गाजियाबाद की मंजू नयाल एशियन गेम्स 2026 जापान में बनेंगी रेफरी, बनीं भारत की पहली महिला, जानें उनके संघर्ष

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गाजियाबाद की बेटी मंजू नयाल अब उसी खेल में खिलाड़ियों के भविष्य का फैसला करेंगी. खिलाड़ी से कोच और फिर इंटरनेशनल रेफरी तक का सफर तय करने वाली मंजू नयाल जापान के आइची-नागोया में होने वाले एशियन गेम्स-2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी. कुश्ती और मार्शल आर्ट से जुड़े खेल कुराश में वह इंटरनेशनल टेक्निकल ऑफिशियल यानी रेफरी की भूमिका निभाएंगी खास बात यह है कि वह इस उपलब्धि तक पहुंचने वाली भारत की पहली महिला रेफरी हैं

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गाजियाबादः कभी खुद मैट पर उतरकर जीत का सपना देखने वाली गाजियाबाद की बेटी मंजू नयाल अब उसी खेल में खिलाड़ियों के भविष्य का फैसला करेंगी. खिलाड़ी से कोच और फिर इंटरनेशनल रेफरी तक का सफर तय करने वाली मंजू नयाल जापान के आइची-नागोया में होने वाले एशियन गेम्स-2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी. कुश्ती और मार्शल आर्ट से जुड़े खेल कुराश में वह इंटरनेशनल टेक्निकल ऑफिशियल यानी रेफरी की भूमिका निभाएंगी खास बात यह है कि वह इस उपलब्धि तक पहुंचने वाली भारत की पहली महिला रेफरी हैं. वर्तमान में वह डासना स्थित गुरुकुल द स्कूल में फिजिकल एजुकेशन कोऑर्डिनेटर के पद पर कार्यरत हैं.

खेल की बारीकी को समझ बनीं थ्री स्टार रेफरी

मंजू का खेल से रिश्ता खिलाड़ी के तौर पर शुरू हुआ उन्होंने जूडो से अपने खेल करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे कोचिंग की ओर बढ़ीं कोच बनने के बाद खेल की बारीकियों और खिलाड़ियों के प्रदर्शन को करीब से समझते हुए उनका रुझान रेफरिंग की तरफ हुआ मेहनत और अनुभव के दम पर आज वह कुराश में थ्री-स्टार रेफरी हैं. अब एशियन गेम्स जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की ओर से जिम्मेदारी निभाना उनके लिए गर्व का क्षण है. एशियन गेम्स में रेफरी की जिम्मेदारी को लेकर मंजू ने बताया कि यह भूमिका बेहद महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण है. खिलाड़ियों ने कितना अच्छा प्रदर्शन किया किस तकनीक पर कितना स्कोर मिलना चाहिए और किसका प्रदर्शन कितना प्रभावी रहा इन सबका निष्पक्ष फैसला रेफरी को करना होता है. उनका कहना है कि खिलाड़ियों का भविष्य रेफरी के जजमेंट से जुड़ा होता है इसलिए जापान में उनकी कोशिश पूरी ईमानदारी और सही निर्णय के साथ ऑफिशिएटिंग करने की रहेगी.

परिवार की मदद ने यहां तक पहुंचाया

इस मुकाम तक पहुंचने में परिवार का साथ भी मंजू की सबसे बड़ी ताकत रहा. पति, दो बेटियां और सास ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया चयन की खबर मिलने पर घर में खुशी का माहौल था वही स्कूल में भी साथियों ने उन्हें बधाई दी मंजू मानती हैं कि परिवार का सहयोग नहीं मिलता तो शायद वह यहां तक नहीं पहुंच पातीं. मंजू खुद एक मां हैं और उनकी बड़ी बेटी भी कुराश की नेशनल खिलाड़ी है. यही वजह है कि उनके लिए खेल सिर्फ नौकरी या जिम्मेदारी नहीं बल्कि परिवार का हिस्सा भी है. घर में बेटी के साथ वह सिर्फ मां रहती हैं स्कूल में बेटी उन्हें ‘मैम’ कहती है और टूर्नामेंट में वही बेटी उन्हें रेफरी के रूप में देखती है. मंजू के मुताबिक उनके रिश्ते के ये तीन अलग रूप हैं.

21 सितंबर को रवाना होंगी जापान

जापान रवाना होने से पहले मंजू उत्साहित होने के साथ जिम्मेदारी का दबाव भी महसूस कर रही हैं. वह 21 सितंबर को जापान के लिए रवाना होंगी और एक अक्टूबर को लौटेंगी. उनका संदेश साफ है बेटियों को लोगों की नकारात्मक बातों से डरकर अपने सपने नहीं छोड़ने चाहिए. परिवार साथ हो तो बाहरी लोगों की बातों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ना चाहिए. वह अभिभावकों से भी बेटियों के साथ बेटों को खेलों से जोड़ने की अपील करती हैं. उनके मुताबिक पढ़ाई जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी खेल है क्योंकि खेल बच्चों को फिट, स्वस्थ और आत्मविश्वासी बनाता है.

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Rajneesh Kumar Yadav

Rajnish Kumar Yadav is a digital journalist and content publisher with over seven years of experience in print and digital media. He is currently working with News18 Digital (Local18) as a Content Publisher, wh…

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