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Delhi Satya Niketan PG Collapse News: सत्य निकेतन में पांच मंजिला हॉस्टल की इमारत गिरने के बाद छात्रों में डर का माहौल है. हादसे में कम से कम सात लोगों की मौत के बाद कई छात्र अपने कमरे खाली कर घर लौट रहे हैं. कुछ दोस्त या रिश्तेदारों के यहां जा रहे हैं. बुलंदशहर से दिल्ली पढ़ने आए उन्नयन भाटी ने भी तय किया है कि अब वह सत्य निकेतन में नहीं रहेगा. हादसे के समय वह उसी इलाके में हॉस्टल देखने जा रहा था. दूसरी ओर कई छात्र पैसे की वजह से इलाका छोड़ नहीं पा रहे हैं. नया पीजी लेने के लिए दोबारा किराया और सिक्योरिटी जमा करनी होगी. इस खबर में पढ़िए कैसे छात्रों के बीच डर का माहौल है और कैसे वह कशमकश में फंसे हुए हैं.
सत्य निकेतन में हॉस्टल डेज हादसे के बाद छात्रों में डर बढ़ गया है. (फोटो PTI)
दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत गिरने के बाद वहां रहने वाले छात्रों के लिए कमरा अब सिर्फ कमरा नहीं रह गया है. वही गलियां, वही पीजी और वही इमारतें अब डराने लगी हैं. कुछ छात्र बैग पैक कर घर लौट रहे हैं. कुछ दोस्तों और रिश्तेदारों के यहां शिफ्ट हो रहे हैं. और कुछ ऐसे भी हैं, जो जाना तो चाहते हैं, लेकिन जेब इसकी इजाजत नहीं देती. बुलंदशहर से दिल्ली पढ़ने आए 18 साल के उन्नयन भाटी के लिए भी यही कहानी है. वह आर्यभट्ट कॉलेज में दाखिले के बाद सत्य निकेतन में रहने लगा था. किराया ज्यादा था. बिजली के 15 रुपए प्रति यूनिट का खर्च अलग था. इसलिए वह करीब एक महीने से नया ठिकाना खोज रहा था. लेकिन रविवार को जो उसने अपनी आंखों के सामने देखा, उसके बाद उसने तय कर लिया कि अब सत्य निकेतन में नहीं रहना है.
हादसे के बाद छात्रों में डर, कई ने खाली किए कमरे
- सत्य निकेतन और आसपास रहने वाले कई छात्रों ने अपना सामान समेटना शुरू कर दिया है. कुछ घर जा रहे हैं. कुछ फिलहाल दोस्तों या रिश्तेदारों के यहां ठहर रहे हैं. हादसे वाली इमारत के आसपास की कुछ बिल्डिंग भी खाली करा दी गई हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी ने छात्रों से संपर्क कर उन्हें अस्थायी रहने की व्यवस्था देने की पेशकश की है.
- उन्नयन अकेला ऐसा छात्र नहीं है, जिसका भरोसा इस इलाके से उठ गया है. अरुणाचल प्रदेश की 18 साल की छात्रा करीब एक साल तक हॉस्टल में रही थी. वह चौथी मंजिल पर डबल शेयरिंग कमरे के लिए 17 हजार रुपए महीना देती थी. उसके मुताबिक कमरे में बारिश का पानी रिसता था. उसे छत वाला कमरा देने का वादा किया गया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. खाने की क्वालिटी को लेकर भी वह परेशान थी. आखिरकार उसने जून में कमरा छोड़ दिया. अब वह हादसे वाली इमारत के सामने दूसरी बिल्डिंग में रह रही है. उसका सिक्योरिटी डिपॉजिट भी अब तक वापस नहीं मिला है. घर लौटने के लिए उसके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं.
