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दिल्ली हाई कोर्ट ने संपत्ति विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया कि सिर्फ किसी घर में रहने या उसके निर्माण और मरम्मत में पैसे लगाने से बेटे को अपने आप सह मालिकाना हक नहीं मिल जाता. करावल नगर के एक मामले में बेटे और उसकी पत्नी ने मां के घर पर अपना अधिकार जताया था. बेटे का दावा था कि उसने जमीन खरीदने में 1.5 लाख रुपये और मकान निर्माण में 60 हजार रुपये दिए थे. हालांकि, वह इन भुगतानों का कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका. कोर्ट ने दोनों को मकान खाली करने और लगाए गए ताले हटाने का निर्देश दिया है.
मां को मकान से बेदखल करने की कोशिश बेटे और बहू को काफी भारी पड़ गई. (एआई इमेज)
दिल्ली हाईकोर्ट न्यूज. एक बेटा अपनी ही मां को घर से बाहर करना चाहता था. लेकिन, बेटे के इच्छा के खिलाफ मां ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया. वहीं हाईकोर्ट में कुछ ऐसा पाला पलटा कि बेटे ही नहीं बहू को भी जायदाद से बेदखल कर दिया गया. जी हां, मां-बेटे के बीच चल रहे संपत्ति विवाद पर दिल्ली हाई कोर्ट ने एतिहासिक फैसला दिया है. कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ किसी घर में रहने, उसके निर्माण या मरम्मत में पैसा लगाने से किसी बेटे को उस संपत्ति का अपने आप सह-मालिकाना हक नहीं मिल जाता. इसी आधार पर कोर्ट ने करावल नगर निवासी बेटे और उसकी पत्नी को मां का घर खाली करने और उनके लगाए ताले हटाने का निर्देश दिया है.
दरअसल, 1996 में एक शख्स ने अपनी पत्नी के नाम पर एक मकान खरीदा था. इसी मकान में इस महिला का बेटा हक जमाने की कोशिश में था. महिला ने कोर्ट को बताया कि उसके पति नौकरी करते थे और उन्होंने अपनी बचत से यह संपत्ति खरीदी थी. उन्होंने अपनी बात को साबित करने के लिए कोर्ट से समक्ष पॉवर ऑफ अटॉर्नी, सेल एग्रीमेंट और खरीद की रसीद पेश कीं. इन सभी दस्तावेजों की 1 नवंबर 1996 की तारीख दर्ज थी. इस खरीद के बाद से यह महिला इसी मकान में रह रही थी. बाद में बेटे की शादी हुई और बहू भी इसी घर में आकर रहने लगी. लेकिन समय के साथ मां और बेटे के रिश्ते बिगड़ते चले गए. विवाद इतना बढ़ा कि मामला आखिरकार कोर्ट तक पहुंच गया.
शादी के बाद बेटे-बहू को रहने की इजाजत, लेकिन मालिकाना हक नहीं
- महिला का कहना था कि बेटे और बहू को घर में रहने की इजाजत सिर्फ पारिवारिक रिश्ते की वजह से दी गई थी. इसका मतलब यह नहीं था कि बेटे को संपत्ति में कोई टाइटल या मालिकाना हक मिल गया हो.
- महिला के मुताबिक, वह घर के ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे, किचन और एक शॉप का इस्तेमाल करती थी. वहीं उसका बेटा ग्राउंड फ्लोर के एक अन्य कमरे के अलावा पहली मंजिल के एक कमरे और किचन का भी इस्तेमाल करता था.
- शुरुआत में सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन बाद में मां और बेटे के बीच विवाद बढ़ने लगा. महिला ने आरोप लगाया कि बेटा और बहू उसके साथ झगड़ा करते थे और उसे परेशान करते थे.
- हालात बिगड़ने के बाद उसने दोनों से घर छोड़ने के लिए कहा. महिला के अनुसार, बेटा और बहू घर से निकल तो गए, लेकिन जिन कमरों में वे रहते थे, वहां ताले लगा दिए.
- इसके बाद विवाद सिर्फ पारिवारिक नहीं रहा, बल्कि संपत्ति पर कब्जे और मालिकाना हक का कानूनी विवाद बन गया.
