दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े चर्चित कैश-एट-होम मामले में बुधवार को जांच कमेटी की रिपोर्ट लोकसभा में पेश कर दी गई. तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ किसी साजिश के संकेत नहीं मिले हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इतनी बड़ी मात्रा में नकदी का किसी की नजर में आए बिना वहां मौजूद रहना संभव नहीं लगता. समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सिद्ध माना है. समिति ने नकदी की बरामदगी, साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही और जांच के दौरान दिए गए स्पष्टीकरण को लेकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज किए हैं.
संसद के मानसून सत्र के समापन से एक दिन पहले रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखा गया. यह जांच न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत की गई थी. समिति ने अपनी कार्यवाही के दौरान मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को रिकॉर्ड किया और फिर अपनी विस्तृत रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी. सूत्रों के मुताबिक, रिपोर्ट में जस्टिस यशवंत वर्मा के जांच प्रक्रिया के दौरान दिए गए जवाबों को लेकर भी टिप्पणी की गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वह कई सवालों पर टालमटोल करते नजर आए.
पहला आरोप- स्टोररूम में मिली अघोषित नकदी
जस्टिस वर्मा के खिलाफ पहला आरोप नई दिल्ली के 30, तुगलक क्रेसेंट स्थित उनके आधिकारिक आवासीय परिसर के स्टोररूम से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने से जुड़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक, वहां 500-500 रुपये के नोटों की गड्डियों के रूप में भारी मात्रा में कैश मिला था. समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके. इसी आधार पर समिति ने पहला आरोप सिद्ध माना.
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि इतनी बड़ी रकम का वहां मौजूद होना किसी की नजर से पूरी तरह बच जाना आसान नहीं था. यही वजह है कि समिति ने इसे लेकर जस्टिस वर्मा के स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया.
सबूतों को सुरक्षित रखने में लापरवाही
दूसरा आरोप इस मामले से जुड़े सबूतों के संरक्षण से संबंधित था. समिति ने पाया कि स्टोररूम की स्थिति को कानूनी जांच और सीलिंग से पहले बदला गया था. इसके अलावा बाद में वहां कुछ करेंसी नोटों के गायब होने को लेकर भी स्पष्ट और संतोषजनक जवाब सामने नहीं आया. जांच समिति ने इसे साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही और विफलता माना.
जवाबों को बताया टालमटोल वाला
तीसरा आरोप जांच प्रक्रिया के दौरान जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए जवाबों से जुड़ा था. समिति ने खास तौर पर 22 मार्च 2025 के उनके जवाब का जिक्र करते हुए कहा कि उनका स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं था. रिपोर्ट के मुताबिक, उनका रुख कई मामलों में टालमटोल वाला रहा और वह संस्थागत जिम्मेदारी और साफगोई से जवाब देने में विफल रहे. समिति ने स्वतंत्र आधिकारिक गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस आरोप को भी सिद्ध माना.
कैसे शुरू हुआ था पूरा विवाद?
यह पूरा मामला पिछले साल 14 मार्च को सामने आया था. जस्टिस यशवंत वर्मा के नई दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास पर होली से ठीक एक दिन पहले आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी बरामद होने की बात सामने आई थी. घटना के बाद इस बरामदगी ने न्यायपालिका के भीतर और राजनीतिक हलकों में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था.
जस्टिस वर्मा ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया था. बाद में उन्होंने 9 अप्रैल 2026 को न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दे दिया.
अगस्त 2025 में बनी थी तीन सदस्यीय कमेटी
इस मामले की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त को तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था. समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने की. इसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल थे.
समिति ने अपनी जांच पूरी करने के बाद मई 2026 में रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी. अब इसे संसद में पेश किए जाने के साथ ही मामले की जांच से जुड़े निष्कर्ष आधिकारिक तौर पर सामने आ गए हैं.
‘इतनी बड़ी रकम का नजरों से बचना मुश्किल’
रिपोर्ट का सबसे अहम हिस्सा कथित तौर पर उस बड़ी मात्रा में नकदी को लेकर है, जो जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद सामने आई थी. सूत्रों के मुताबिक, समिति ने माना है कि इतनी बड़ी रकम का लंबे समय तक किसी की नजर में आए बिना वहां मौजूद रहना संभव नहीं लगता. रिपोर्ट में किसी बाहरी साजिश या नकदी को वहां रखे जाने की साजिश की थ्योरी को समर्थन देने वाला कोई संकेत नहीं मिला.
न्यायपालिका की साख से जुड़ा था मामला
जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा यह विवाद इसलिए भी बेहद संवेदनशील रहा, क्योंकि मामला न्यायपालिका के एक मौजूदा जज के आधिकारिक आवास से जुड़ा था. घटना के बाद न्यायाधीशों की जवाबदेही, न्यायिक पारदर्शिता और न्यायपालिका की संस्थागत साख को लेकर भी गंभीर सवाल उठे थे. अब जांच समिति की रिपोर्ट संसद में रखे जाने के बाद इस मामले में सामने आए आरोपों और जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन गए हैं.
