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गाजियाबाद के घंटाघर इलाके में न कोई चमकता बोर्ड है, न ही दुकान का कोई तड़क-भड़क वाला नाम, पहचान है तो बस कड़ाही से उठती सौंधी खुशबू और 60 साल पुराना बेमिसाल जायका. मनोहर टॉकीज के पास स्थित यह बेनाम दुकान आज भी अपने काले मसालेदार छोले और अनोखी पालक चटनी के दम पर पीढ़ियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है.
गाजियाबाद शहर में छोले-भटूरे की कई दुकानें अपने नाम और बोर्ड से पहचानी जाती हैं, लेकिन घंटाघर के सामने मनोहर टॉकीज बिल्डिंग के पास एक ऐसी दुकान है जिसकी कोई पहचान ही नहीं है. न कोई बड़ा बोर्ड, न दुकान का कोई खास नाम. इसके बावजूद करीब 60 साल से लोग यहां छोले-भटूरे खाने पहुंच रहे हैं. काले रंग के मसालेदार छोले, गरमागरम भटूरे और पालक, सोयाबीन व आलू से तैयार होने वाली खास चटनी इस बेनाम दुकान की पहचान बन चुकी है.
मसालों का सटीक संतुलन और हाथों का हुनर
इस दुकान पर छोले तैयार करने का काम सुबह से ही शुरू हो जाता है. पुराने तरीके से तैयार किए जाने वाले इन छोलों का रंग सामान्य छोले-भटूरे की दुकानों से अलग दिखाई देता है. छोलों का यह रंग किसी सीक्रेट मसाले की वजह से नहीं, बल्कि मसालों के सही इस्तेमाल से आता है. दुकान में इस्तेमाल होने वाले मसाले सामान्य ही हैं, लेकिन उन्हें किस मात्रा में और किस तरीके से इस्तेमाल करना है, यह वर्षों के अनुभव से तय होता है. सबसे खास बात यह है कि छोले सुबह दुकान पर ही अपने हाथों से तैयार किए जाते हैं.
पारंपरिक लाल चटनी की जगह खास पालक की चटनी
छोलों के साथ परोसी जाने वाली चटनी भी यहां के स्वाद को अलग बनाती है. आमतौर पर छोले-भटूरे के साथ लाल चटनी देखने को मिलती है, लेकिन यहां पालक की चटनी परोसी जाती है. इसमें पालक के साथ सोयाबीन और आलू का इस्तेमाल किया जाता है. इसके साथ प्याज और दूसरी चीजें भी प्लेट में मिलती हैं. पुराने समय से चली आ रही यही रेसिपी आज भी बरकरार है.
35 पैसे की प्लेट से 100 रुपये तक… रेहड़ी से पक्की दुकान का सफर
इस दुकान की कहानी सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है. करीब छह दशक पहले अमरजीत सिंह के पिता ने इसकी शुरुआत की थी. उस समय दुकान की जगह सामने रेहड़ी लगाकर छोले-भटूरे बेचे जाते थे. बाद में करीब 1970 में मौजूदा जगह पर दुकान शुरू हुई. अमरजीत ने बताया कि उनके पिता ने जब छोले-भटूरे शुरू किए थे, तब एक प्लेट की कीमत महज 35 पैसे थी. आज यही प्लेट 80 से 100 रुपये तक बिकती है.
पांच भाइयों की एकजुटता और ग्राहकों का अटूट भरोसा
दुकान की सबसे खास बात यह है कि इसे पांच भाई मिलकर चलाते हैं. पांचों भाइयों ने काम संभाल रखा है और इसी दुकान से उनके पांच परिवारों का घर चलता है. अमरजीत कहते हैं कि उनकी दुकान को किसी नाम की जरूरत नहीं है, ग्राहकों का प्यार ही इसकी पहचान है. जो व्यक्ति एक बार यहां का स्वाद चख लेता है, वह दोबारा खुद ही यहां पहुंच जाता है. यही वजह है कि यह बेनाम दुकान छह दशक बाद भी पुराने स्वाद के साथ अपनी पहचान बनाए हुए है.
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Rahul Goel is a senior journalist with over 15 years of experience in print and digital media. He currently serves as a Coordinator and Publisher at News18 Hindi, managing State and Local18 content operations a…
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