Noida protest NSA, DM Noida: नोएडा की एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA लगाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सिर्फ आकृति चौधरी के लिए राहत तक सीमित नहीं है. इस आदेश का एक अहम हिस्सा गौतम बुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी और IAS अधिकारी मेधा रूपम से भी जुड़ा है. अदालत ने NSA के तहत जारी हिरासत आदेश को रद्द करने के साथ 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है और यह रकम मेधा रूपम समेत उन अधिकारियों के वेतन से वसूलने को कहा है, जिन्हें इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार पाया गया है. साथ ही कोर्ट ने डीएम और मामले से जुड़े पुलिस अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का निर्देश दिया है.
यहीं से बड़ा सवाल उठता है कि क्या इस फैसले के बाद मेधा रूपम के IAS करियर पर कोई सीधा असर पड़ेगा? क्या उनकी सैलरी कम होगी? क्या प्रमोशन रुक सकता है? क्या यह उनके सर्विस रिकॉर्ड में ऐसा दाग बन जाएगा जो आगे चलकर करियर को प्रभावित करेगा? और क्या UPSC इस मामले में कोई कार्रवाई करेगा? इन सवालों का जवाब समझने के लिए हाईकोर्ट के आदेश और IAS अधिकारियों पर लागू सर्विस नियमों को अलग-अलग समझना जरूरी है.
हाईकोर्ट ने मेधा रूपम के बारे में क्या कहा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द करते हुए कहा कि हिरासत का आदेश पर्याप्त सामग्री के बिना और बिना उचित तरीके से मामले पर विचार किए पारित किया गया था.कोर्ट ने डीएम के आचरण पर बेहद कड़ी टिप्पणी की और कहा कि उनके आचरण पर अदालत की नाराजगी दर्ज की जानी चाहिए.अदालत ने यह भी कहा कि डीएम को पुलिस की रिपोर्ट में मौजूद सामग्री को बारीकी से जांचना चाहिए था और सिर्फ आरोपों के आधार पर NSA जैसे कड़े कानून का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए था. कोर्ट के आदेश के मुताबिक डीएम का आचरण ‘worthy of derision’ यानी बेहद गंभीर आलोचना के योग्य पाया गया. अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ.सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने 5 लाख रुपये के मुआवजे की वसूली मेधा रूपम और इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से करने का आदेश दिया है यानी यह केवल सरकार के खजाने से मुआवजा देने वाला सामान्य आदेश नहीं है, बल्कि अदालत ने व्यक्तिगत जवाबदेही की दिशा में भी कदम उठाया है हालांकि उपलब्ध आदेश के अनुसार पूरी 5 लाख रुपये की रकम अकेले मेधा रूपम से ही काटी जाएगी ऐसा कहना सही नहीं होगा.आदेश में डीएम से लेकर अन्य जिम्मेदार अधिकारियों तक वेतन से वसूली की बात है.
मेधा रूपम की IAS नौकरी पर खतरा है?
नहीं, सिर्फ इस हाईकोर्ट के आदेश से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि मेधा रूपम की IAS नौकरी खतरे में है.यहां एक बेहद जरूरी कानूनी अंतर समझना होगा. अदालत का किसी अधिकारी के किसी फैसले पर कड़ा प्रतिकूल निष्कर्ष देना एक बात है और उस अधिकारी के खिलाफ अलग से विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई चलाकर कोई दंड देना दूसरी बात.ऑल इंडिया सर्विसेज यानी IAS, IPS और भारतीय वन सेवा के अधिकारियों पर All India Services (Discipline and Appeal) Rules, 1969 लागू होते हैं.इन नियमों में किसी अधिकारी पर दंड लगाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया है. नियम 6 में छोटे और बड़े दंडों की पूरी सूची दी गई है इनमें निंदा, प्रमोशन रोकना, वेतन से वसूली, वेतन वृद्धि रोकना जैसे छोटे दंड शामिल हैं. गंभीर मामलों में वेतनमान या पद में कमी, अनिवार्य सेवानिवृत्ति, सेवा से हटाना और बर्खास्तगी जैसे बड़े दंड भी हो सकते हैं.इसलिए यह कहना कि हाईकोर्ट ने टिप्पणी की और अब मेधा रूपम का प्रमोशन अपने आप रुक जाएगा नियमों के हिसाब से सही नहीं होगा.
सर्विस रिकॉर्ड में नाराजगी दर्ज होने का मतलब क्या है?
यही इस मामले का सबसे अहम हिस्सा है.हाईकोर्ट ने साफ तौर पर निर्देश दिया है कि अदालत की नाराजगी डीएम और संबंधित पुलिस अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज की जाए.इसका मतलब यह है कि यह टिप्पणी महज अखबार में छपी खबर बनकर खत्म नहीं होगी. अदालत ने खुद निर्देश दिया है कि इसे अधिकारी के आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए.IAS अधिकारियों के करियर में सर्विस रिकॉर्ड और परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट (Performance Appraisal Report)यानी PAR काफी महत्वपूर्ण होते हैं. DoPT के नियमों के अनुसार IAS अधिकारियों की वार्षिक परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट में उनके काम, विभिन्न गुणों और इंटेग्रिटी (integrity)से संबंधित आकलन दर्ज होता है. अधिकारी को उस पर अपनी आपत्ति या प्रतिनिधित्व देने का भी अधिकार होता है इसलिए सर्विस रिकॉर्ड में कोर्ट की नाराजगी दर्ज होना निश्चित रूप से एक गंभीर प्रशासनिक रिकॉर्ड है लेकिन इसे सीधे-सीधे कोई दंड मान लेना भी सही नहीं होगा. यह एक निर्धारित विभागीय पेनाल्टी है जबकि हाईकोर्ट ने यहां अदालत की डिसप्लेजर को रिकॉर्ड करने का निर्देश दिया है.
