Last Updated:
गोंडा में पाया जाने वाला रतनजोत का पौधा अपने औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके विषैले प्रभाव के कारण सावधानी बरतना आवश्यक है। यह गैलरी रतनजोत के पारंपरिक उपयोगों और इसके सेवन से जुड़ी चेतावनियों को दर्शाती है।
गोंडा: गांवों और खेतों के किनारे अपने आप उगने वाला रतनजोत का पौधा देखने में जितना साधारण लगता है, उतना ही खास माना जाता है. इसका वैज्ञानिक नाम जट्रोफा गॉसिपिइफोलिया (Jatropha gossypiifolia) है. इसे लाल अरंड या विलायती अरंड के नाम से भी जाना जाता है. लोक चिकित्सा और आयुर्वेद में इसकी पत्तियों, छाल, जड़ और लेटेक्स का सीमित उपयोग किया जाता रहा है, लेकिन यह पौधा विषैला भी होता है. इसलिए इसका सेवन बिना विशेषज्ञ की सलाह के नहीं करना चाहिए.
कैसे पहचानें रतनजोत का पौधा? रतनजोत एक झाड़ीदार पौधा है जिसकी ऊंचाई लगभग 1 से 3 मीटर तक हो सकती है. इसके पत्ते हरे और हल्के बैंगनी रंग के दिखाई देते हैं. पौधे में छोटे गहरे लाल रंग के फूल खिलते हैं और बाद में गोल आकार के हरे फल लगते हैं. पकने पर फल का रंग बदल जाता है.
त्वचा रोगों में पारंपरिक उपयोग: ग्रामीण क्षेत्रों में रतनजोत के बीज से निकाले गए तेल का उपयोग एक्जिमा, दाद, खुजली और कुछ अन्य त्वचा संबंधी समस्याओं में बाहरी रूप से किया जाता रहा है. आयुर्वेद में भी इसके कुछ प्रयोगों का उल्लेख मिलता है, हालांकि इसका उपयोग केवल जानकार वैद्य की देखरेख में ही उचित माना जाता है.
Add News18 as
Preferred Source on Google
घाव भरने में माना जाता है सहायक: वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि इस पौधे के तने या डंठल से सफेद रंग का दूध जैसा लेटेक्स निकलता है. पारंपरिक मान्यता है कि इसे छोटे कटे-फटे घावों पर लगाने से रक्तस्राव कम करने और घाव को जल्दी सुखाने में मदद मिल सकती है. हालांकि आधुनिक चिकित्सा में इसका प्रयोग सामान्य उपचार का विकल्प नहीं माना जाता.
दांत और मसूड़ों के लिए ग्रामीण नुस्खा: विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि कई गांवों में लोग इसके डंठल का उपयोग दातुन की तरह करते रहे हैं. माना जाता है कि इससे मसूड़ों की सफाई होती है और हल्की सूजन या दांत दर्द में राहत मिल सकती है. फिर भी नियमित दंत उपचार के लिए दंत चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी है.
पेट दर्द और कब्ज में सीमित प्रयोग: लोक चिकित्सा में इसकी पत्तियों का काढ़ा बहुत सीमित मात्रा में पेट दर्द और कब्ज जैसी समस्याओं के लिए उपयोग किया जाता था. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी मात्रा गलत होने पर नुकसान हो सकता है, इसलिए स्वयं इसका सेवन नहीं करना चाहिए.
खेती और पर्यावरण में भी उपयोगी: रतनजोत केवल औषधीय पौधा नहीं है. कई स्थानों पर इसे खेतों की मेड़ पर लगाया जाता है. इसकी मजबूत जड़ें मिट्टी के कटाव को कम करने में सहायक मानी जाती हैं. कुछ क्षेत्रों में इसके बीज से जैव ईंधन पर भी शोध किया गया है.
सबसे जरूरी बात: वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि यह पौधा विषैला है रतनजोत के हरे बीज और फल सबसे अधिक जहरीले माने जाते हैं. इनके सेवन से उल्टी, दस्त, पेट में तेज दर्द और शरीर में पानी की कमी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. बच्चों और पशुओं के लिए भी इसके बीज नुकसानदायक हो सकते हैं.
चेतावनी: वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति बताते हैं कि रतनजोत का आंतरिक सेवन कभी भी बिना योग्य आयुर्वेद चिकित्सक या डॉक्टर की सलाह के न करें. किसी भी बीमारी में इसे घरेलू दवा समझकर उपयोग करना सुरक्षित नहीं है. यदि आपके खेत या आसपास रतनजोत का पौधा है तो इसकी सही पहचान रखें. औषधीय गुण होने के बावजूद यह पूरी तरह सुरक्षित पौधा नहीं है. इसलिए बाहरी उपयोग भी विशेषज्ञ की सलाह से ही करें और इसके बीज बच्चों की पहुंच से दूर रखें.