बेटे पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने का भी आरोप
- महिला ने आरोप लगाया कि बेटे और बहू ने मिलकर संपत्ति पर कब्जा करने की योजना बनाई. उसने दावा किया कि बेटे ने ऐसे कागजात तैयार करवाए, जिनमें मकान को 1.5 लाख रुपये के एवज में उसके नाम transfer करने का दावा किया गया था.
- महिला ने इन दस्तावेज को फर्जी बताया. उसके मुताबिक, इन दस्तावेजों में 12 जनवरी 2003 की तारीख दर्ज थी. उसने कोर्ट में यह भी दलील दी कि वह तारीख रविवार थी और इसी आधार पर दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया.
- मां-बेटे के बीच विवाद यहीं नहीं रुका. महिला ने आरोप लगाया कि 2 जुलाई 2013 को उसके बेटे ने उसके दिवंगत पति के बैंक एकाउंट से 50 हजार रुपये निकाल लिए. इसके बाद अगस्त 2013 में उसने बेटे के खिलाफ पुलिस स्टेशन में शिकायत भी दर्ज कराई थी.
बिजली के कनेक्शन को लेकर भी हुआ विवाद
- संपत्ति का विवाद बिजली के कनेक्शन तक पहुंच गया. महिला को जब पता चला कि बेटे ने उसके घर के लिए अलग बिजली का कनेक्शन लेने के लिए आवेदन किया है, तो उसने इसका विरोध किया.
- 4 अक्टूबर 2013 को उसने बीएसईएस यमुना पॉवर को लिखित शिकायत दी. महिला का कहना था कि वह संपत्ति की मालिक है और उसकी जानकारी के बिना बेटे का अलग बिजली का कनेक्शन लेने का हक नहीं है.
- इसके बाद बेटे ने भी अपनी मां के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया. उसने सिविल सूट दाखिल किया. हालांकि, यह मुकदमा 18 नवंबर 2015 को खारिज हो गया.
- इसके बाद 25 जनवरी 2016 को महिला ने बेटे से अपनी संपत्ति वापस लेने के लिए अदालत का रुख किया. करीब एक दशक तक चले इस विवाद में आखिरकार 8 सितंबर 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया है.
बेटे ने कहा- मैंने भी दिए थे पैसे
- हाई कोर्ट में बेटे ने अपनी तरफ से संपत्ति पर अधिकार जताने के लिए कई दलीलें दीं. उसका कहना था कि उसके पिता की सेलरी इतनी ज्यादा नहीं थी कि वह अकेले इस प्रॉपर्टी को खरीद सकते.
- बेटे ने दावा किया कि जब जमीन खरीदी गई थी, तब वह इलेक्ट्रिशियन के तौर पर काम करता था और उसने जमीन खरीदने के लिए 1.5 लाख रुपये दिए थे.
- उसने यह भी दावा किया कि घर के कंस्ट्रक्शन के समय उसने अलग से 60 हजार रुपये खर्च किए. इसी आधार पर उसने कोर्ट के सामने खुद को प्रॉपर्टी का ज्वाइंट ओनर मानने की मांग की.
- उसका तर्क था कि जब उसने प्रॉपर्टी खरीदने और घर बनाने में पैसे लगाए हैं, तो उसे भी उसमें हिस्सा मिलना चाहिए. लेकिन इस दावे के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इन भुगतानों का कोई सबूत कोर्ट के सामने पेश नहीं कर सका.
कोर्ट ने कहा- खर्च करने से नहीं बन जाते सह-मालिक
दिल्ली हाई कोर्ट ने बेटे की दलील को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी प्रॉपर्टी के घरेलू खर्च, कंस्ट्रक्शन या रिपेयर में पैसा खर्च करने मात्र से को-ओनरशिप का अधिकार नहीं मिल जाता है. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कंस्ट्रक्शन करने से किसी व्यक्ति को अपने आप संपत्ति में मालिकाना हक नहीं मिलता. इसके लिए स्वतंत्र लीगल टाइटल या ऐसा दस्तावेज होना जरूरी है, जिससे उसके अधिकार की पुष्टि हो. बेटा यह भी साबित नहीं कर सका कि उसके नाम पर संपत्ति का कोई स्वतंत्र टाइटल था. दूसरी तरफ, मां के पास प्रॉपर्टी से जुड़े कई दस्तावेज थे.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…
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