इसे IAS के करियर पर ‘दाग’ कहा जा सकता है?
इसे करियर पर गंभीर टिप्पणी कहा जा सकता है, लेकिन कानूनी और सेवा नियमों की भाषा में इसे अभी सीधे दंड कहना जल्दबाजी होगी.अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर भविष्य में सरकार इस मामले को लेकर अलग से विभागीय कार्रवाई शुरू करती है और कोई पेनाल्टी लगती है तब उसका प्रभाव नियमों के अनुसार तय होगा.अभी उपलब्ध हाईकोर्ट आदेश के आधार पर इतना साफ है कि अदालत ने मेधा रूपम के आचरण पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है उसे सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का आदेश दिया है और मुआवजे की रकम जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया है.
क्या उनकी सैलरी घट जाएगी?
यहां भी दो अलग बातें हैं.पहली 5 लाख रुपये के मुआवजे की वसूली वेतन से होना अदालत के मौजूदा आदेश का सीधा वित्तीय प्रभाव है यानी आदेश के अनुसार जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से यह रकम वसूली जानी है.दूसरी बात है वेतनमान या भविष्य की सैलरी में स्थायी कमी. ऐसा अपने आप नहीं होता.ऑल इंडिया सर्विसेज (Discipline and Appeal)रूल्स में वेतन वृद्धि रोकना और वेतनमान में कमी जैसे दंड अलग-अलग निर्धारित हैं लेकिन ऐसे दंड तभी लागू होते हैं जब संबंधित नियमों के तहत अनुशासनात्मक प्रक्रिया के बाद सक्षम प्राधिकारी ऐसा दंड लगाए इसलिए 5 लाख रुपये की वसूली को यह कहना कि मेधा रूपम की IAS सैलरी कम कर दी गई है,सही नहीं होगा. यह मुआवजे की वसूली है.स्थायी वेतन कटौती या वेतनमान घटाने का दंड नहीं जब तक अलग से कोई अनुशासनात्मक आदेश ऐसा न हो.
क्या प्रमोशन पर असर पड़ सकता है?
संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता, लेकिन अभी यह कहना भी गलत होगा कि उनका प्रमोशन रुक गया है.IAS अधिकारियों की पदोन्नति में सेवा रिकॉर्ड और विजिलेंस क्लियरेंस महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. DoPT के नियमों में यह व्यवस्था है कि प्रमोशन लागू करने से पहले विजिलेंस एंगल से क्लियरेंस उपलब्ध होनी चाहिए और लंबित डिसिप्लिनरी प्रोसेडिंग्स या कुछ परिस्थितियों में कोर्ट प्रोसेडिंग्स होने पर प्रमोशन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है लेकिन यहां फिर वही फर्क जरूरी है-हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणी अपने आप प्रमोशन रोकने का आदेश नहीं है.
प्रमोशन के समय यह रिकॉर्ड देखा जा सकता है?
IAS अधिकारियों के करियर में केवल वर्तमान पोस्ट ही नहीं, बल्कि उनके सेवा रिकॉर्ड, परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्टस और विजिलेंस/डिसिप्लिनरी स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है इसलिए कोर्ट की नाराजगी का रिकॉर्ड में होना भविष्य में संबंधित प्रशासनिक मूल्यांकन के समय प्रासंगिक हो सकता है लेकिन इसका असर कितना होगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे इस मामले में क्या होता है? यदि कोई विभागीय कार्रवाई शुरू होती है आरोप तय होते हैं और अंत में कोई दंड लगाया जाता है तो प्रभाव ज्यादा स्पष्ट हो सकता है. दूसरी तरफ यदि कोई अलग विभागीय पेनाल्टी नहीं लगती तो सिर्फ अदालत की टिप्पणी को अपने आप प्रमोशन रोकने वाली सजा मानना उचित नहीं होगा.
IAS मेधा रूपम कौन हैं?
आईएएस मेधा रूपम उत्तर प्रदेश कैडर की 2014 बैच की आईएएस अधिकारी हैं. उनका जन्म 21 अक्टूबर 1990 को आगरा में हुआ.उनकी शुरुआती पढ़ाई केरल के नेवल पब्लिक स्कूल, एर्नाकुलम और सेंट थॉमस स्कूल तिरुवनंतपुरम से हुई.इसके बाद उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इकोनॉमिक्स में बीए ऑनर्स किया.सिविल सेवा परीक्षा 2013 में उन्होंने ऑल इंडिया 10वीं रैंक हासिल की.मेधा रूपम पढ़ाई के साथ खेलों में भी सक्रिय रही हैं. उन्होंने केरल स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेकर तीन स्वर्ण पदक जीते थे. इस उपलब्धि से उन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली.
कई जिलों में निभा चुकी हैं जिम्मेदारी
मेधा रूपम, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं, लेकिन प्रशासनिक सेवा में उन्होंने अपनी पहचान अपने काम के जरिए बनाई है. उन्होंने मेरठ, बागपत, हापुड़ और कासगंज जैसे जिलों में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाली हैं.29 जुलाई 2025 से वह गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी के पद पर कार्यरत हैं.वह गौतम बुद्ध नगर की पहली महिला जिलाधिकारी भी हैं.
