मेरा नाम आदित्य आनंद है. मैं मूल रूप से बिहार के पूर्णिया का रहने वाला हूं और मेरी उम्र 25 साल है.मैंने इसी साल दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस से एमए पूरा किया है. अभी आगे की पढ़ाई भी यहीं से करनी है इसलिए मैं दिल्ली में पीजी में रह रहा हूं.सत्य निकेतन में जो घटना हुई है उससे दिल्ली में रहकर पढ़ाई करने वाले लगभग सभी छात्र दुखी और आहत हैं. मेरे जैसे बहुत से छात्र पीजी में रहकर पढ़ाई करते हैं और ऐसी घटनाएं हमारे लिए चिंता की बात हैं. खासकर इसलिए क्योंकि 2022 में भी इस तरह की घटना हुई थी और अब एक बार फिर ऐसी घटना सामने आई है.”
मैंने सत्य निकेतन और आसपास के इलाकों में देखा है कि बहुत सारे मकान जर्जर अवस्था में हैं. अगर समय रहते एमसीडी और शासन की तरफ से इन मकानों को लेकर कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में भी ऐसी घटना का खतरा बना रहेगा.अभी जो जानकारी सामने आ रही है उसमें हमारे कई भाई इस हादसे में जान गंवा चुके हैं. कुल सात लोगों की मौत की बात सामने आई है. यह भी पता नहीं कि मलबे में और कोई व्यक्ति फंसा है या नहीं. ऐसे समय में सबसे पहले उन परिवारों के बारे में सोचना चाहिए जिन्होंने अपने लोगों को खोया है.
मेरी मांग है कि जिन लोगों की मौत हुई है उनके परिवारों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए और इसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए. मेरा मानना है कि मकान मालिकों की भी जिम्मेदारी बनती है. अगर किसी मकान की हालत जर्जर है और उसे इस बारे में नोटिस भी मिला हुआ है तो उसमें छात्रों को पीजी के तौर पर रखना ठीक नहीं है.
सत्य निकेतन में पीजी का किराया एक जैसा नहीं है. अलग-अलग मकानों और सुविधाओं के हिसाब से किराया अलग है. कहीं एक आरके का किराया करीब 33 हजार रुपये बताया जाता है तो कहीं 20 हजार रुपये के आसपास है. कुछ जगह एक कमरे में तीन बेड होते हैं और उसका किराया करीब 15 हजार रुपये तक बताया जाता है.
एक बेड का किराया भी जगह और सुविधा के हिसाब से अलग-अलग है. कहीं 15 से 20 हजार रुपये तो कहीं 20 से 25 हजार रुपये तक किराया है. कुछ जगह डबल शेयरिंग के लिए 45 से 50 हजार रुपये या उससे ज्यादा भी लिया जा रहा है. वहां अलग-अलग पीजी के रेट चार्ट लगे हुए हैं और हर मकान मालिक अपनी दी जाने वाली सुविधाओं के हिसाब से किराया तय करता है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास पीजी में रहने की सबसे बड़ी वजह यही है कि कॉलेज नजदीक होता है. सत्य निकेतन में रहने वाले बहुत से छात्रों के कॉलेज आसपास हैं. ऐसे में आने-जाने का खर्च बहुत ज्यादा नहीं होता. कई बार कॉलेज आने-जाने में सिर्फ 10-20 रुपये ही लगते हैं यानी अगर कोई छात्र कॉलेज से बहुत दूर रहेगा तो उसे किराए के अलावा रोज आने-जाने का खर्च भी उठाना पड़ेगा इसलिए छात्र मजबूरी में कॉलेज के पास पीजी तलाशते हैं और इसके लिए ज्यादा किराया भी देने को तैयार हो जाते हैं.
मेरी नजर में एक बड़ी समस्या यह भी है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले सभी छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल नहीं हैं. कॉलेज के आसपास रहने की सुविधा नहीं होगी तो छात्र कहां जाएंगे? इसलिए सरकार को इस दिशा में भी गंभीरता से काम करना चाहिए.अगर छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल की व्यवस्था हो जाए तो उन्हें महंगे पीजी में रहने की मजबूरी काफी हद तक कम हो सकती है. कॉलेज के पास रहने के लिए छात्र पीजी में इसलिए जाते हैं क्योंकि उनके पास दूसरा आसान विकल्प नहीं होता.
मेरी एक और बात है. अभी कुछ लोग सरकार से कार्रवाई की मांग कर रहे हैं और जर्जर मकानों पर बुलडोजर कार्रवाई की बात कर रहे हैं. सरकार को निश्चित तौर पर नियमों के मुताबिक कार्रवाई करनी चाहिए लेकिन हमें अपनी जिम्मेदारी भी समझनी होगी.
अगर हमारा अपना मकान जर्जर है तो सबसे पहले हमें खुद सोचना चाहिए कि हम उस मकान में बच्चों को क्यों रख रहे हैं. सिर्फ सरकार को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है. मकान मालिक की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि वह यह देखे कि जिस जगह छात्रों को रखा जा रहा है? वह रहने के लायक है या नहीं? अगर कोई मकान रहने के लिए सुरक्षित नहीं है तो उसमें छात्रों को पीजी के तौर पर रखना ही नहीं चाहिए. सरकार की जिम्मेदारी अपनी जगह है लेकिन मकान मालिकों और हम सबकी भी अपनी जिम्मेदारी है.
मेरी चिंता यही है कि 2022 में ऐसी घटना होने के बाद भी अगर हम सबक नहीं लेते हैं और जर्जर मकानों में छात्रों को रखते रहते हैं तो भविष्य में फिर ऐसी घटना हो सकती है इसलिए अभी से ऐसे मकानों की पहचान होनी चाहिए और छात्रों की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखना चाहिए.
(इनपुट सहयोग: अंजलि सिंह)
