नई दिल्ली: राजधानी की सड़कों पर पसरे अंधेरे और डार्क स्पॉट्स से अब लोगों को निजात मिलने वाली है. दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग यानी PWD ने शहर के पूरे स्ट्रीट लाइट नेटवर्क को हाईटेक और स्मार्ट बनाने का बहुत बड़ा खाका खींच लिया है. PWD मंत्री परवेश साहिब सिंह ने इस मेगा प्रोजेक्ट का ऐलान करते हुए साफ किया है कि आने वाले त्योहारों से पहले शहर का बुनियादी ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा. इस योजना के पहले चरण के तहत दिवाली तक दिल्ली के प्रमुख इलाकों में 20 हजार पुरानी और बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों को हटाकर उनकी जगह स्मार्ट LED लाइटें लगाई जाएंगी. इसके बाद जनवरी महीने तक इस आंकड़े को 1 लाख तक पहुंचाने का कड़ा लक्ष्य निर्धारित किया गया है, ताकि राजधानी का कोई भी कोना अंधेरे में न रहे.
बिना शिकायत किए कैसे ठीक हो जाएगी खराब बत्ती?
पहले के पारंपरिक सिस्टम में जब कोई स्ट्रीट लाइट खराब होती थी, तब नागरिकों को PWD दफ्तर में कॉल करके या पोर्टल पर जाकर शिकायत दर्ज करानी पड़ती थी. कई बार शिकायत दर्ज होने के हफ्तों बाद तक तकनीकी टीम मौके पर नहीं पहुंच पाती थी. अब इस पूरी लाचार व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने की तैयारी कर ली गई है.
रिमोट से कंट्रोल होंगी दिल्ली की सड़कें
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन सभी स्मार्ट LED लाइटों को रिमोट से ऑपरेट और कंट्रोल करने की सुविधा दी जा रही है. मौसम में बदलाव, अचानक आए घने कोहरे या दिन ढलते ही जरूरत के हिसाब से लाइटों की चमक को कंट्रोल सेंटर से ही कम या ज्यादा किया जा सकेगा. इसके अलावा अगर किसी इलाके में कोई आपात स्थिति बनती है, तो वहां की लाइटों को मुख्यालय से ही तुरंत मैनेज किया जा सकेगा. तकनीक के इस जबर्दस्त इस्तेमाल से फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों की मनमानी पर पूरी तरह लगाम लगेगी और पूरा नेटवर्क ऑटोमेटेड तरीके से काम करेगा.
कैसे होगी सालाना 30 करोड़ रुपये के सरकारी खजाने की बचत?
सड़कों पर पहले से लगी पुरानी और पारंपरिक सोडियम लाइटें बहुत ज्यादा बिजली की खपत करती थीं, जिसके कारण सरकार पर हर महीने बिजली बिल का भारी बोझ पड़ता था. अब ऊर्जा संरक्षण को ध्यान में रखते हुए एनर्जी एफिशिएंट स्मार्ट LED लगाई जा रही हैं.
अधिकारियों के एनालिसिस के मुताबिक, इस कदम से बिजली बिल और बार-बार होने वाले मेंटेनेंस खर्च में सालाना करीब 30 करोड़ रुपये की सीधी बचत होगी. यह बचत आने वाले सालों में प्रोजेक्ट की लागत को खुद-ब-खुद पूरा करने में मदद करेगी. इसके साथ ही कार्बन फुटप्रिंट में भी बड़ी कमी आएगी.
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