DU News: दिल्ली यूनिवर्सिटी से हटा ‘दिल्ली सल्तनत’ का पेपर, जानिए नए सिलेबस में क्या बदला

DU PG History Syllabus: दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास से पोस्टग्रेजुएशन यानी PG करने वाले छात्रों के लिए सिलेबस में बड़ा बदलाव हुआ है. नए सिलेबस में दिल्ली सल्तनत पर पढ़ाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक पेपर शामिल नहीं है. यह पेपर कई दशकों से मध्यकालीन भारत के इतिहास की पढ़ाई का अहम हिस्सा रहा था.इसके साथ प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत के इतिहास से जुड़े कुछ दूसरे लंबे समय से पढ़ाए जा रहे पेपर भी नए सिलेबस में नहीं हैं.दिल्ली यूनिवर्सिटी के नए सिलेबस से जुड़े रिकॉर्ड और उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ये बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP 2020 के तहत चल रही सिलेबस समीक्षा और पुनर्गठन की प्रक्रिया के बीच हुए हैं. यूनिवर्सिटी का कहना है कि कुछ सिलेबस में विभागीय स्तर पर बदलाव किए गए थे जिसके बाद उन्हें दोबारा विशेषज्ञ समिति के सामने समीक्षा के लिए रखा गया.

दिल्ली सल्तनत का कौन सा पेपर हटाया गया?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग में PG के तीसरे सेमेस्टर में पढ़ाया जाने वाला पेपर द दिल्‍ली सल्‍तनत: स्‍ट्रक्‍चर्स ऑफ अर्थारिटी इन मेडिवल नॉर्थ इंडिया (13th-14th शताब्‍दी)नए सिलेबस में नहीं है.हिंदी में इसे मोटे तौर पर दिल्ली सल्तनत: मध्यकालीन उत्तर भारत में सत्ता की संरचनाएं (13वीं-14वीं शताब्दी)कहा जा सकता है.इस पेपर में सिर्फ दिल्ली सल्तनत के शासकों या युद्धों की जानकारी नहीं पढ़ाई जाती थी बल्कि उस दौर में राज्य का गठन कैसे हुआ, सत्ता और प्रशासन कैसे चलाए गए और राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन किस तरह विकसित हुआ जैसे विषयों का अध्ययन किया जाता था.यह पेपर DSE यानी विषय-विशेष वैकल्पिक पाठ्यक्रम का हिस्सा था.DSE के जरिए किसी विषय के छात्र अपनी रुचि के मुताबिक किसी खास क्षेत्र या विषय पर विशेषज्ञता वाली पढ़ाई चुन सकते हैं.

दिल्ली सल्तनत के पेपर में क्या पढ़ाया जाता था?

दिल्ली सल्तनत से जुड़े इस पेपर का दायरा काफी व्यापक था. PG सिलेबस से जुड़े दस्तावेज के अनुसार इसमें 13वीं और 14वीं शताब्दी की अलग-अलग इतिहासलेखन संबंधी व्याख्याओं (Historiographical Interpretations)का अध्ययन किया जाता था.इसका एक उद्देश्य यह समझना भी था कि दिल्ली सल्तनत के दौर को भारत के व्यापक इतिहास में किस तरह देखा जाए.इसमें दिल्ली सल्तनत के गठन, 13वीं और 14वीं शताब्दी की राजनीतिक संस्कृति और उस समय की आध्यात्मिक तथा धार्मिक परंपराओं को भी शामिल किया गया था.

कौन-कौन से दूसरे पेपर भी नए सिलेबस में नहीं हैं?

दिल्ली सल्तनत के अलावा कई दूसरे पेपर भी तीसरे सेमेस्टर के नए अधिसूचित सिलेबस में दिखाई नहीं देते हैं.इनमें उत्तर भारत का इतिहास लगभग 1400-1550, प्रारंभिक भारत में जेंडर और महिलाएं: 1500 ईसा पूर्व से 1000 ईस्वी तक, प्राचीन भारत में राजनीतिक प्रक्रियाएं और राजव्यवस्थाओं की संरचना तथा प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म और समाज जैसे पेपर शामिल हैं.

उत्तर भारत के इतिहास वाले पेपर में क्या पढ़ाया जाता था?

उत्तर भारत के इतिहास वाले पेपर में दिल्ली सल्तनत के विघटन से लेकर मुगल साम्राज्य के उभरने के बीच के दौर को समझने की कोशिश की जाती थी.इसमें अफगान राजनीतिक संस्कृतियों, अलग-अलग शासन व्यवस्थाओं के तहत राजनीतिक शक्ति के फैलाव, संरक्षण और साहित्यिक संस्कृतियों जैसे विषय शामिल थे.इसके अलावा सूफीवाद (Sufism)और भक्ति (Bhakti)को सामाजिक और राजनीतिक सत्ता के रूपों के तौर पर भी देखा जाता था.राज्य के गठन, इस्लामीकरण, सामाजिक बदलाव और बौद्धिक गतिविधियों से जुड़े सवाल भी इस पेपर का हिस्सा थे.फैकल्टी से जुड़े सदस्यों के मुताबिक ये दोनों पेपर पुराने सिलेबस में भी मौजूद थे और 2019-20 के अकादमिक सत्र के सिलेबस का हिस्सा रहे थे.इन्हें विभाग में कई वर्षों से पढ़ाया जा रहा था.

