महज सात साल की उम्र में यौन हिंसा का शिकार हुई एक बच्ची ने अदालत के सामने अपनी पीड़ा को बेहद मासूम शब्दों में रखा था. उसने कोर्ट से कहा था कि जिस शख्स को वह ‘अंकल’ कहती थी, उसे तब तक जेल में रखा जाए, जब तक वह बूढ़ा न हो जाए. बच्ची की इस बात को ट्रायल कोर्ट की जज ने न सिर्फ सुना, बल्कि अपने फैसले में उसे सीधे संबोधित करते हुए एक ऐसा संदेश लिखा, जिसमें कानून की औपचारिक भाषा के बजाय एक संवेदनशील इंसान की आवाज सुनाई दी.
अब दिल्ली हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि ट्रायल कोर्ट की ओर से बच्ची के लिए लिखा गया यह संदेश उसके परिवार तक जरूर पहुंचाया जाए. इसके साथ ही उसे तय मुआवजे की रकम भी दी जाए.
‘बेटा, कोर्ट ने तुम्हारी बात सुनी…’
एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, रोहिणी स्थित POCSO कोर्ट की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राजिनी रंगा ने अपने फैसले के अंत में बच्ची को संबोधित करते हुए लिखा कि उसने कोर्ट में जो मांग रखी थी, उसे सुना गया है और उसका जवाब भी दिया गया है.
जज ने बच्ची को भरोसा दिलाया कि जिस व्यक्ति को उसने ‘अंकल’ कहा था, वह अब कभी आजाद होकर बाहर नहीं आ सकेगा. अदालत ने उसे पूरी जिंदगी जेल में रहने की सजा सुनाई है.
जज ने बच्ची की हिम्मत की तारीफ करते हुए कहा कि वह अदालत में आई, उस व्यक्ति की पहचान की जिसने उसे चोट पहुंचाई और सच बताया. उसके बोलने की हिम्मत ने आरोपी को भविष्य में किसी और बच्चे को नुकसान पहुंचाने से रोकने में मदद की.
जज ने अपने फैसले में बच्ची को यह भी संदेश दिया कि अदालत उसका बचपन वापस नहीं लौटा सकती, लेकिन उसकी आवाज सुनी गई है. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा, ‘बेटा अब अपनी ज़िंदगी जियो. स्कूल जाओ. दोस्त बनाओ हंसो. खेलो. सपने देखो. यह अदालत तुम्हारी हिम्मत को हमेशा याद रखेगी.’
‘बच्ची तक पहुंचे जज का संदेश’
अब इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने उत्तर-पश्चिम दिल्ली जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को निर्देश दिया है कि ट्रायल कोर्ट के इस संदेश को प्रिंट कराकर बच्ची या उसके परिवार तक पहुंचाया जाए. हाई कोर्ट ने कहा कि यह संदेश दो सप्ताह के भीतर बच्ची तक पहुंचना चाहिए. इसके साथ ही उसे मिलने वाली मुआवजे की रकम भी दी जाए.
22 सितंबर 2026 को जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की पीठ ने यह आदेश पारित किया. अदालत ने ट्रायल कोर्ट की ओर से बच्ची को लिखे गए संदेश को ‘साहस का संदेश’ बताया.
2023 में हुई थी वारदात
यह घटना 23 जुलाई 2023 की है. उस समय बच्ची की उम्र महज सात साल थी. अब वह 10 वर्ष की हो चुकी है. मामला आरोपी सुमित शक्य की आपराधिक अपील से हाई कोर्ट पहुंचा. ट्रायल कोर्ट ने उसे 12 साल से कम उम्र की बच्ची के खिलाफ गंभीर यौन हमला करने और आपराधिक धमकी देने के मामले में दोषी ठहराया था.
POCSO कानून के तहत आरोपी को उसके प्राकृतिक जीवन के बाकी बचे हिस्से तक कठोर कारावास की सजा सुनाई गई. इसके अलावा उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. आपराधिक धमकी के मामले में उसे पांच साल की कठोर कैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा मिली. दोनों सजाएं एक साथ चलनी हैं.
बच्ची को साढ़े 10 लाख रुपये मुआवजा
ट्रायल कोर्ट ने बच्ची के लिए 10.50 लाख रुपये के मुआवजे का भी आदेश दिया था. मुआवजे की रकम तय करते समय बच्ची और उसके परिवार को हुई मानसिक पीड़ा, अपराध की गंभीरता और उसके लंबे समय तक पड़ने वाले असर को ध्यान में रखा गया. हाई कोर्ट ने DLSA के सचिव से यह भी रिपोर्ट मांगी है कि मुआवजे की रकम बच्ची तक पहुंची है या नहीं.
आरोपी को राहत नहीं
आरोपी की ओर से सजा पर रोक लगाने और जमानत पर रिहाई की मांग भी की गई थी. हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने फिलहाल यह राहत देने से इनकार कर दिया. पीठ ने कहा कि मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और फॉरेंसिक सबूतों को देखते हुए इस स्तर पर सजा पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता.
अब मुआवजे से जुड़ी स्थिति पर DLSA की रिपोर्ट 4 नवंबर 2026 को सुनी जाएगी, जबकि आरोपी की अपील पर अगली सुनवाई 20 जनवरी 2027 को होगी.
