नई दिल्ली. अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने और विवादों को बातचीत व मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की दिशा में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली (NLU Delhi) ने बड़ी पहल की है. विश्वविद्यालय की पहल पर ‘सामंजस्य आर्बिट्रेशन, मीडिएशन एंड ODR काउंसिल’ का अनावरण किया गया. इसका उद्देश्य लोगों को विवादों के समाधान के लिए एक भरोसेमंद, निष्पक्ष और तकनीक आधारित मंच उपलब्ध कराना है.
इस प्लेटफॉर्म का अनावरण सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और NCLAT के पूर्व चेयरमैन जस्टिस अशोक भूषण ने किया. कार्यक्रम में NLU दिल्ली के वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) जी.एस. बाजपेयी, रजिस्ट्रार प्रो. (डॉ.) ऋषभ गर्ग, सामंजस्य ODR के फाउंडर प्रिंस पवैया समेत न्यायपालिका, बार, शिक्षा जगत और कानूनी क्षेत्र से जुड़े कई लोग मौजूद रहे.
क्या है ‘सामंजस्य ODR’?
‘सामंजस्य ODR’ को आर्बिट्रेशन, मीडिएशन, सुलह और ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) के लिए एक संस्थागत प्लेटफॉर्म के तौर पर विकसित किया जा रहा है. इसे NLU दिल्ली के सहयोग से तैयार किया जा रहा है और NLU दिल्ली फाउंडेशन इसकी देखरेख कर रहा है. इसका मकसद लोगों को हर छोटे-बड़े विवाद के लिए सीधे अदालत जाने की जरूरत को कम करना और मामले की प्रकृति के हिसाब से उचित समाधान उपलब्ध कराना है.
जस्टिस अशोक भूषण बोले- ADR से अदालतों को मिलेगी मदद
कार्यक्रम में जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि भारत की न्याय व्यवस्था में आर्बिट्रेशन, मीडिएशन और ODR की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है. उन्होंने समझाया कि आर्बिट्रेशन में विवाद का एक लागू करने योग्य फैसला दिया जाता है, जबकि मीडिएशन में दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान तक पहुंचते हैं. इससे कई मामलों में विवाद खत्म होने के साथ-साथ दोनों पक्षों के रिश्ते भी बनाए रखे जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि सही तरीके से तैयार किए गए ADR सिस्टम अदालतों के विकल्प नहीं हैं, बल्कि न्याय व्यवस्था को मजबूत करने में अदालतों के सहयोगी हैं. इससे अदालतें उन मामलों पर ज्यादा ध्यान दे सकती हैं, जिनमें न्यायिक फैसले की वास्तव में जरूरत है.
भरोसा और निष्पक्षता सबसे जरूरी
जस्टिस भूषण ने कहा कि ADR सिस्टम की सफलता के लिए लोगों का भरोसा सबसे अहम है. इसके लिए निष्पक्ष मध्यस्थ, पारदर्शी प्रक्रिया, गोपनीयता, हितों के टकराव से बचाव और दोनों पक्षों के साथ समान व्यवहार जरूरी है. उन्होंने ‘सामंजस्य’ की शुरुआत को समय की जरूरत बताते हुए कहा कि तकनीक का इस्तेमाल न्याय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए होना चाहिए. उनके मुताबिक, टेक्नोलॉजी को न्याय में मदद करनी चाहिए, उसे कमजोर नहीं करना चाहिए. ODR प्लेटफॉर्म में मानवीय निगरानी, पारदर्शिता, गोपनीयता, निष्पक्षता और डेटा सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है.
प्रो. बाजपेयी बोले- हर केस के लिए एक ही रास्ता जरूरी नहीं
NLU दिल्ली के वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) जी.एस. बाजपेयी ने कहा कि ADR को अदालतों के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह न्याय दिलाने की पूरी व्यवस्था का एक हिस्सा है. उन्होंने कहा कि कुछ विवादों में अदालत का फैसला जरूरी हो सकता है, जबकि कई मामलों को आर्बिट्रेशन, मीडिएशन, बातचीत या ऑनलाइन विवाद समाधान के जरिए ज्यादा आसानी से सुलझाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि ODR की मदद से दूरी, समय, खर्च और दूसरी व्यावहारिक परेशानियों को कम किया जा सकता है. प्रो. बाजपेयी ने कहा कि इस पूरी व्यवस्था का मुख्य सिद्धांत ‘सोच-समझकर किया गया फैसला’ होना चाहिए.
सिर्फ डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाना मकसद नहीं
प्रो. बाजपेयी के मुताबिक, ‘सामंजस्य’ का उद्देश्य केवल एक और डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करना नहीं है. इसका लक्ष्य ऐसी संस्था तैयार करना है, जहां निष्पक्षता, नैतिकता, पारदर्शिता और लगातार सीखने को प्राथमिकता मिले. ‘सामंजस्य’ के जरिए जिम्मेदार तकनीक का इस्तेमाल करते हुए विवादों के समाधान को ज्यादा आसान और सुलभ बनाने की कोशिश की जाएगी. साथ ही इसमें इंसानी पहल और विशेषज्ञता को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जाएगा.
