर के हिसाब से होने वाली कोई भी बढ़ोतरी तेज़ी से बढ़ जाती है. लोकल इंपोर्ट टैरिफ, वैल्यू-एडेड टैक्स और करेंसी हेजिंग (एक फाइनेंशियल स्ट्रेटजी है जिसका यूज विदेशी मुद्रा दरों में उतार-चढ़ाव से होने वाले संभावित नुकसान से बचने के लिए किया जाता है.) की वजह से कच्चे कंपोनेंट की कीमतों में बढ़ोतरी रिटेल कीमत में बहुत ज़्यादा उछाल में बदल जाती है.
कंज्यूमर के सामने मुश्किल विकल्प
कंज्यूमर या तो ज़्यादा शुरुआती कीमत चुकाएं, या पुराने डिवाइस को चार साल या उससे ज़्यादा समय तक इस्तेमाल करें, या फिर खर्च के बोझ को कम करने के लिए लंबे समय के मंथली फ़ाइनेंसिंग प्लान का सहारा लें. AI क्रांति भले ही सॉफ़्टवेयर को बदल रही हो, लेकिन आम खरीदारों के लिए इसका पहला साफ़ असर अपग्रेड के लिए बहुत ज़्यादा कीमत चुकाना है.
