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Congress Protest Traffic Jam in Delhi: मध्य दिल्ली में राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों और यातायात प्रतिबंधों के कारण नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक के रास्ते अवरुद्ध हो गए, जिससे 5,000 से अधिक यात्रियों की ट्रेनें छूट गईं. आईआईटी जोधपुर के छात्र भी इस जाम में फंस गए. विरोध का अधिकार लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन आम जनता की सुविधा और रेलवे अस्पताल जैसे जरूरी मार्गों की अनदेखी करना अनुचित है. प्रशासन और राजनीतिक दलों को यात्रियों की इस परेशानी पर गंभीर विचार करना चाहिए.
लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा. (File Photo)
दिल्ली में राजनीतिक विरोध और उससे जुड़े यातायात प्रतिबंधों की कीमत आखिर आम जनता क्यों चुकाए? किसी को समय पर स्टेशन पहुंचना है, किसी को दफ्तर और किसी को अस्पताल. ऐसे में रास्ते बंद हों और सफर बीच में अटक जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है. अपनी बात रखने के लिए दूसरों की राह रोकना कितना उचित है? गुरुवार को मध्य दिल्ली में यातायात प्रतिबंधों के बीच नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचने वाले रास्ते पूरी तरह अवरुद्ध हो गए. रेलवे अधिकारियों के अनुसार, पांच हजार से अधिक यात्री अपनी ट्रेन नहीं पकड़ सके. इनमें आईआईटी जोधपुर के 56 विद्यार्थी भी शामिल थे, जिनकी शाम चार बजे रवाना होने वाली डिब्रूगढ़ राजधानी छूट गई.
यह केवल ट्रेन छूटने की बात नहीं है. इसके साथ लोगों का समय, टिकट पर खर्च किए गए पैसे और आगे की यात्रा की योजनाएं भी प्रभावित होती हैं. राजनीतिक कार्यक्रम कुछ घंटों में खत्म हो सकता है, लेकिन उसकी वजह से बिगड़ा सफर सँभालने में यात्रियों को कहीं अधिक समय लग सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से कनॉट प्लेस स्थित मोएट्स में आयोजित दोपहर के भोज के बाद विपक्षी सांसद और कांग्रेस कार्यकर्ता राजघाट पर प्रदर्शन के लिए जुटे थे. इस दौरान लगे यातायात प्रतिबंधों के बीच हजारों यात्रियों का स्टेशन पहुंचना मुश्किल हो गया.
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन जनता की सुविधा और आवाजाही की जिम्मेदारी भी है. राजनीतिक दलों को अपने कार्यक्रमों का असर समझना होगा और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि रेलवे स्टेशन व अस्पताल जैसे जरूरी स्थानों तक पहुँच बनी रहे. बार-बार ऐसी स्थिति बने तो लोगों की नाराजगी स्वाभाविक है. “अब तो यह रोज की परेशानी बनती जा रही है.” जिन मुद्दों का समाधान अदालत में होना है, उनकी लड़ाई अदालत में लड़ी जाए. राजनीतिक असहमति दर्ज कराने के लिए ऐसे तरीके अपनाए जाएँ जिनसे आम लोगों की जिंदगी न अटके.
जनता के नाम पर होने वाली राजनीति को जनता की परेशानी भी समझनी चाहिए. अपनी आवाज उठाइए, लेकिन उन हजारों लोगों की मजबूरी भी सुनिए, जिनका किसी राजनीतिक टकराव से लेना-देना नहीं था—उन्हें बस अपनी ट्रेन पकड़नी थी.
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अमिताभ सिन्हा News18 India के एक्जिक्यूटिव एडिटर हैं. प्रिंट और टीवी पत्रकारिता का लंबा अनुभव है. पटना ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से करियर की शुरुआत की और ‘आज तक’ में तकरीबन 14 साल तक रिपोर्टिंग की. 2015 से नेटवर्क 18 …
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