- 19 साल की ईशा बिस्वास की कहानी भी इस हादसे से जुड़ी है. वह सोमवार को अपनी रूममेट्स के साथ राहत और बचाव अभियान देख रही थी. मलबे की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा, ‘यहीं मैं पहले रहती थी.’ उसने बढ़ते किराए की वजह से हॉस्टल डेज छोड़ दिया था. अब वह शांति निकेतन की चौथी गली में एक पीजी में रह रही है. उसका कोर्स खत्म होने में सिर्फ एक साल बचा है. इसलिए वह इलाका छोड़ना नहीं चाहती. उसे उम्मीद है कि पीजी के मालिक उसकी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करेंगे.
सत्य निकेतन और आसपास रहने वाले कई छात्रों ने अपना सामान समेटना शुरू कर दिया है. (PTI)
कॉलेज हॉस्टल महंगा, पीजी चुनने का फैसला अब पड़ रहा भारी
मैत्रेयी कॉलेज की छात्रा कनिष्का मौर्या ने भी कॉलेज की सुविधा के बजाय सत्य निकेतन में पीजी चुना था. कॉलेज हॉस्टल की सालाना फीस करीब 1.80 लाख रुपए थी. इसके अलावा 90 हजार रुपए का फिक्स्ड डिपॉजिट भी देना था. हॉस्टल में सीटें भी सीमित थीं. ऐसे में पीजी ज्यादा आसान विकल्प लगा. लेकिन अब हादसे के बाद वह अपने फैसले पर दोबारा सोच रही है.
हादसे से एक दिन पहले आई थी, अब समझ नहीं आ रहा आगे क्या करे
राजस्थान की रहने वाली प्रिया चौधरी शनिवार को ही सत्य निकेतन के स्टूडेंट हब पीजी में रहने आई थी. यानी हादसे से ठीक एक दिन पहले. अगले ही दिन इलाके में पांच मंजिला इमारत के गिरने की खबर ने उसकी पूरी प्लानिंग बदल दी. अब वह खुद भी असमंजस में है कि यहां रहे या किसी दूसरी जगह चली जाए.
बिजली गई, शोर सुनाई दिया तो बाहर भागी छात्रा
- आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज की 19 साल की आस्था कुमारी हादसे के समय अपने पीजी में खाना खा रही थी. अचानक बिजली चली गई. शुरुआत में उसे कुछ असामान्य नहीं लगा, क्योंकि इलाके में बिजली कटना आम बात है. फिर बाहर से लोगों के चिल्लाने की आवाज आने लगी. वह तुरंत बाहर निकली. उसका पीजी हॉस्टल हादसे वाली जगह से करीब दो गलियां दूर है. वार्डन ने भी व्हाट्सऐप ग्रुप में छात्रों को कुछ देर बाहर रहने के लिए कहा था.
- आस्था ने बताया कि उसने मलबे से पांच लोगों को बाहर ले जाते देखा. उसके लिए वह पल बेहद डरावना था. वह अब यह इलाका छोड़ना चाहती है. लेकिन उसके सामने भी वही पुरानी परेशानी है. नया कमरा लेने के लिए दोबारा सिक्योरिटी और किराया देना होगा. उसके माता-पिता पहले ही इस महीने का किराया दे चुके हैं. अगर पुराना पैसा वापस नहीं मिला तो उसके सामने पढ़ाई छोड़ने तक की नौबत आ सकती है.
छात्रों के सामने सुरक्षा के साथ पैसों की भी बड़ी चुनौती
सत्य निकेतन हादसे के बाद छात्रों की परेशानी सिर्फ डर तक सीमित नहीं है. असली संकट यह है कि वे जाएं तो जाएं कहां. नया पीजी मतलब नया एडवांस. नई सिक्योरिटी. नया किराया. कई छात्रों के परिवार इतनी जल्दी दोबारा खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं. यही वजह है कि कुछ छात्र डर के बावजूद आसपास ही रहने को मजबूर हैं. हादसे ने उनके भरोसे को जरूर हिला दिया है, लेकिन पढ़ाई, किराया और सीमित बजट उन्हें फैसले लेने में उलझा रहा है. फिलहाल कई छात्र सुरक्षित जगह तलाश रहे हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी की अस्थायी आवास व्यवस्था की पेशकश से उन्हें कुछ राहत मिलने की उम्मीद है.
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सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 4 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह…
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