महिलाओं और जेंडर से जुड़ा पेपर भी हटाया गया

नए सिलेबस में शामिल नहीं किए गए पेपरों में जेंडर एंड वुमेन इन अर्ली इंडिया भी है.इस पेपर में शुरुआती भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति और उनकी भूमिका को अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के संदर्भ में समझा जाता था.इसमें ब्राह्मणवादी, बौद्ध, जैन और तांत्रिक परंपराओं में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन शामिल था.विषयों में विवाह, परिवार, संपत्ति और स्त्रीधन (Stridhana)के अलावा महिलाओं का शासक, संरक्षक और कामगार के रूप में अध्ययन भी किया जाता था.इस पाठ्यक्रम में यह सवाल भी उठाया जाता था कि साहित्यिक और अभिलेखीय स्रोतों के जरिए क्या महिलाओं की अपनी अलग आवाज यानी Female Voice को समझा जा सकता है.

प्राचीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था वाला पेपर भी नहीं

Political Processes and Structure of Polities in Ancient India नाम के पेपर में प्राचीन भारत में राजनीतिक संस्थाओं के विकास को शुरुआती व्यवस्थाओं से लेकर मौर्य और गुप्त साम्राज्यों तथा बाद के क्षेत्रीय राज्यों तक समझाया जाता था.इसमें कर व्यवस्था, युद्ध, नौकरशाही, भूमि अनुदान, रानियां, मंदिर, व्यापारी संगठन और स्थानीय प्रशासन जैसे विषय शामिल थे यानी इस पेपर का फोकस सिर्फ राजाओं और साम्राज्यों पर नहीं था बल्कि प्राचीन भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को व्यापक रूप से समझने पर था.

धर्म और समाज से जुड़ा पेपर भी हटाया गया

एक अन्य पेपर Religion and Society in Ancient Indian Literature था. इसमें प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म और समाज के संबंधों का अध्ययन किया जाता था.इसमें वैदिक और उपनिषदिक परंपराओं के साथ बौद्ध और जैन परंपराएं, महाकाव्य और पुराणिक परंपराएं,शैववाद (Shaivism), वैष्णववाद (Vaishnavism), शाक्तवाद (Shaktism)और आम लोगों की धार्मिक परंपराओं को भी पढ़ाया जाता था.

38 प्रस्तावित DSE में से सिर्फ 16 पेपर

दिल्ली यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग ने PG के तीसरे सेमेस्टर के लिए कुल DSE पेपर प्रस्तावित किए थे.उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक इनमें से 16 पेपर ही Semester III के अधिसूचित सिलेबस में शामिल किए गए.वहीं कुछ अन्य पेपर यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड में चर्चा के तहत और जिन पर अभी चर्चा नहीं हुई जैसी श्रेणियों में हैं.इसका मतलब यह है कि सिलेबस में बदलाव की प्रक्रिया पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और कुछ अन्य पेपरों पर भी आगे फैसला हो सकता है.

आखिर सिलेबस में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पिछले कुछ वर्षों से NEP 2020(राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020)के तहत पाठ्यक्रमों में बदलाव और पुनर्गठन किया जा रहा है.पहले UG कार्यक्रमों में बदलाव किए गए और अब PG कार्यक्रमों में भी इसी तरह की समीक्षा चल रही है.यूनिवर्सिटी के एक इतिहास शिक्षक के मुताबिक PG में पढ़ाए जाने वाले दिल्ली सल्तनत और उत्तर भारत के इतिहास वाले पेपर की कुछ समानताएं UG के एक पेपर से थीं हालांकि शिक्षक का कहना था कि दोनों पेपरों को एक जैसा नहीं माना जा सकता.उनके अनुसार PG का दिल्ली सल्तनत वाला पेपर कई दशकों से मध्यकालीन भारत के इतिहास का मुख्य पेपर रहा है जबकि उत्तर भारत का पेपर एक विशेष विषय और ऐतिहासिक अध्ययन पर केंद्रित था.इसके विपरीत UG में संबंधित पेपर भारतीय इतिहास का व्यापक सर्वे कोर्स था.

सिलेबस बनाने और मंजूरी देने की प्रक्रिया क्या है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में सिलेबस बदलने की एक तय प्रक्रिया है. सबसे पहले संबंधित विभाग में कमेटी ऑफ कोर्सेज प्रस्तावित पाठ्यक्रमों पर चर्चा करती है और उन्हें मंजूरी देती है.इसके बाद प्रस्ताव स्‍टैंड‍िंग कमेटी के पास जाता है. वहां से इसे यूनिवर्सिटी की सर्वोच्च अकादमिक संस्था अकादमिक परिषद के सामने रखा जाता है.अकादमिक परिषद से मंजूरी मिलने के बाद सिलेबस को अंतिम मंजूरी के लिए कार्यकारी परिषद के पास भेजा जाता है.इसी प्रक्रिया के दौरान कुछ पेपरों को अलग-अलग स्तर पर मंजूरी मिली थी, लेकिन बाद में 7 अगस्त को जारी अंतिम अधिसूचना में सभी पेपर शामिल नहीं हुए.

यूनिवर्सिटी ने क्या कहा?

इंडियन एक्‍सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक दिल्ली यूनिवर्सिटी की अकादमिक मामलों की डीन के रत्‍नाबली ने कहा कि किसी भी पेपर को रोककर नहीं रखा गया था.उनके मुताबिक सभी प्रस्ताव अकादमिक परिषद के सामने रखे गए थे. अकादमिक परिषद ने कुलपति को ऐसे पेपरों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने की अनुमति दी थी, जिन पर दोबारा विचार की जरूरत थी.इस समिति में तीन बाहरी विशेषज्ञ, इतिहास विभाग के प्रमुख और अकादमिक परिषद के दो सदस्य शामिल थे.

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